राम

सीता हरण के बाद राम-भाग 33

लक्ष्मण को देख कर राम को सीता के ख़तरे में होने की आशंका

मारीच द्वारा उनकी आवाज में लक्ष्मण और सीता को पुकारने से राम को किसी छल की आशंका हुई। वे जल्दी से अपने आश्रम की तरफ लौटने लगे। तभी उन्हे पीछे से सियारनी के रोने की आवाज आई। कुछ और आगे बढ़े तो पक्षी और मृग आदि भी किसी अपशकुन का आभास दे रहे थे।

मारीच द्वारा सीता और लक्ष्मण का नाम लेने और उन अपशकुनों को देख कर उनका मन घबरा गया। वे जल्दी-जल्दी चलने लगे। तभी उन्हे रास्ते में लक्ष्मण आते दिखे।

राम ने लक्ष्मण से कहा कि उन्हे सीता को अकेले छोड़ कर नहीं आना चाहिए था, विशेषकर जब राक्षसों द्वारा प्रतिशोध की संभावना थी। सीता के दुर्वचन के बावजूद उन्हे इस तरह उत्तेजित नहीं होना चाहिए था। संभवतः सीता उन्हे आश्रम में नही मिलेंगी। सीता की सुरक्षा के लिए चिंतित दोनों भाई इस तरह बाते करते हुए तेजी से आश्रम पहुँचे।

राम, लक्ष्मण का सीता को आश्रम में नहीं पाना

राम की आशंका सच साबित हुआ। आश्रम में उन्हे सीता नहीं मिली। सीता को किसी राक्षस ने मार डाला या ले गया, इस आशंका से भयभीत दोनों भाई उन्हे ढूँढने लगे। कुश का आसन, बिखरे हुए फल आदि, जो सीता ने ब्राह्मण वेशधारी रावण को दिया था, किसी अनहोनी को बता रहे थे।

दोनों भाई आश्रम के आसपास के स्थानों, जहाँ वे फूल चुनने या जल लेने जा सकती थी, वहाँ जाकर देखा। फिर उन्हे लगा कहीं गोदावरी नदी से कमल के फूल लाने तो नहीं चली गई। राम ने ज़ोर से नाम लेकर पुकारते हुए बोला कि अगर मजाक में कही छिपी हो तो बाहर आ जाए, क्योकि यह समय मजाक का नहीं था। आश्रम के पास के वृक्षों, पशुओं और गोदावरी नदी से भी पूछा, लेकिन किसी ने रावण के डर से नहीं बताया। 

वे बार-बार उन स्थानो मे सीता को खोज रहे थे। राक्षस उन्हे मार कर खा गया होगा, कहीं ले गया होगा, क्या गुजरी होगी उन पर, सीता के माता-पिता को क्या उत्तर दूंगा, यही सब बोलते हुए राम रोते हुए उन्हे ढूँढ रहे थे। लक्ष्मण भी व्याकुल थे। ऐसे ही व्याकुल होकर खोजते हुए दोनों भाई दुबारा गोदावरी नदी के उस स्थान पर गए जहाँ सीता कमल का फूल लाने चली जाया करती थी। इससे पहले यहाँ लक्ष्मण अकेले सीता को ढूँढने आए थे।

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मृगों द्वारा सीता के अपहरण के दिशा का संकेत

तभी लक्ष्मण ने ध्यान दिया कि वहाँ के मृग उन्हे रोते और व्याकुल देख कर उनकी तरफ इस तरह देख रहे थे जैसे कुछ कहना चाह रहे हो। राम ने जब उनसे पूछा था कि सीता कहाँ है, तब वे मृग आकाश की तरफ मुँह उठा कर दक्षिण दिशा की तरफ दौड़ पड़े थे। वे मृग रुकते फिर आकाश और जमीन की तरफ देखते हुए भागते। लक्ष्मण ने कहा कि संभवतः ये मृग हमे दक्षिण दिशा की ओर ले जाना चाहते हैं।

