सीता ने भूमि प्रवेश क्यों किया?-भाग 65

राम ने नैमिषारण्य में गोमती नदी के तट अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया। इसमें अयोध्या राजपरिवार के सभी सदस्य, उच्चाधिकारी, मंत्री गण, अयोध्या और अन्य जनपदों के ऋषि-मुनि, ब्राह्मण, अनेक राजा, राजकुमार आदि आए थे। राम के मित्र विभीषण, सुग्रीव, अंगद, निषाधराज इत्यादि भी शामिल थे। लक्ष्मण यज्ञ के घोड़े की रक्षा के लिए उसके साथ थे। इसलिए वे यज्ञ स्थल पर उपस्थित नहीं थे। यहीं वाल्मीकि ऋषि के आदेश से लव-कुश दोनों भाई यज्ञ स्थल के आसपास रामायण का गान करते हुए घूमते थे। उनके गायन ने श्रोताओं को बहुत प्रभावित किया। राम ने भी वह सुना। अब यज्ञ मंडप में यज्ञ संबंधी सभी कार्यों से निवृत होकर राम सहित समस्त जन समुदाय वहाँ बैठता था। उस में लव-कुश प्रतिदिन रामायण के 20-20 सर्ग गा कर सुनाते थे।

इसी रामायण से राम सहित सभी को निर्वासन के बाद का सीता की स्थिति का पता चला। उन्होने यह भी जाना कि सीता को जुड़वां बेटे हुए थे। जैसे-जैसे गान आगे बढ़ा लोगों को यह भी पता चला कि यह दोनों गायक बच्चे राम के ही बेटे थे। लोगों में चर्चा होने लगी कि सीता के साथ गलत हुआ था। वह सर्वथा निर्दोष थी और परित्याग के योग्य नहीं थी।

राम द्वारा सीता से शपथ की माँग

इस सभा में रामायण की कथा से जब राम सहित सबको पता चला कि “कुश और लव दोनों कुमार सीता के ही पुत्र हैं” तब राम ने एक दूत को वाल्मीकि के पास संदेश लेकर भेजा। संदेश यह था कि “यदि सीता का चरित्र शुद्ध है तो वे आप महामुनि की अनुमति ले यहाँ आकर जनसमुदाय में अपनी शुद्धता प्रमाणित करें। कल सबेरे जानकी भरी सभा में आए और मेरा कलंक दूर करने के लिए शपथ करें।”

दूत से उनका उत्तर लेकर आने के लिए कहा गया। वाल्मीकि ने कहा “रघुनाथ जी जो आज्ञा देते हैं, सीता वही करेगी।”

इस उत्तर से राम बहुत प्रसन्न हुए। उन्होने सभा से कहा “आप सब और अन्य भी जो कोई सीता का शपथ सुनना चाहते हैं, वह कल आ जाए। इस प्रकार सब लोग एकत्र होकर सीता का शपथ-ग्रहण देखें।” उपस्थित लोगों ने राम के निर्णय की प्रशंसा की।

सीता द्वारा शपथ ग्रहण

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अगले दिन सभा में बहुत भीड़ हो गई। सीता का शपथ देखने की उत्सुकता में बहुत से लोग आ गए थे। सभा शांत होकर बैठी थी। वाल्मीकि सीता को लेकर आए। “महर्षि के पीछे सीता सिर झुकाए चली आ रही थी। उनके दोनों हाथ जुड़े थे और आंखों से आँसू झर रहे थे। वे अपने हृदय मंदिर में बैठे हुए श्रीराम का चिंतन कर रही थीं।”

उन्हे देख कर दर्शकों का हृदय करुणा से भर गया। कोई राम की प्रशंसा कर रहा था तो कोई सीता की। कुछ दोनों की प्रशंसा कर रहे थे।

