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कैकेयी ने क्यों राम के लिए वनवास का वरदान माँगा?-भाग 14  

राम वनवास का कारण

राम जन्म का एक प्रमुख कारण था राक्षसों का विनाश। देवताओं ने इसी उद्देश्य से भगवान विष्णु से मनुष्य अवतार लेने के लिए प्रार्थना किया था। लेकिन अयोध्या में रहते हुए यह कार्य संभव नहीं था। राम अपने परिवार और प्रजा में इतने लोकप्रिय थे कि कोई भी उन्हें अपने से दूर नहीं जाने देता। इसलिए देवता उन्हें एक लंबे समय के लिए अयोध्या से दूर वन में चाहते थे जहाँ वे अत्याचारी राक्षसों का विनाश कर सकें। स्वयं राम की भी ऐसी ही मर्जी थी क्योंकि उन्होनें देवताओं को पहले ही राक्षसों के संहार का आश्वासन दे रखा था।

देवता यह कार्य यथाशीघ्र कराना चाहते थे। जब राम के राज्याभिषेक की घोषणा राजा दशरथ ने की, तब देवताओं को लगा कि अगर राम ने राजपद की जिम्मेदारी संभाल ली तो उनका कार्य और कठिन हो जाएगा। अतः वे किसी तरह राज्याभिषेक को रोक कर उन्हें वन में भेजना चाहते थे। उन्होंने इसके लिए राम की सौतेली माता कैकेयी, जो कि उन्हें बहुत प्रेम करती थी, और उनकी दासी मंथरा को इसका माध्यम बनाया। कथा इस प्रकार है: 

राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न चारों भाइयों के विवाह हुए लगभग बारह वर्ष बीत गए। उनका विवाह सोलह वर्ष की उम्र में हुआ था। अब उनकी उम्र लगभग 28 वर्ष की थी। प्रजा पराक्रमी और धर्मपरायण दशरथ को राजा के रूप में और उनके चारों पुत्रों को राजकुमार के रूप में पाकर बहुत खुश थी। अपने गुणों, स्वभाव और सुंदर रूप के कारण बड़े राजकुमार राम अपने पिता से भी अधिक लोकप्रिय हो गए थे। प्रजा का स्नेह सभी भाइयों पर था, लेकिन बड़े पर कुछ ज्यादा था।

इस समय भरत और शत्रुघ्न भरत के ननिहाल कैकेयी देश गए हुए थे। एक दिन वृद्ध राजा दशरथ के मन में इच्छा हुई कि अपने जीते जी राम को युवराज पद पर अभिषेक कर यह समारोह देखूँ।

राम के राज्याभिषेक की घोषणा

मंत्रियों से सलाह कर उन्होने अन्य राजाओं को इस समारोह के लिए आमंत्रण भेज दिया। लेकिन देवताओं की प्रेरणावश मिथिला और कैकेय देश, जो उनके निकट संबंधी थे, को निमंत्रण देना भूल गए। देवताओं को भय था कि कैकेय नरेश के आने पर उनके साथ भरत-शत्रुघ्न भी आ जाते और तब राम का वनगमन नहीं हो पाता। राम का वन जाना राक्षस वध के लिए आवश्यक था।  

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समस्त आमंत्रित राजाओं, सभासदों और प्रजाजनों के समक्ष राजा दशरथ ने राम के राज्याभिषेक का प्रस्ताव रखा। उपस्थित लोगों ने हर्ष ध्वनि के साथ इसका समर्थन किया।

राजा ने अगले दिन ही राम के राज्याभिषेक की घोषणा कर दी। शीघ्र ही यह समाचार समस्त नगर में फ़ैल गया। सभी लोग राज्याभिषेक समारोह की तैयारियों में लग गए। समस्त नगर में उत्सव का वातावरण बन गया। राम के मित्र आकर उन्हें बधाइयाँ देने लगे। पिता और राजगुरु ने राम को भी आवश्यक आदेश-निर्देश दिए।

जब राजधानी अयोध्या नगर में खुशी और उत्साह का ऐसा वातावरण था तब रानी कैकेयी की एक दासी मंथरा को इसका कारण पता करने पर राम राज्याभिषेक का पता चला। लेकिन यह खुशी की खबर सुन कर मंथरा मन-ही-मन कुपित हो गई। वह अपने स्वामिनी के पुत्र भरत को राजा के रूप में देखना चाहती थी।

मंथरा द्वार रानी कैकेयी को राम का राज्याभिषेक रोकने के लिए उकसाना 

मंथरा ने जाकर अपनी स्वामिनी कैकेयी को राम के राज्याभिषेक की खबर दी। कैकेयी राम को बहुत प्रेम करती थी। इसलिए यह खबर सुनकर वह बहुत खुश हुई। उसने यह खुशखबरी सुनाने वाली दासी मंथरा को इनाम में उपहार दिया।                   

मंथरा कैकेयी के इस प्रतिक्रिया से खुश नहीं थी। वह किसी तरह भरत को राजा बनाना चाहती थी। उसने कैकेयी के मन में द्वेष उत्पन्न करने के लिए उसे विश्वास दिलाया कि  भरत-शत्रुघ्न को ननिहाल भेज कर अचानक से राम के राज्याभिषेक की योजना कौशल्या की सोची-समझी साजिश थी। कौशल्या के प्रभाव में ही राजा ने यह निर्णय लिया था।  

मंथरा ने यह भी कहा कि सरल स्वभाव होने के कारण कैकेयी यह साजिश समझ नहीं पाई थी। अगर कौशल्या के योजनानुसार राम राजा बन जाएँगे तो कौशल्या राजमाता होगी और कैकेयी आदि अन्य रानियों को दासी की तरह उनके अधीन रहना होगा। इतना ही नहीं उनके पुत्र भरत को भी राम का सेवक बनना पड़ेगा।  