(ऋषि-मुनियों के आश्रम के आसपास रहने वाले हिरण आदि जानवर आश्रम में रहने वाले लोगों से घुल-मिल जाते थे। रावण द्वारा सीता को ले जाने के विषय में आसपास रहने वाले वनवासियों और ऋषि-मुनियों ने संभवतः भयवश नहीं बताया। लेकिन इन मुक हिरणों से सीता का क्रंदन देखा था। वे समझ गए थे कि राम उन्हे ढूँढ रहे हैं। उन्होने राम को संकेतों द्वारा सीता पर जो बीती वह बताने का प्रयास किया।)

राम, लक्ष्मण को सीता के निशान मिलना

राम-लक्ष्मण दोनों भाई मृगों के संकेत को मानते हुए सावधानी से देखते हुए दक्षिण दिशा की तरफ बढ़े। कुछ दूर जाने पर उन्हे सीता के बालों से गिरे हुए फूल दिखे। इसके आसपास ही उन्हे राक्षस के और साथ ही सीता के पैरों के निशान भी दिखे। (यहीं सीता रावण के रथ से उतर कर उससे बचने के लिए इधर-उधर भागी थी।) ध्यान से देखने पर सीता के आभूषण के टुकड़े, धनुष, तरकश और रथ के कुछ टुकड़े भी मिले। वहाँ खून की कुछ बुँदे भी थी। 

ये सब वहाँ किसी भयकर द्वन्द्व युद्ध और साथ ही सीता के उपस्थिति का संकेत दे रहे थे। ऐसा भी संभव हो सकता था कि सीता के लिए दो राक्षसों में युद्ध हुआ हो और दोनों ने उन्हे मार कर खा लिया हो अथवा उनका हरण कर लिया हो। इस संभावना से दोनों भाई कांप उठे।

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इस वन में धर्म ने भी उनकी रक्षा नहीं की, यह सोच कर राम को क्रोध आ गया। वे समस्त संसार का ही विनाश करने की बात करने लगे। लेकिन लक्ष्मण ने किसी तरह उन्हे शान्त किया और केवल पापी शत्रुओं का विनाश करने के लिए समझाया। इसके लिए शांतचित्त होकर सीता का पता लगाना आवश्यक था।

राम, लक्ष्मण का घायल जटायु से मिलना

अब दोनों भाई इस आशा में आगे बढ़े कि वन में रहने वाले किन्नर, गंधर्व आदि संभवतः उन्हे सीता के विषय में कुछ बता सके। कुछ आगे बढ़ने पर उन्हे खून से लथपथ जटायु मिले। उन्होने राम को बताया कि सीता और उनके प्राण दोनों को हरने वाला रावण है। उन्होने अपना पूरा प्रयत्न किया लेकिन प्राण देकर भी सीता को नहीं बचा सके।

राम ने जटायु को गले लगा लिया। दोनों भाई उन्हे इस हाल में देख कर रोने लगे। जटायु के मुँह से खून निकल रहा था। वे ठीक से बोल नहीं पा रहे थे। फिर भी कठिनाई से वे इतना ही बता पाए कि मायावी राक्षस सीता को लेकर दक्षिण दिशा की ओर ले गया है।

उन्होने राम को सांत्वना देते हुए यह भी कहा कि जिस समय सीता को ले गया था वह “विन्द” नामक मुहूर्त था। इस मुहूर्त में खोया हुआ धन उसके स्वामी को जल्दी ही मिल जाता है। इसलिए सीता भी उन्हे मिल जाएगी और रावण का नाश होगा। इतना बोलते ही जटायु के मुँह से मांस युक्त रक्त बहने लगा। फिर भी उन्होने हिम्मत कर कहा “रावण विश्रवा का पुत्र और कुबेर का भाई है”। इतना बोलते ही उनके प्राण निकल गए। रावण कहाँ रहता था, आदि कुछ और वे नहीं बता पाए।

उनकी मृत्यु पर राम लक्ष्मण से बोले “इस समय मुझे सीता हरण का उतना दुख नहीं है, जितना कि मेरे लिए प्राण त्याग करने वाले जटायु की मृत्यु से हो रहा है।” इसके बाद राम और लक्ष्मण ने अपने पिता की तरह आदर से जटायु का अंतिम संस्कार किया।

