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शिव धनुष की क्या विशेषताएँ थीं, जिसे तोड़ कर राम ने सीता को पाया था?-भाग 11

वाल्मीकि कृत रामायण और तुलसीदास कृत रामचरितमानस में जनक जी के धनुष यज्ञ, राम-सीता विवाह और परशुराम-राम संवाद का जो विवरण है वह थोड़ा-सा भिन्न है। वाल्मीकि रामायण में इस धनुष के विषय में दो लोगों ने बताया है। एक, राजा जनक स्वयं विश्वामित्र और राम-लक्ष्मण को इसके विषय में बताते हैं। दूसरा, परशुराम राम को इसके विषय में बताते हैं।

शिव धनुष का जनक वंश के पास आना

वाल्मीकि रामायण के अनुसार जब दक्ष के यज्ञ में अपमानित होकर भगवान शंकर की पत्नी सती ने देह त्याग कर दिया, तब शोक और क्रोध से शंकर जी यह धनुष उठा कर देवताओं का सिर काटने के लिए उद्धत हो गए। लेकिन देवताओं द्वारा स्तुति किए जाने पर उन्होने यह विचार त्याग दिया।

शिव धनुष का देवताओं के पास आना

बाद में शिव जी ने यह धनुष देवताओं को दे दिया। उन्होने ने यह धनुष देवताओं को क्यों दिया इसके लिए कथा इस प्रकार हैं:

एक बार देवताओं ने यह जानना चाहा कि भगवान शिव और विष्णु में कौन अधिक बलशाली हैं। उनके आग्रह पर ब्रह्माजी ने दोनों के बीच विरोध उत्पन्न कर दिया। शिव और विष्णु में बड़ा भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में भगवान शिव शिथिल हो गए। तब देवताओं और ऋषियों ने आकर दोनों से शान्ति के लिए प्रार्थना की। यद्यपि इस प्रार्थना पर दोनों शांत हो गए। लेकिन चूँकि शिव जी शिथिल हो गए थे, इसलिए देवताओं ने विष्णु को ही श्रेष्ठ माना।

शिव धनुष का जनक वंश के पास आना

शिव-विष्णु युद्ध के बाद शिव जी और विष्णु जी दोनों ने ही अपने विशेष धनुष और बाण को अपने पास नहीं रखा। शिव ने इसे जनक जी के पूर्वज महाराज निमि के पुत्र देवरात जनक को दे दिया। तब से यह धनुष इसी वंश के पास रहा। जनक वंश देवता की तरह शिव धनुष की आराधना करता था। इसी वंश के सिरध्वज जनक ने अपनी पुत्री सीता के विवाह के लिए इस धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने की शर्त रखा।  

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विष्णु ने जब राम का अवतार लिया तब इस शर्त को पूरा करने के लिए उन्होने शिव धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा कर उसे तोड़ दिया।

विष्णु धनुष का परशुराम के पास पहुँचना

युद्ध के बाद विष्णु ने अपना धनुष भृगु वंश में उत्पन्न ऋषि ऋचीक को धरोहर दे रूप में दे दिया। ऋषि ऋचीक ऋषि परशुराम के पितामह थे। इस तरह वंश परंपरा में विष्णु धनुष परशुराम के पास आ गया।

राम से अपनी पराजय स्वीकार कर परशुराम ने यह धनुष राम को दे दिया। लेकिन राम ने भी इसे नहीं रखा और वरुण देव को दे दिया। 

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