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हनुमान द्वारा लंका में शक्ति प्रदर्शन-भाग 42 

अशोक वाटिका का विध्वंस

लंका में हनुमान जी ने सीता की बुरी अवस्था देखी। इससे उन्हे रावण पर क्रोध भी था। साथ ही वे शत्रु को अपना पराक्रम दिखा कर उसका मनोबल तोड़ना और उसके पराक्रम का अनुमान भी करना चाहते थे। इसलिए सीता से मिलकर और उन्हे सांत्वना देकर जब वे निकले तब अपने को प्रकट करने का निश्चय किया।

इसी निश्चय के अनुपालन के लिए वे अशोक वाटिका (प्रमदा वन) को उजाड़ने लगे। रक्षक राक्षसियों ने जब रोका तो उन्हे डरा कर भगा दिया।

किंकर दल का विनाश

वाटिका के रक्षकों ने जाकर रावण को यह सूचना दिया। रावण ने सेना की एक विशेष टुकड़ी, जिसका नाम किंकर था, को हनुमान जी को पकड़ने के लिए भेजा। हनुमान जी ने उन सभी को मार डाला।

समस्त अशोक वाटिका नष्ट हो चुका था। केवल वह स्थान बचा हुआ था, जहाँ सीता जी बैठी हुई थी। किंकर दल का अंत हो गया।

अब हनुमान जी ने इस लड़ाई को थोड़ा बड़ा करने का सोचा। अतः वहाँ चले गए, जहाँ राक्षसों की  कुलदेवी का मंदिर (चैत्यप्रासाद) था। उन्होने उसके रक्षकों को मार डाला और चैत्य के खंभो और द्वारों को तोड़ दिया। इसके बाद वे चैत्यप्रासाद के द्वार पर खड़े हो गए।

अक्षकुमार, जंबुमाली आदि का वध

यह सूचना सुनकर रावण बहुत क्रुद्ध हुआ। हनुमान लड़ाई करते हुए राम जी का नाम लेते हुए अपना नाम बता रहे थे। “रामचंद्र की जय” घोष से राक्षसों को उनका परिचय मिल चुका था। रावण ने क्रमशः जम्बूमाली (मुख्य सेनापति प्रहस्त का पुत्र), मंत्री के सात पुत्र, अपने पाँच सेनापतियों और अपने पुत्र अक्ष कुमार (अक्षय कुमार) को भेजा। ये सभी वीर और बलवान थे। लेकिन भयंकर लड़ाई के बाद इन सबको उन्होने सहायकों सहित मार डाला।

मेघनाद द्वारा हनुमान जी को नाग पाश में बांधना

अब रावण को चिंता हुई। उसकी राजधानी में आकर एक वानर ने इतना उत्पात मचाया और इतने महाबलियों को मार डाला। यह कोई साधारण वानर नहीं हो सकता था। अशोक वाटिका की कुछ राक्षसियों ने उन्हे सीता से बातें करते देख लिया था। अतः उसने अपने पुत्र मेघनाद को भेजा। मेघनाद शक्तिशाली योद्धा होने के साथ-साथ कई तरह के मायाओं और दिव्य अस्त्रों का जानकार था।

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मेघनाद से हनुमान जी का युद्ध हुआ। जब साधारण अस्त्रों से वे नियंत्रण में नहीं आए तो मेघनाद ने उनपर ब्रहामास्त्र का प्रयोग किया। इसके प्रयोग से नाग की तरह के तीरों से उनका शरीर बंध गया।

हनुमान जी को ब्रहमा जी का वरदान था कि ब्रहमा जी का कोई भी अस्त्र उन्हे एक मुहूर्त से अधिक बाँध कर नहीं रख सकता था। साथ ही ब्रहमास्त्र के नागपाश का एक और नियम होता है कि यह किसी और पाश के साथ नहीं बंध सकता है। अर्थात अगर कोई व्यक्ति नागपाश से बंधा हो और उसे किसी और चीज से बाँध दिया जाय जो नागपाश अप्रभावी हो जाता है।

