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परशुराम ने राम को विष्णु धनुष लेने के लिए क्यों ललकारा?-भाग 13 

परशुराम जी का आगमन

विवाह के बाद चारों नवविवाहित जोड़े अपने पिता और अन्य बरातियों के साथ अयोध्या के लिए चले। लेकिन जनकपुरी से निकलते ही राम-परशुराम की भेंट हो गई। यद्यपि अन्य कई प्रसंगों की तरह इस प्रसंग के संबंध में भी वाल्मीकि रामायण और तुलसीकृत रामचरितमानस के विवरण में कुछ अंतर है। वाल्मीकि रामायण में यह प्रसंग निम्नवत है।

सब से विदा लेकर जब राम अपने परिजनों के साथ अयोध्या जा रहे थे तो कुछ ही दूर चलने पर उन्हे शकुन और अपशकुन दोनों एक साथ होने लगे। वे इस पर विचार कर ही रहे थे तभी जोरों की आँधी चलने लगी।

ठीक इसी समय उनलोगों ने भगवान परशुराम जी को आते देखा। वसिष्ठ आदि ऋषियों ने उनका स्वागत कर उनसे बातें की। लेकिन परशुराम जी का क्रोध शांत नहीं हुआ। क्रोधित परशुराम ने राम से शिव के उस धनुष के समान ही अपने विष्णु धनुष को चलाने के लिए कहा। साथ ही यह भी कहा कि अगर वे ऐसा कर अपना पराक्रम दिखा देते हैं तो वे उनके साथ द्वन्द्व युद्ध करेंगे।

परशुराम द्वारा राम को विष्णु धनुष उठाने के लिए ललकारना

राजा दशरथ ने परशुराम जी से अनुनय किया। लेकिन इसकी अवहेलना कर वे अपने वैष्णव धनुष पर बाण चढ़ाने के लिए श्रीराम को ललकारते रहे। उन्होने अपने धनुष के विषय में (कि यह धनुष कैसे उनके पास आया और इसकी क्या विशेषता है) श्रीराम को बताया।    

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परशुराम जी ने बताया कि विष्णु ने अपना धनुष भृगु वंश में उत्पन्न उनके दादा ऋषि ऋचीक को धरोहर दे रूप में दे दिया था। शैव धनुष, जो जनक के पास था, उसे राम तोड़ चुके थे। वैसा ही दूसरा वैष्णव धनुष परशुराम के पास था, जिसे चलाने के लिए वे राम को ललकार रहे थे। इसका कारण यह था कि परशुराम शिव और विष्णु धनुष कि महिमा जानते थे। वे जानते थे कि शिव धनुष कोई साधारण मनुष्य नहीं चला सकता था। तो क्या राम वही विष्णु अवतार थे जिनकी प्रतीक्षा ऋषि-मुनि कर रहे थे? शिव धनुष कि तरह ही विष्णु धनुष भी स्वयं विष्णु को छोड़ कर कोई अन्य नहीं चला सकता। इसी को सुनिश्चित करने के लिए परशुराम कटु वचन कह कर राम को ललकार रहे थे। जब राम वह धनुष चला कर इस परीक्षा में उतीर्ण हो गए तब परशुराम ने उनका दर्शन कर अपना जीवन सफल समझा।  

राम द्वारा वैष्णव धनुष लेना

पहले तो राम पिता की उपस्थिति के कारण संकोचवश चुप रहे। लेकिन परशुराम द्वारा बार-बार ललकारे जाने पर उन्हे थोड़ा क्रोध आ गया। उन्होने परशुराम के हाथ से वह वैष्णव धनुष ले लिया। धनुष हाथ से जाते ही परशुराम के शरीर से वैष्णव तेज निकल कर राम के शरीर में समाहित हो गया।

वैष्णव धनुष परशुराम के हाथ से राम के हाथों में जाने का प्रभाव

राम ने धनुष की प्रत्यंचा पर बाण चढ़ा कर परशुराम से कहा कि यह वैष्णव बाण निष्फल नहीं होता है (अर्थात प्रत्यंचा पर चढ़ाने के बाद वापस नहीं होता है)। लेकिन ब्राह्मण और विश्वामित्र के संबंधी होने के कारण वे परशुराम को मारना नहीं चाहते थे। अतः उन्होने परशुराम को प्राप्त कहीं भी शीघ्रतापूर्वक आने-जाने की शक्ति और अपने तपोबल से प्राप्त पुण्यलोक को नष्ट करने का विचार किया।

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पर, परशुराम जी, जो वैष्णव तेज के चले जाने से निष्तेज हो गए थे, ने राम से आग्रह किया कि वे उनकी शीघ्र गमन शक्ति को नष्ट न करें। क्योंकि कश्यप जी को दिए गए वचन के अनुसार उन्हे रात को पृथ्वी पर नहीं रहना था। इसके लिए उन्हे शीघ्र गमन करने की शक्ति आवश्यक थी। उन्होने तुरंत ही तीव्र वेग से महेंद्र पर्वत पर चले जाने का वचन दिया। लेकिन उन्होंने अपनी तपस्या से प्राप्त अनुपम लोकों को नष्ट करने के लिए कह दिया।

परशुराम के आग्रह के अनुसार राम ने वह अमोघ वैष्णव बाण छोड़ा। इस बाण से परशुराम के तपस्या से उत्पन्न पुण्य लोक नष्ट हो गया। राम ने परशुराम का पूजन किया। इसके बाद उनकी परिक्रमा कर परशुराम अपने स्थान महेंद्र पर्वत के लिए चले गए।

परशुराम क्यों पृथ्वी पर नहीं रहते थे?

परशुराम ने अपने पिता जमदग्नि की ध्यान अवस्था में क्षत्रीय कृतवीर्य के पुत्र अर्जुन द्वारा हत्या का बदला लेने के लिए अनेक बार क्षत्रियों का संहार किया। फिर सारी पृथ्वी पर अधिकार करके उन्होने यज्ञ किया। यज्ञ समाप्त होने पर यज्ञ के दक्षिणा के रूप में यह सारी पृथ्वी (जमीन) कश्यप ऋषि को दे दिया। चूँकि दान दी हुई वस्तु (पृथ्वी) का दाता को उपयोग नहीं करना चाहिए, इसलिए परशुराम स्वयं महेंद्र पर्वत पर रह कर तपस्या करने लगे। उन्होने कश्यप जी के समक्ष रात को पृथ्वी पर नहीं रहने की प्रतिज्ञा की थी।

परशुराम जी द्वारा अपनी हार मान कर चले जाना

इस समय बहुत से देवता, गंधर्व आदि आकाश में श्रीराम द्वारा वैष्णव धनुष का संधान देखने के लिए उपस्थित थे। परशुराम ने अपनी हार मानते हुए कहा कि भगवान विष्णु का धनुष चलाने की क्षमता देख कर उन्हे निश्चय हो गया है कि वे भगवान विष्णु ही हैं। त्रिलोकीनाथ विष्णु से पराजय उनके लिए लज्जा का विषय नहीं था।

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परशुराम के जाने के बाद वैष्णव धनुष

उनके जाने के बाद राम ने वह धनुष वरुण देव के हाथ में दे दिया।

तत्पश्चात नवविवाहित जोड़े सभी बरातियों के साथ अयोध्या लौट आए।

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