सीता की अग्नि परीक्षा-भाग 58

सीता की अग्नि परीक्षा रामायण के सबसे विवादित प्रसंगों में से एक है। इस प्रसंग के आधार पर राम को शताब्दियों से स्त्री विरोधी और कमजोर पति तक कहा जाता रहा है। विवाद दो प्रश्नों पर हैं: पहला, क्या सीता की अग्नि परीक्षा और फिर बाद में उनका वनवास मूल रामायण का भाग है? दूसरा, क्या राम एक शकी पति या बदनामी से डरने कर अपनी पत्नी का साथ छोड़ देने वाले पति थे? इन दोनों प्रश्नों पर चर्चा करने से पहले देखते हैं अभी जो वाल्मीकि रामायण उपलब्ध है उसमें इस प्रसंग का किस तरह से विवरण है:

सीता का राम के पास रणभूमि में आना

रावण के मरते ही उसकी बची-खुची सेना भाग कर नगर में चली गई। उसके सभी पुरुष संबंधी, उच्चाधिकारी और सेना नायक पहले ही मारे जा चुके थे। अतः अब लंका पर पूरी तरह राम का अधिकार हो गया। राम ने अपने वचन के अनुसार विभीषण का राज्याभिषेक करवा दिया। विभीषण की आज्ञा से सीता को ससम्मान रणभूमि में उनके पति राम के पास लाया गया। आगे-आगे सीता और उनके पीछे विभीषण चल रहे थे। सीता के चेहरे पर संकोच के और पति के लिए सौम्य स्नेह का भाव था।

सीता को पुनः पाकर राम की प्रतिक्रिया

लेकिन सीता के आगमन के समाचार से राम के मुख पर एक ही साथ प्रेम, प्रसन्नता, दुख और रोष सारे भाव आ गए। उनके चेहरे के भाव से प्रतीत हो रहा था कि वे पत्नी की तरफ से निरपेक्ष हो गए थे। उनके चेहरे पर प्रसन्नता का वह भाव नहीं था, जो एक चीर प्रतीक्षित वस्तु के मिलने से होना चाहिए। वे सीता से अप्रसन्न जान पड़ते थे। विभीषण, लक्ष्मण, सुग्रीव आदि इससे संशय में पड़ गए।

राम द्वारा सीता को कटु वचन कहना

राम के समीप पहुँच कर सीता ने पति का मुख देखा और विनयपूर्वक उनके पास खड़ी हो गई। राम ने सीता से कहा कि युद्ध में अपने पराक्रम द्वारा शत्रु को पराजित कर उन्होने अपने उज्जवल कुल पर लगे कलंक को मिटा दिया। उनकी अनुपस्थिति में उनकी पत्नी के अपहरण का दोष जो उन पर लगा था, उसका परिमार्जन हो गया था। वानर यूथपतियों और सैनिको का परिश्रम सफल हो गया। राम ने आगे इससे भी कटु बाते कही। उन्होने कहा कि ये सब परिश्रम उन्होने सीता को पाने के लिए नहीं बल्कि अपने कुल पर लगे कलंक को मिटाने के लिए और अपने लोकापवाद (बदनामी) के परिमार्जन के लिए किया था। अपने तिरस्कार का बदला चुकाने के लिए मनुष्य का जो कर्तव्य था, उसका पालन उन्होने कर लिया था।

उन्होने कहा “तुम्हारे चरित्र में संदेह का अवसर उपस्थित हो गया है। कोई भी कुलीन पुरुष किसी स्त्री को, जो दूसरों के घर में रही हुई स्त्री को केवल इस कारण स्वीकार नहीं करेगा कि वह उसके साथ बहुत दिनों तक रह कर सौहार्द स्थापित कर चुकी है। रावण तुम्हें अपनी गोद में उठा कर ले गया और तुम पर अपनी दूषित दृष्टि डाल चुका है। तुम जैसी मनोरम नारी को अपने घर में देख वह अधिक दिनों तक तुम से दूर नहीं रह सका होगा। ऐसी दशा में अपने कुल को महान बताता हुआ मैं फिर तुम्हें कैसे ग्रहण कर सकता हूँ।”

ऐसा कह कर राम ने सीता से अपनी इच्छा अनुसार कहीं भी चले जाने के लिए कहा। वे चाहती तो भरत, लक्ष्मण, सुग्रीव, विभीषण या किसी अन्य के घर भी रह सकती थी।