(तुलसीदास द्वारा राम के विरह के साहित्यिक वर्णन से कुछ लोगों को यह लगता है कि सीता के वियोग में राम पागलों की तरह वृक्षों आदि से सीता का पता पूछते हुए घूम रहे थे। लेकिन वाल्मीकि रामायण से लगता है कि उनकी प्रतिक्रिया वैसी ही थी, जैसे एक विवेकशील और वीर व्यक्ति की होनी चाहिए।

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सीता के अपहरण के कुछ देर बाद ही उन्होने जटायु का विधिवत अंतिम संस्कार किया और कबंध को मारा। कुछ ही दिन बाद बिल्कुल शांत भाव से शबरी से मिले। वे दुबारा अपने आश्रम में नहीं गए। दोनों भाई राक्षस वध की अपनी प्रतिज्ञा और धर्मपालन के प्रति सतर्क रहते हुए तार्किक रूप से सीता को ढूँढ रहे थे।)

सीता का पता लगाने के लिए दक्षिण दिशा की तरफ बढ़ना

जटायु से राम को यह तो पता चल चुका था कि सीता जीवित है, अपहरण कर ली गई है और अपहरणकर्ता उन्हे दक्षिण दिशा में ले गया था। लेकिन अपहरणकर्ता के विषय में और कुछ पता नहीं था। जिस आधार पर वे जाकर सीता को खोज कर ले आते। उन्होने दक्षिण दिशा में आगे बढ़ने का निश्चय किया ताकि वन में रहने वाले लोग या राक्षस आदि उन्हे अपहरणकर्ता के विषय में कुछ बता सके।

अतः जटायु यह अंतिम संस्कार कर दोनों भाई सीता की खोज करते हुए दक्षिण-पश्चिम कोण की तरफ बढ़े। वे एक ऐसे रास्ते पर जा पहुँचे जिधर बहुत कम लोग आते-जाते थे। वहाँ का वन दुर्गम था। इसके बाद क्रौंचारण्य नामक गहन वन था। इन दोनों वनों को पार कर वे मतंग मुनि के आश्रम के पास पहुँच गए। वहाँ उन्हे एक गहरा और अंधेरा गुफा मिला।

योमुखी को घायल कर जीवित छोड़ना

इस गुफा के पास एक विकराल आकृति वाली राक्षसी थी। लक्ष्मण आगे चल रहे थे। राम उनसे कुछ पीछे थे। उस राक्षसी ने अचानक लक्ष्मण को अपनी बाँहों में कस कर पकड़ लिया। उसने अपना नाम अयोमुखी बताया और अपनी पत्नी बना कर उसके साथ रमण करने का आमंत्रण लक्ष्मण को दे डाला।

इस पर लक्ष्मण को क्रोध आ गया। उन्होने तलवार से नाक, कान और स्तन काट डाला। वह चिल्लाते हुए भाग गई। (लक्ष्मण की यह प्रतिक्रिया स्वाभाविक ही थी। शूर्पनखा के ऐसे ही व्यवहार के कारण आज उनकी भाभी ख़तरे में थीं। लेकिन फिर भी धर्म के अनुसार स्त्री का वध नहीं किया जा सकता था। अतः उन्होने उसे केवल घायल कर के छोड़ दिया।)

इसके बाद दोनों भाई तेजी से चलते हुए गहन वन में पहुँच गए। अचानक लक्ष्मण ने राम से किसी बड़े संकट के लिए तैयार रहने के लिए कहा क्योंकि उन्हे कुछ ऐसे अपशकुन हो रहे थे। लेकिन साथ ही एक शकुन युद्ध मे विजय का भी संकेत कर रहा था। (लक्ष्मण शकुन-अपशकुन बताने वाले विद्या के बहुत अच्छे ज्ञाता थे।)। यहीं कबंध से उनकी मुलाक़ात हुई।

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