हनुमान जी को नागपाश में बंधा देख कर मेघनाद बहुत खुश हुआ। उसने रक्षकों से उन्हे रावण के पास ले चलने के लिए आदेश दिया। रक्षक रस्सी (वृक्षों के वल्कल) से बाँध कर उन्हे रावण की सभा में ले चले।

वरदान के प्रभाव और दूसरी रस्सी से बांधने के कारण हनुमान जी नागपाश से मुक्त हो चुके थे। इन रस्सियों को तोड़ना उनके लिए कोई कठिन काम नहीं था। लेकिन वे भी रावण से मिलना और नगर, सभाभवन, दुर्ग आदि देखना चाहते थे। इसलिए वे भी बंधे हुए की भाँति रक्षकों के साथ चलते रहे।

दरबार में जब मेघनाद ने उन्हे रस्सी से बंधे देखा तो वह समझ गया कि रक्षकों की मूर्खता के कारण ये नागपाश से मुक्त हो चुके थे। लेकिन इसका प्रयोग दुबारा नहीं किया जा सकता था। अतः वह चुप रहा। (उसे हनुमान से एक मुहूर्त में मुक्त होने के वरदान का पता नहीं था)।

रावण द्वारा हनुमान जी का पूंछ जलाने का आदेश

रावण के दरबार में उसके सेनापति प्रहस्त के पूछने पर हनुमान ने अपना परिचय राम के दूत के रूप में दिया।

उन्होने राम के प्रभाव का वर्णन करते हुए रावण से सीता को लौटा देने के लिए समझाया। हनुमान के निर्भीक बातों से क्रोधित होकर रावण ने उसे मारने के लिए कहा।

लेकिन विभीषण ने दूत के वध को अन्याय संगत बता कर कोई अन्य दंड देने का प्रस्ताव रखा। इस मानते हुए रावण ने उनके पूंछ को जलाने का आदेश दे दिया।

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राक्षसों ने हनुमान जी की पूंछ में कपड़ा बाँध कर उस पर तेल डाल दिया और फिर आग लगा दी। लेकिन इस अग्नि से हनुमान जी को कोई जलन नहीं हुई। अग्नि उनके पिता वायु के मित्र थे। इसलिए वे हनुमान जी के लिए शीतल बने रहे। वायु भी शीतलता के साथ बहने लगे। इधर सीता जी भी रक्षकों से उनके पूंछ को जलाए जाने के विषय में सुनकर उनके लिए प्रार्थना कर रही थी।

राक्षस हनुमान जी की पूंछ में आग लगा कर उन्हे नगर में घूमाने लगे। उन्हे किसी तरह की पीड़ा तो हो नहीं रही थी। उन्हे दिन के रौशनी में नगर और किला भी देखना था। सीता को सांत्वना देने और शत्रुओं को अपना बल दिखाने का कार्य भी हो चुका था। इसलिए हनुमान जी बिल्कुल शांत होकर नगर घूम रहे थे। उन्होने जानबूझ कर अपना बंधन नहीं खोला।

लंका दहन

जब लंकापुरी का पूरा निरीक्षण हो गया तब हनुमान जी ने शत्रुओं को थोड़ा सताने का विचार किया। अचानक से कूद कर वे किले की दीवार पर चढ़ गए। उन्होने अपने बंधन तोड़ लिए और अपनी पूंछ के आग से लंका के भवनों में आग लगाने लगे।

वे जलती पूंछ के साथ एक भवन से कूद कर दूसरे पर चले जाते और आग लगा देते। उस समय उनके पिता वायु देव लंका में तीव्र गति से बह ही रहे थे। शीघ्र ही समस्त नगर बहुत तेजी से जलने लगा।

