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ताटका कौन थी और भगवान राम ने स्त्री का वध क्यों किया?-भाग 7 

ताटका वध का कारण

राम-लक्ष्मण ने ऋषि विश्वामित्र के साथ उनके आश्रम सिद्धाश्रम जाते समय मार्ग में जो संबसे महत्वपूर्ण कार्य किया वह था तड़का वध।

भगवान राम के जन्म का एक महत्वपूर्ण कारण राक्षसों का संहार करना था। क्योंकि ये राक्षस सन्मार्ग पर चलने वाले लोगों पर अत्याचार करते थे और उनके धर्म-कर्म में रुकावट डालते थे। आततायी राक्षसों के वध का यह कार्य उन्होंने जब शुरू किया तब उनकी उम्र लगभग सोलह वर्ष की थी। उनके हाथों मारा जाने वाला पहला राक्षस कोई पुरुष नहीं बल्कि स्त्री यानि राक्षसी थी। इसका नाम था ताटका (इसके नाम का उच्चारण “ताड़का” भी मिलता है)। (प्रसंगवश कृष्णावतार में में इस कार्य का आरंभ एक राक्षसी पूतना के वध से हुआ था।) धर्म मर्मज्ञ राम ताटका का वध करना नहीं चाहते थे, क्योंकि स्त्री-हत्या शास्त्र में वर्जित है। लेकिन उन्हें यह करना पड़ा।

वह कौन सी स्थितियाँ हुई कि राम को एक स्त्री राक्षसी ताटका को मारना पड़ा यह जानने से पहले यह जानना रोचक होगा कि ताटका कौन थी।

ताटका कौन थी?

ताटका वास्तव में एक यक्षणी थी, जो शापवश राक्षसी हो गई थी। उसके पिता सुकेतु दक्ष को कोई संतान नहीं थी। उसने संतान के लिए घोर तपस्या की। सुकेतु ने ऐसे संतान के लिए वरदान माँगा जिसमें एक हजार हाथियों का बल हो। इस तपस्या के फलस्वरूप ब्रह्माजी ने उसे एक कन्या होने का वरदान दिया। ताटका इसी वरदान का फल थी। ब्रहमा जी के वरदान के कारण उसमें एक हजार हथियों का बल था। ब्रह्माजी ने उसे पुत्र का वरदान यह सोच कर नहीं दिया था कि इतना बलवान पुत्र लोगों के उत्पीड़न का कारण हो सकता था।

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ताटका का विवाह

बड़ी होने पर बलवती यक्षी (यक्षणी) ताटका का विवाह उसके पिता सुकेतु ने जम्भ के पुत्र सुन्द से कर दिया। इस युगल को मारीच नामक एक पुत्र हुआ। यह वही मारीच था, जो आगे चल कर सीता के हरण में सहयोग के लिए माया मृग बना और राम के हाथों मारा गया।

सुन्द की मृत्यु और ताटका और मारीच का राक्षस बनना

एक दिन ताटका के पति सुन्द ने ऋषि अगस्त्य का कुछ अपराध कर दिया। इससे क्रुद्ध होकर ऋषि ने उसे शाप देकर मार दिया। सुन्द की पत्नी ताटका और पुत्र मारीच ने प्रतिशोध लेने के लिए अगस्त ऋषि को मारना चाहा। अगस्त्य मुनि ने उन दोनों को उन पर हमला करते देख दोनों को शाप दे दिया। मुनि ने मारीच से कहा “तू देवयोनि रूप का त्याग कर राक्षस भाव को प्राप्त हो जा।”

उन्होने ताटका को भी शाप दे दिया “तू विकराल मुखवाली नरभक्षिणी राक्षसी हो जा। तू है तो महायक्षी; परंतु अब शीघ्र ही इस रूप को त्याग कर तेरा भयंकर रूप हो जाय।” इस तरह यक्ष राजकुमारी एक भयंकर राक्षसी बन गई।    

ताटका का अत्याचार

इस घटना से दोनों माँ-बेटे में अगस्त ऋषि से प्रतिशोध लेने और अपने ताकत से लोगों को त्रस्त कर देने की भावना आ गई। क्रोध और अपने बल के अभिमान में ताटका लोगों को कष्ट देने लगी। निर्दोष लोगों को मारने लगी। विशेषकर जिस प्रदेश में ऋषि अगस्त रहते थे, उस प्रदेश को उजाड़ने लगी। धर्म-कर्म के लिए वह घोर अवरोधक हो गई। उसका पुत्र मारीच भी उसका साथ दे रहा था। दोनों माँ-बेटे के भय से लोग त्राहि-त्राहि करते थे।