वाल्मीकि ने राम से कहा “मैंने दिव्य दृष्टि से जान लिया था की सीता का भाव परम पवित्र है। इसलिए यह मेरे आश्रम में प्रवेश पा सकी है। आपको भी यह प्राण से अधिक प्यारी है। आप भी यह जानते हैं कि सीता सर्वथा शुद्ध है तथापि लोकापवाद से कलुषित चित्त होकर आपने इसका त्याग किया है। ये दोनों कुमार कुश और लव जानकी के गर्भ से जुड़वे पैदा हुए है। ये आपके ही पुत्र हैं और आपके समान ही दुर्धर्ष वीर हैं।”

वाल्मीकि द्वारा सत्यता के लिए शपथ

वाल्मीकि ने अपने सत्यता की शपथ ली। फिर बोले “लोकापवाद से डरे हुए आपको सीता अपनी शुद्धता का विश्वास दिलाएंगी। इसके लिए आप इसे आज्ञा प्रदान करे।”

राम ने एक बार सीता की ओर देखा। फिर जनसमुदाय के बीच हाथ जोड़ कर वाल्मीकि से बोले कि “मुझे सीता की शुद्धता का पूरा विश्वास है। आपके कथन से यह और दृढ़ हो गया है। पहले भी देवताओं ने इसे प्रमाणित किया था। तब मैंने सीता को अपनाया था। लेकिन इसके बाद फिर जोरों का लोकापवाद उठा। केवल समाज के डर से मैंने सर्वथा निष्पाप सीता को छोड़ दिया था।

अतः मेरे इस अपराध को आप क्षमा करें। मैं जानता हूँ कि जुड़वा उत्पन्न कुश और लव मेरे ही पुत्र हैं। तथापि जन समुदाय में शुद्ध प्रमाणित होने पर ही सीता में मेरा प्रेम हो सकता है।”

राम के अभिप्राय को समझ कर सीता के शपथ-ग्रहण को देखने के लिए ब्रह्मा, इन्द्र, वसु, रुद्र इत्यादि सभी वहाँ आ गए। देवताओं और ऋषियों को उपस्थित देख कर राम बोले “सुरश्रेष्ठगण! यद्यपि मुझे महर्षि वाल्मीकि के वचनों से ही पूरा विश्वास हो गया है, तथापि जन-समाज के बीच विदेहकुमारी की विशुद्धता प्रमाणित हो जाने पर मुझे प्रसन्नता होगी।”

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सीता द्वारा सत्यता के लिए शपथ

इस समय सीता तपस्विनियों के अनुरूप गेरुआ वस्त्र धारण किए हुए थीं। सबको उपस्थित जानकार वे हाथ जोड़े, दृष्टि और मुख नीचे किए बोलीं–

“मैं श्रीरघुनाथ के सिवा दूसरे किसी पुरुष का (स्पर्श तो दूर रहा) मन से भी चिंतन नहीं करती। यदि यह सत्य है तो भगवती पृथ्वी देवी मुझे अपने गोद में स्थान दें।

यदि मैं मन, वाणी और क्रिया के द्वारा केवल श्रीराम की ही आराधना करती हूँ तो भगवती पृथ्वी देवी मुझे अपने गोद में स्थान दें।

भगवान राम को छोड़ कर मैं किसी पुरुष को नहीं जानती, मेरी कही हुई यह बात यदि यह सत्य है तो भगवती पृथ्वी देवी मुझे अपने गोद में स्थान दें।”

सीता का पृथ्वी में प्रवेश

देवी सीता के इस प्रकार शपथ करते ही भूतल से एक अद्भुत सिंहासन प्रकट हुआ। महापराक्रमी दिव्य नागों ने  उस दिव्य सिंहासन को सिर पर धारण कर रखा था। सिंहासन के साथ ही पृथ्वी की अधिष्ठात्री देवी भी दिव्य रूप में प्रकट हुई।