सीता राम की हृदयबल्लभा थी। लेकिन आज लोकापवाद के भय से उनका हृदय इस तरह कठोर हो गया था।

राम की कठोरता पर सीता की प्रतिक्रिया

इतने लोगों के सामने अपने चरित्र पर ऐसा आक्षेप सुन कर सीता व्यथा से तिलमिला उठी। पति ने उन्हे कभी कोई कठोर वचन नहीं बोला था। लेकिन आज उनके वाणी की कठोरता रोंगटे खड़े करने वाला था।

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उन्होने राम को उलाहना दिया कि अगर ऐसी बात थी तो जब लंका में हनुमान उन्हे ढूँढने आए थे, उसी समय उन्हे त्याग देना चाहिए था। अगर वे ऐसा करते तो उसी समय अपने प्राण त्याग देती और उनके कारण सब को व्यर्थ मे कष्ट नहीं उठाना पड़ता।

सीता ने यह भी कहा कि वे साधारण स्त्री नहीं है। भूतल से प्रकट हुई है। इसलिए उनके चरित्र और आचार-विचार दिव्य है। लेकिन राम ने रोष में आकर उनके शील-स्वभाव, आचार-विचार और उनके प्रति अपनी भक्ति को भूल कर निम्न कोटि की स्त्री की तरह उनके चरित्र पर संदेह किया है। 

क्रोध, दुख और अपमान के कारण सीता गला बोलते-बोलते रूँध गया। आँखों में आँसू आ गए। उन्होने लक्ष्मण से अपने लिए चिता तैयार करने के लिए कहा। “मिथ्या कलंक से कलंकित होकर मैं जीवित नहीं रह सकती।”

राम-सीता के संवाद पर उपस्थित अन्य लोगों की प्रतिक्रिया

लक्ष्मण को अपने बड़े भाई का यह व्यवहार उचित नहीं लगा। सीता का यह अपमान उनके लिए असहनीय था। उन्होने क्रोध से राम की ओर देखा। लेकिन राम ने उन्हे संकेत कर दिया कि सीता जैसा कहती है, वैसा ही करे।

वहाँ उपस्थित सुग्रीव, विभीषण, हनुमान, आदि भी सीता के अपमान से क्षुब्ध थे। लेकिन उस समय राम के चेहरे पर क्रोध और क्षोभ का जो भाव था, इससे किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी कि उन्हे कुछ कहे। उनका चेहरा देखने से उस समय भय होता था।

सीता द्वारा स्वेच्छा से अग्नि में प्रवेश

सीता के कहने (और राम के अनुमोदन) से लक्ष्मण ने चिता तैयार किया। राम चुपचाप सिर झुकाए खड़े थे। सीता ने उनकी परिक्रमा की। राम ने कोई प्रतिक्रिया नहीं प्रकट किया। पति की परिक्रमा कर वे अग्नि के समीप गई। देवताओं और ब्राह्मणों को प्रणाम कर अग्नि से बोली “यदि मेरा हृदय कभी एक क्षण के लिए भी श्रीरघुनाथ जी से दूर न हुआ हो, तो संपूर्ण जगत के साक्षी अग्निदेव मेरी सब ओर से रक्षा करें।” ऐसा कह कर सीता ने अग्नि की परिक्रमा की और शान्त भाव से उस प्रज्वलित अग्नि में प्रवेश कर गईं।

(जैसा की माना जाता है कि राम ने सीता की अग्नि परीक्षा की। लेकिन वाल्मीकि रामायण के अनुसार उन्होने किसी परीक्षा की माँग नहीं की। बल्कि बदनामी के भय से सीता को त्याग देने का विचार किया। उनके कठोर और अपमानजनक वचन, जो उन्होने सार्वजनिक रूप से कहा था, के कारण सीता ने स्वयं अग्नि में प्रवेश करने यानि परीक्षा देने का निश्चय किया। राम ने इस पर मौन सहमति दी।)

वहाँ विशाल जन समुदाय उपस्थित था। इसमें सुग्रीव के सैनिकों के अतिरिक्त लंका के भी लोग थे। सीता को इस तरह अग्नि में प्रवेश करते हुए सभी चेष्टाशून्य हो कर देखते रह गए। उनके अग्नि मे प्रवेश करते ही लंका की जो स्त्रियाँ वहाँ थीं, उनकी चीखें निकल गई। वानर और राक्षस भी हाहाकार करने लगे।

