हमारी श्रद्धा का दण्ड भुगतते हमारे ये देवता

अपमानित स्थिति में रखे हुए आस्था के प्रतीक

आपलोगों ने अक्सर सड़कों के किनारे, पेड़ों के नीचे, नदियों के तट पर, रखे देवी-देवताओं की अनेक टूटी-फूटी, खंडित मूर्तियाँ, फोटो, आर्टिफ़िशियल फूल मालाएँ, माता की चुन्नी इत्यादि देखे होंगे। कौन रखता होगा वहाँ उन्हें। कोई नास्तिक तो नहीं होगा वह। कोई-न-कोई आस्तिक ही होगा जिसने पहले उनकी पूजा की होगी। अब वे पुराने और खंडित हो गए, उन्हें रखने का कोई स्थान मिला होगा, तो कहीं भी फेंक दिया। ये कैसी आस्था है जो अपने आराध्य को, जिसकी उन्होने बहुत समय तक पूजा की है, उन्हें कहीं भी फेंक देते हैं?

कुछ लोग इन्हें नदियों में फेंक देते हैं। जी, विसर्जित नहीं करते, बल्कि फेंकते हैं। नहीं, मैं पर्यावरण प्रदूषण की बात नहीं करूंगी। मैं मूर्तियों आदि में प्रयुक्त केमिकल की बातें भी नहीं करूंगी। ऐसे फेंके गए बहुत से फोटो में शीशे के फ्रेम लगे होते हैं। कई मूर्तियाँ धातु की बनी होती हैं। ये सभी पैरों में चुभने वाले होते हैं। कई बार नदियां इन्हें किनारे पर लगा देती हैं। पानी के अंदर या किनारे पर दोनों ही जगह ये वहाँ स्नान या किसी अन्य कार्य से जाने वाले लोगों के लिए कठिनाई का कारण बनते हैं।   

क्यों होती हैं इनकी इतनी बड़ी संख्या

मेरे बहुत सारे मित्र हर साल वैष्णो देवी जाते हैं। वहाँ से वे जो प्रसाद अपने किसी विशेष व्यक्ति के लिए लाते हैं उनमे देवी की एक छोटी धातु की मूर्ति भी होती है। मथुरा-वृन्दावन-द्वारका आदि जाने वाले बालकृष्ण की छोटी मूर्ति लाते हैं। कई लोग जितने भी तीर्थ में जाते हैं वहाँ से अपने लिए और अपने रिश्तेदारों व मित्रों के लिए भी फोटो या मूर्ति लेते आते हैं।

Read Also  बेटी कोई वस्तु तो नहीं, फिर कन्यादान क्यों?

कई लोग किसी विशेष त्योहार में नई मूर्तियाँ लाना पसंद करते हैं। दिवाली, दुर्गापूजा, गणेश चतुर्थी, सरस्वती पूजा आदि के अवसरों पर लोग घरों में या मुहल्लों में छोटी-छोटी मूर्तियाँ और फोटो लगा लेते हैं।

कुछ लोगों को अपने भगवान सजा कर रखना अच्छा लगता है। इसके लिए वे प्लास्टिक या कपड़े  के बने फूल-माला तथा अन्य शृंगार सामाग्री का प्रयोग करते हैं। उन्हें अच्छे-अच्छे कपड़े या चुन्नी पहनाते हैं।

मंदिर या आश्रम आदि भी अपने भक्तों को भगवान का नाम लिखा पटका आदि देते हैं।

ये सभी ऐसी चीजें होती हैं जो आसानी से खत्म नहीं होती हैं। चूंकि आस्था जुड़ा होता है इसलिए इन्हें फेंकने की हिम्मत भी नहीं कर पाते हैं और कहीं सड़क के किनारे, पेड़ के नीचे या नदी के तट पर रखे देते हैं। हालाँकि ये कार्य वे आस्था से करते हैं लेकिन ऐसा कर वे अनजाने में अपना पाप ही बढ़ाते हैं।

क्या तरीके हैं इनकी सख्या कम करने के?

जिनको हम इष्ट मानते हैं, जिन्हें हम ध्यान करते हैं केवल उनका ही फोटो या मूर्ति रखें। हर अवसर पर और हर तीर्थ से फोटो या मूर्ति लाने से बचें। हर किसी को भगवान की मूर्ति गिफ्ट न करें। त्योहारों में गली-गली में छोटी-छोटी मूर्तियाँ लगाने से बचे। 

दूसरा, मूर्ति या तो ऐसा खरीदें जो ज्यादा दिन तक चले या ऐसा जो मिट्टी में आसानी से मिल जाए। सबसे अच्छा हो मिट्टी की मूर्तियाँ खरीदें।

प्लास्टिक के फूल-माला, भगवत नाम लिखा हुआ पटका, आदि का कम प्रयोग करें।

क्या है इन्हें विसर्जित करने का सही तरीका?

अगर आसपास कहीं मिट्टी हो तो वहाँ, नहीं तो किसी नदी किनारे जा कर गहरे गड्ढे कर उसमें सभी पवित्र चीजों को रख दें।

Read Also  नन्दजी को वरुण ने क्यों कैद किया और गोपों को श्रीकृष्ण ने कैसे अपने धाम का दर्शन कराया?- भाग 25            

2-3 पीढ़ी पहले तक पूजा में प्रयोग होने वाली सामग्री साधारणतः ऐसी होती थी जो जल या मिट्टी में मिल जाती थी। हमारे आसपास जमीन होती थी। मिट्टी के बने हुए, बिना रंगे या प्रकृतिक रंगों से रंगी हुई मूर्ति का प्रयोग होता था। आसपास के पेड़ से तोड़े गए फूल एवं पत्तियाँ चढ़ाया जाता था। इनकी संख्या भी बहुत अधिक नहीं होती थी। प्रतिदिन के पूजा की सामग्री तो घर के आसपास ही कहीं घेरा बना कर या मिट्टी में डाल दिया जाता था। कुछ को नदी में भी डाल दिया जाता था तो वे आसानी से घुल जाने वाली सामग्री होती थीं।

पर अब एक तो हमारे पास मिट्टी वाले स्थान कम हो गए हैं, दूसरी तरह अवशिष्ट सामग्री बढ़ गई हैं।

अगर भगवान में सच में आपकी आस्था है तो अब से जब भी उनकी कोई मूर्ति या फोटो या उनके लिए कोई शृंगार सामग्री खरीदें तो पहले ही विचार कर लें कि इनका सम्मानजनक विसर्जन कैसे करेंगे आप?        

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top