उन्होने सीता को अपनी दोनों भुजाओं से गोद में उठा लिया और स्वागत पूर्वक उनका अभिनन्दन कर उस सिंहासन पर बैठा लिया। उस सिंहासन पर बैठ कर सीता रसातल में प्रवेश करने लगी। समस्त देवता धन्य-धन्य करने लगे। आकाश से उन पर दिव्य फूलों की वर्षा होने लगी।

सीता के रसातल में जाते देख उपस्थित जनसमुदाय आश्चर्यचकित रह गया। कुछ देर वहाँ उपस्थित समुदाय मोहच्छन्न-सा हो गया। कोई हर्ष, कोई विषाद और कोई शोक से भर गया।

सीता के भूमि प्रवेश पर राम की प्रतिक्रिया

राम के आँखों से आँसू बहने लगे। वे गूलड़ के डंडे के सहारे खड़े रहे। कुछ देर के बाद शोक और क्रोध से युक्त होकर वे पृथ्वी से बोले “मुझे सीता लौटा दो; अन्यथा मैं अपना क्रोध दिखाउंगा। या तो तुम सीता को लौटा दो अथवा मेरे लिए भी अपनी गोद में स्थान दो; क्योंकि पाताल हो, या स्वर्ग, मैं सीता के साथ ही रहूँगा। तुम मेरी सीता लाओ नहीं तो मैं सारी भूमि का विनाश कर दूंगा।”

ब्रह्मा द्वारा राम को सांत्वना

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राम की इन बातों को सुन कर ब्रहमा बोले “आप मन में संताप न करें। आप अपने वैष्णव स्वरूप का चिंतन करें। साध्वी सीता आपके परम धाम को चली गईं हैं। अब पुनः साकेत धाम में आपकी उनसे भेट होगी।”

उन्होंने यह भी कहा कि “आपके चरित्र से संबंध रखने वाला यह काव्य जिसे आपने सुना है, वह सब काव्यों में उत्तम है। यह आपके सारे जीवन वृत का विस्तार से ज्ञान कराएगा। आप धर्मपूर्वक एकाग्र होकर भविष्य की घटनाओं से युक्त शेष रामायण काव्य को भी सुन लीजिए। आप सर्वतोत्कृष्ट राजर्षि हैं। अतः पहले आपको ही यह उत्तम काव्य सुनना चाहिए, दूसरों को नहीं।”

इतना कह कर ब्रह्मा अन्य देवताओं के साथ अपने लोक को चले गए। लेकिन उनके साथ आए ऋषि शेष उत्तर काण्ड सुनने के लिए वहीं रुक गए।

शेष उत्तरकाण्ड का गान

राम ने वाल्मीकि से अगले दिन से बचे हुए उत्तर कांड का गायन कराने के लिए कहा। कुश और लव को लेकर राम अपनी पर्णशाला में आ गए। अगले दिन भी राम की आज्ञा से उस काव्य का गायन कुश और लव ने किया।

यज्ञ की पूर्णाहुति

सीता के रसातल में जाने के बाद राम का चित्त बहुत दुखी हो गया था। कहीं भी उनके मन को शांति नहीं मिलती थी। इसी स्थिति में उन्होने यज्ञ पूर्ण किया।

यज्ञ के बाद इसे देखने के लिए आए राजाओं, ऋषियों, वानर, रीछ, राक्षस इत्यादि सबको विदा करने के बाद अपने दोनों पुत्रों कुश और लव के साथ अयोध्या लौट आए।

सीता के भूमि प्रवेश के बाद राम

राम अपने दोनों पुत्रों के साथ अयोध्या में रहने लगे। उन्होने किसी दूसरी स्त्री से विवाह नहीं किया। उन्होने अनेक प्रकार के यज्ञ अनेक बार किए। प्रत्येक यज्ञ में जब-जब धर्मपत्नी की आवश्यकता होती थी, सीता की स्वर्ण प्रतिमा बना लिया करते थे। उनका बहुत बड़ा समय धर्म पालन के प्रयत्न में ही बीतता था।

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