जलने वालों में रावण और मेघनाद का घर भी था। लेकिन विभीषण का घर बच गया। समस्त नगर में हाहाकार मच गया। हनुमान जी ने नगर में आग लगा कर समुद्र में जाकर अपने पूंछ की आग बुझा ली।     

(राम जी ने हनुमान से नगर जलाने के लिए आदेश नहीं दिया था। लेकिन तृजटा ने स्वप्न देखा कि एक वानर लंका जला रहा था। जब वह यह स्वप्न सीता को सुना रही थी। तब हनुमान जी ने भी यह सुना। तब तक उनका ऐसा कोई विचार नहीं था। लेकिन रावण ने उनकी पूंछ में आग लगा कर स्वयं उन्हे यह अवसर दे दिया। हनुमान जी को भी समझ में आ गया कि जो कुछ हो रहा था, वह राम के इच्छा से ही हो रहा था।)          

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नगर जब जलने लगा तब हनुमान जी को सीता जी की भी चिंता हुई। पर, उन्हे यह विश्वास था कि सीता स्वयं इतनी तेजवती है कि अग्नि उन्हे जला नहीं सकती।

लंका में अपना कार्य समाप्त कर वापस जाने से पहले हनुमान फिर सीता से मिलने गए। उन्हे सांत्वना देकर और उनका आशीर्वाद लेकर वे वापसी के लिए चले।

सीता से मिलकर वे अरिष्टागिरि पर्वत पर जा चढ़े। यहाँ से उन्होने समुद्र के उत्तर तट पर, जहाँ अंगद, जांबवान आदि मित्र उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे, के लिए छ्लांग लगा लिया। उनके वेग से महेंद्र पर्वत की तरह अरिष्टा गिरि भी कुछ नीचे धँस गया।

हनुमान का अपने दल से पास वापस आना

समुद्र के उत्तर तट पर अपने मित्रों से मिलकर हनुमान जी ने अपनी लंका यात्रा का सारा वृतांत सुनाया। “सीता मिलने” का शुभ समाचार सुनकर वे सब आनंद और उत्साह से भर गए।

पर जब हनुमान जी ने उनसे सीता की बुरी अवस्था के विषय में बताया तो वे सब इतने उत्तेजित हो गए कि अंगद तो उसी समय लंका पर आक्रमण कर उनको ले आने के लिए उद्दत हो गए। लेकिन जांबवान जी ने उन्हे समझा कर शांत किया।

अब सब उछलते-कूदते हुए प्रवर्षण पर्वत (जहाँ राम उस समय रुके हुए थे) के लिए चले। वे जल्दी-जल्दी राम को यह समाचार बता कर सीता को मुक्त कराना चाहते थे। वहाँ पहुँचते समय उन सब को भूख लगी थी। अतः सुग्रीव के विशेष प्रिय उपवन “मधुवन” में वे सब चले गए। अति उत्साह से भरे हुए सारे वानर और रीछ ने वहाँ के फल खाए, मधु पिया और रोकने वाले रक्षकों को मार भगाया।

मधुवन के रक्षकों ने जब युवराज अंगद आदि द्वारा मधुवन को उजाड़ने के संबंध में किष्किन्धा जा कर सुग्रीव से शिकायत की, तब सुग्रीव को अनुमान हो गया कि वे सब शुभ समाचार लेकर आए हैं। उन्होंने सब को जल्दी से सबको बुलाया। और प्रवर्षण पर्वत पर जाकर राम जी को भी यह समाचार सुनाया।

हनुमान द्वारा राम को सीता का संदेश सुनाना

सभी वानरों ने सीता से मिलने का समाचार राम, लक्ष्मण, सुग्रीव आदि से बताया। फिर हनुमान ने सारा वृतांत राम जी को विस्तार से बताया। उन्होने सीता जी का संदेश और उनका दिया चूडामणि भी राम को दिया। राम भावुक होकर रोने लगे। फिर हनुमान की प्रशंसा कर उन्हे गले से लगा लिया।

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