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मंथरा ने इसी तरह की अनेक झूठी और द्वेष बढ़ाने वाली बाते कह कर रानी कैकेयी को अपने विश्वास में ले लिया। अब रानी किसी भी तरह अपने पुत्र भरत को राजा बनाना चाहने लगी। रामायण के कुछ रूपान्तरण में स्वयं राम द्वारा केकेयी से ऐसा करने का आग्रह करने की बात भी कही गई है। 

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कैकेयी को दशरथ के दो वरदान

पूरी तरह मंथरा के प्रभाव में आ चुकी रानी ने उससे से सलाह माँगा जिससे राम का राज्याभिषेक रुक जाए और भरत राजा बने। मंथरा ने उन्हे याद दिलाया कि एक युद्ध में राजा दशरथ की सहायता करने से खुश होकर राजा ने उनसे दो वरदान माँगने के लिए कहा था। पर रानी ने उस समय वह वरदान नहीं माँग कर समय आने पर माँगने के लिए कहा था।

मंथरा ने रानी कैकेयी को सलाह दिया कि इस समय वह दो वरदान माँग कर अपने अभीष्ट की सिद्धि कर सकती थी। उसके अनुसार भरत के लिए राज्य माँगना ही पर्याप्त नहीं था। बल्कि इस राज को निष्कंटक करने के लिए राम को राज्य से दूर रखना भी जरूरी था। ताकि उनकी अनुपस्थिति में उनके समर्थकों को भरत शांत कर सके। ज्यादा दिन राज्य से दूर रहने पर जनता पर जो राम का प्रभाव था वह भी धीरे-धीरे कम हो जाता। इसी राजनीतिक आवश्यकता के कारण राम का निर्वासन भी आवश्यक था। 14 वर्ष एक ऐसी समय अवधि थी जिसमें राम के समर्थक शांत हो जाते। इसलिए 14 वर्ष की अवधि निर्वासन के लिए उपयुक्त होता।

राम का राज्याभिषेक रोकने और भरत को राजा बनाने के लिए योजना

पर मंथरा और कैकेयी दोनों को यह भय था कि राजा ऐसा कठिन वरदान देंगे या नहीं। हो सकता था राजा अपने वचन को तोड़ कर पाप का भागी बनने को राजी हो जाते लेकिन अपने प्रिय और निरपराध पुत्र को निर्वासित नहीं करते। इसलिए यह योजना बनी कि जब राम की शपथ ले कर वरदान देने के लिए राजी हो जाए, तभी वरदान माँगा जाए। अपने वचन भले ही वह तोड़ दे लेकिन राम का शपथ वे नहीं तोड़ते।

इस तरह मंथरा के पूरी तरह प्रभाव में आ चुकी रानी उसकी सलाह को मानते हुए कोप भवन में चली गई। अपने राजसी वस्त्र और आभूषण उतार कर वह जमीन पर लेट गई।

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इधर राजा कल के राज्याभिषेक की तैयारी के लिए सभी आवश्यक निर्देश देने और अन्य आवश्यक राजकीय कार्य सम्पन्न करने के बाद राज्याभिषेक की शुभसूचना देने अपने सबसे प्रिय रानी कैकेयी के महल में आए। अपने कक्ष में रानी को नहीं देख कर उन्होने दासी से पूछा। राजा के आने का समय होने पर रानी कैकेयी हमेशा अपने कक्ष में ही होती थी। इसलिए आज उनकी अनुपस्थिति से राजा को चिंता हुई। दासी ने डरते हुए कोप भवन की तरफ संकेत कर दिया।

कैकेयी द्वारा दो वरदान माँगना

राजा दशरथ जब कोप भवन में गए तो रानी कैकेयी को बिना किसी साज-शृंगार के जमीन पर पड़े हुए देखा। उन्होने अनेक प्रकार से रानी के क्रोध और दुख का कारण पूछा और उन्हे आश्वस्त करते हुए बोला कि जो भी उनकी इच्छा होगी वे पूर्ण करेंगे। राजा पुत्र के राज्याभिषेक के शुभ अवसर पर कोप भवन का यह अशुभ वेष त्यागने के लिए रानी को समझाने लगे।  

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राजा को रानी कैकेयी का अपने बड़े सौतेले पुत्र राम के प्रति प्रेम का पूरा विश्वास था। कैकेयी ने अभी तक कोई ऐसा कार्य नहीं किया था जो पति या पति के कुल के लिए अप्रिय हो। इसलिए राजा को यह जरा भी संदेह नहीं था कि वह कुछ ऐसा चाहती है जो राम और उनके कुल के लिए प्रतिकूल हो सकता है।

अतः उन्होने कहा कि “तुम से प्रिय मुझे केवल राम है। राम से प्रिय मुझे कुछ भी नहीं है, मेरा प्राण भी नहीं। इसलिए मै राम की शपथ लेता हूँ, जो तुम मांगोगी वह दूंगा।” राजा दशरथ ने जब बार-बार राम की शपथ लेकर अपनी प्रतिज्ञा दृढ़ किया। तब रानी ने देवता आदि को उनके इस शपथ और वचन (दो वरदान देने का वचन) साक्षी रख कर दो वरदान माँगा।

पहला वरदान था राम के अभिषेक के लिए रखी गई सामग्री से भरत का तत्काल राज्याभिषेक और दूसरा तपस्वी के वेष में राम का चौदह वर्ष के लिए वन में निवास। वाल्मीकि रामायण में वन के लिए “दण्डकारण्य” शब्द आया है।  

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