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राम-लक्ष्मण जब विश्वामित्र के साथ उनके यज्ञ की रक्षा के लिए जा रहे थे तो वे रास्ते में मलद और करुष जनपद से होकर गुजरे। इस समय तटिका इन दोनों जनपदों का विनाश कर रही थी। उस वन के लगभग छह कोस (डेढ़ योजन) के क्षेत्रफल पर उसका पूरी तरह कब्जा था। दोनों जनपदों को जोड़ने वाला रास्ता उसी क्षेत्र से गुजरता था। उस रास्ते से जाने वालों के लिए मृत्यु निश्चित थी। लोगों ने भय के कारण उस रास्ते का उपयोग करना बंद कर दिया था। यहाँ से निकल कर वह करुष और मलद जनपदों पर भी हमला करती थी। लोगों को मार कर संपत्ति और वन-उपवनों को नष्ट करना ही उसका कार्य था। उसके भय से ये दोनों सुंदर और सम्पन्न प्रदेश उजाड़ होने लगे थे। लोगों ने उस वन को ताटका वन ही नाम दे दिया था।

राम-ताटका युद्द

अपनी यात्रा के क्रम में जब राम-लक्ष्मण विश्वामित्र के साथ इस रास्ते से गुजरने लगे तो विश्वामित्र ने श्रीराम को ताटका को मार डालने का आदेश दिया। उन्होंने राम को प्रोत्साहित करते हुए कहा “तुम स्त्री-हत्या का विचार करके इसके प्रति दया नहीं दिखाना। एक राजपुत्र को चारों वर्णों की रक्षा के लिए स्त्री-हत्या भी करनी पड़े तो उसे इससे मुँह नहीं मोड़ना चाहिए।”

विश्वामित्र जी ने अनेक प्रकार से समझा कर उनके मन से स्त्री-हत्या के प्रति हिचकिचाहट को दूर किया। उनकी आज्ञा से और पिता दशरथ द्वारा विश्वामित्र जी की आज्ञा के पालन की आज्ञा के अनुशरण में श्रीराम ने ताटका का वध कर इस वन को मुक्त करने का निश्चय किया।  

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ताटका के वध का निश्चय कर श्रीराम ने अपने धनुष की प्रत्यंचा खींच कर बहुत तेज ध्वनि (टंकार-घोष) किया। इस ध्वनि को सुनकर ताटका वन के सभी प्राणी थर्रा उठे। क्रोधित होकर ताटका आवाज की दिशा में दौड़ी। वह अत्यंत भयंकर लग रही थी।

पर श्रीराम अभी भी लक्ष्मण जी से स्त्री होने के कारण कान-नाक या हाथ-पैर काट कर जीवित छोड़ देने की बात कह रहे थे ताकि इसका बल इतना क्षीण हो जाता जिससे वह दूसरों को कष्ट नहीं देती। लेकिन ताटका पहले धूल और फिर पत्थरों की वर्षा करते हुए दोनों भाइयों की तरफ बढ़ी। राम ने बाण से उसके दोनों हाथ काट डाले। अब वह उनके निकट खड़ी होकर ज़ोर-ज़ोर से गर्जना करने लगी। तब लक्ष्मण ने उसके नाक-कान काट लिए। दोनों भाई उसे घायल कर जीवित छोड़ देना चाहते थे ताकि वह लोगों के कष्ट न पहुंचाए।

लेकिन ताटका अभी भी नहीं रुकी। वह अनेक तरह के माया भी जानती थी। वह कभी अदृश्य हो जाती, कभी आकाश में घूमने लगती, कभी माया से पत्थर बरसाने लगती।

ताटका वध

तब विश्वामित्र ने कहा “राम! तुम्हारा इस पर दया करना व्यर्थ है। शाम होने वाली है। शाम से पहले इसे मार डालो क्योंकि शाम के समय राक्षस दुर्जय हो जाते हैं।”

यह सुनकर राम ने शब्दबेधी बाण चला कर ताटका को बाणों से घेर दिया। वह ज़ोर से गरजती हुई दोनों भाइयों पर टूट पड़ी। तब श्रीराम ने एक बाण उसकी छाती में मारा। वह मर कर गिर पड़ी। इन्द्र के नेतृत्व में आकर देवताओं ने ताटका वध पर अपनी प्रसन्नता प्रकट किया।

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