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राम चारों भाइयों का विवाह-भाग 12

राम का विवाह

धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने की शर्त पूरी होने के बाद राम चारों भाइयों का विवाह पूर्ण वैदिक और लौकिक विधियों से दोनों परिवारों की उपस्थिति में सम्पन्न हुआ। यह कथा वाल्मीकि रामायण में इस प्रकार है:

राम विवाह की सूचना लेकर दूत का अयोध्या जाना

शिव धनुष टूटने के बाद अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार जनक जी अपनी पुत्री श्रीराम को देने के लिए प्रसन्नतापूर्वक तैयार हो गए। इसके लिए एक तीव्रगामी दूत श्रीराम के पिता को यह सूचना देकर बुलाने के लिए अयोध्या भेजा गया। दूत चौथे दिन अयोध्या पहुँच गया। अपने पुत्र राम के पराक्रम और विवाह का समाचार पाकर राजा दशरथ और सभी अयोध्यावासी बहुत खुश हुए। शीघ्र ही सभी तैयारियाँ कर अपने बंधु-बांधवों और सेना के साथ धन-धान्य लेकर दशरथ जी मिथिला के लिए चल पड़े।

दशरथ जी का बरातियों के साथ जनकपुर पहुँचना

राजा जनक ने अत्यंत हर्ष के साथ राजा दशरथ और अन्य अयोध्यावासी अतिथियों का स्वागत सत्कार किया। उन्होने दशरथ जी से कहा “कल सवेरे इन सभी महर्षियों के साथ उपस्थित हो कर मेरे यज्ञ की समाप्ति के बाद आप श्रीराम के विवाह का शुभ कार्य सम्पन्न करें”। दशरथ जी ने उत्तर दिया “प्रतिग्रही दाता के अधीन होता है। अतः आप जैसा कहेंगे, हम वैसा ही करेंगे।” यहाँ दशरथ जी का आशय यह था कि चूँकि जनक जी अपनी पुत्री उन्हें देने वाले थे। इसलिए वे अर्थात लड़की वाले उच्च थे। क्योंकि देने वाला लेने वाले से उच्च होता है।

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कुशध्वज जनक का जनकपुरी पहुँचना

अगले दिन यज्ञ कार्य सम्पन्न करने के बाद जनक जी ने अपने छोटे भाई कुशध्वज जनक को राम-सीता के विवाह में शामिल होने के लिए बुलावा भेजा। वह अपनी राजधानी सांकश्या नगर में थे।

पहले कभी इक्षुमती नदी के किनारे बसे सांकश्या नगर के राजा ने मिथिला पर आक्रमण किया था। उसे हराने के बाद जनक जी ने अपने छोटे भाई कुशध्वज जनक को वहाँ का राजा बना कर भेज दिया। तब से कुशध्वज सांकाश्या नगरी में ही रहते थे। बड़े भाई का सन्देश मिलते ही वे परिवार के साथ मिथिला आ गए।

कुशध्वज जनक के आने के बाद दोनों जनक बंधु- सिरध्वज और कुशध्वज जनक- सभा में बैठे। [सीता के पिता का पूरा नाम सिरध्वज जनक था। जनक उनका कुलनाम (surname) था] उन्होने अपने मंत्री सुदामन को भेज कर राजा दशरथ को उनके पुत्र, मंत्री और ऋषियों सहित बुलवाया।

राम के भाइयों का सीता की बहनों से विवाह तय होना

औपचारिकता का पालन करते हुए कुलगुरु वसिष्ठ जी ने अपने राजा दशरथ के कुल का परिचय दे कर अपने दोनों राजकुमारों श्रीराम और श्रीलक्ष्मण के लिए जनक की दोनों पुत्रियों सीता और उर्मिला का वरण किया। राजा जनक ने भी इन दोनों राजकुमारों के लिए अपनी दोनों पुत्रियों को देने की प्रतिज्ञा की।

विश्वामित्र जी ने दशरथ जी के अन्य दोनों पुत्रों भरत और शत्रुघ्न के लिए कुशध्वज जनक की दोनों पुत्रियों मांडवी और श्रुत्कीर्ति का वरण किया। जनक बंधुओं ने इसके लिए सहर्ष सहमति दे दी।

इस तरह चारों राजकुमारों का विवाह चारों राजकुमारियों से तय हो गया। राम-सीता, भरत-मांडवी, लक्ष्मण-उर्मिला और शत्रुघ्न-श्रुत्कीर्ति- चारों विवाह एक साथ ही होना तय हुआ। उस दिन से तीसरे दिन उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र था जिसे विवाह के लिए उत्तम माना गया।

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राजा दशरथ ने अपने चारों पुत्रों के मंगल के लिए परंपरा अनुसार नांदी श्राद्ध और गोदान किया।

भरत के मामा युधाजित का मिथिला पहुँचना

अगले दिन जब वे गोदान कर रहे थे तभी राजकुमार भरत के मामा युधाजित वहाँ आ पहुँचे। भरत के नाना कैकेय देश के राजा थे। उन्हे अपने नाती भरत को देखने की बड़ी इच्छा थी। अतः उन्हे बुलाने के लिए उन्होने अपने पुत्र युधाजित को अयोध्या भेजा था। अयोध्या पहुँच कर युधाजित को मिथिला में अपने भांजे के विवाह के बारे में पता चला, तो वे भी मिथिला आ गए।

राम चारों भाइयों का विवाह

निश्चित तिथि को चारों भाइयों राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न का विवाह क्रमशः चारों बहनों सीता, मांडवी, उर्मिला और श्रुत्कीर्ति से विधिवत रूप से हुआ। इस विवाह से देवता आदि भी बड़े प्रसन्न हुए।   

राम का अयोध्या के लिए विदा होना

विवाह के अगले दिन सबसे विदा लेकर विश्वामित्र अपने आश्रम चले गए।

दशरथ जी के साथ अपने चारों बेटी-दामाद को भी जनक जी ने बहुत सारे उपहार के साथ विदा किया।

इन सब को विदा कर जनक जी अपने महल में लौट आए। दशरथ जी महर्षियों को आगे कर अपने पुत्रों, पुत्रवधुओं और बंधु-बांधवों के साथ अयोध्या के लिए चले।

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