सीता के अग्नि में प्रवेश पर राम का अवसादग्रस्त होना

जब इन सब हाहाकार और चित्कार की आवाज राम के कानों में पड़ी तब वे मन-ही-मन बहुत दुखी हुए। उनके आँखों में आँसू आ गए। वे अवसाद की अवस्था में कुछ देर सोचते रहे। तभी ब्रहमा, शंकर, इन्द्र, कुबेर, यमराज आदि देवता अपने-अपने दिव्य विमानों में बैठ कर राम के पास आए। राम ने उन्हे प्रणाम किया।

देवताओं का सीता के सतीत्व के लिए गवाही

इन सभी देवताओं ने राम की स्तुति की। ब्रह्मा ने भी उनकी स्तुति की और उन्हे साक्षात विष्णु का अवतार बताया। साथ ही सीता की पवित्रता को सत्यापित किया। ब्रहमा की बात समाप्त होते ही में से मूर्तिमान अग्नि देव सीता को लेकर प्रकट हुए।

अग्नि का कोई भी प्रभाव सीता पर नहीं था। यहाँ तक कि उनके द्वारा पहने गए फूलों के हार भी मुरझाए नहीं थे। अग्नि देव ने सीता के निर्दोषता का प्रमाण देते हुए कहा “सीता सर्वथा निष्पाप है। आप इसे सादर स्वीकार करें। मैं आपको आज्ञा देता हूँ, आप इससे कभी कोई कठोर बात न कहें।”

राम द्वारा सीता को स्वीकार करना

अग्नि देव के ये बातें सुनकर राम प्रसन्न हो गए। उन्होने कहा कि उन्हे सीता के चरित्र पर पूरा विश्वास था। लेकिन लोगों को विश्वास दिलाने और बदनामी रोकने के लिए उन्होने उनकी परीक्षा ली थी। इसीलिए उन्होने अग्नि में प्रवेश करती सीता को रोका नहीं। ऐसा कह कर उन्होने सीता को अपना लिया।

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दशरथ जी का आना

आकाश में विमान द्वारा राम के पिता दशरथ भी आए। उन्हे इन्द्र लोक मिला था। राम, लक्ष्मण और सीता- तीनों ने उन्हे प्रणाम किया। पुत्रों को देख कर दशरथ बहुत ही प्रसन्न हुए। अपने दोनों पुत्रों और पुत्र वधू को आशीर्वाद देकर और पुत्र वधू से अपनी परीक्षा के लिए राम के प्रति कोई विपरीत भाव नहीं लाने का आग्रह कर दशरथ अपने लोक को चले गए।

अग्नि परीक्षा संबंधी विवाद

सीता की अग्नि परीक्षा क्या रामायण का मूल अंश है?

किसी भी प्रसंग को उसके समस्त संदर्भ में ही समझा जा सकता है। अग्नि परीक्षा वाले प्रसंग के रामायण का मूल भाग होने के विरुद्ध ये प्रमाण हैं: 

  • अग्नि परीक्षा का उल्लेख किसी वैदिक ग्रंथ और रामायण में नहीं होना

अग्नि परीक्षा जैसी प्रथा मध्य काल में शुरू हुई थी। सीता के अतिरिक्त किसी और के अग्नि परीक्षा का कोई उल्लेख रामायण, वेद या वेदांग, उपनिषद या आरण्यक जैसे ग्रन्थों में नहीं है। जनकपुरी के आसपास रहने वाली अहल्या के व्यभिचार के प्रमाण होने पर भी ऐसी किसी परीक्षा या दण्ड का कोई उल्लेख नहीं है।

  • अन्य प्राचीन ग्रंथों में प्रक्षिप्त अंश

जब प्रिंटिंग प्रेस नहीं था। पुस्तकों की बहुत कम हस्तलिखित प्रतियाँ ही उपलब्ध होती थी। इसका अधिकांश प्रचार-प्रसार मौखिक रूप से ही होता था। इस क्रम में यह बहुत कठिन नहीं था कि एक कान से दूसरे कान तक आते-जाते इसका रूप बदल गया हो। यह एक सामान्य अनुभव का विषय है और बहुत-से अपेक्षाकृत नए पुस्तकों में ऐसे परिवर्तन किए गए हैं, जिसके प्रमाण उपलब्ध हैं।

  • कभी-कभी जानबूझ कर अपने विचारों को ऐसे पुस्तकों में चालाकी से शामिल कर दिया जाता था, जिसे जनमानस में बहुत सम्मान प्राप्त था। इससे उसके विचार को प्रमाणिकता मिलती थी।

ऐतिहासिक रूप से ऐसा माना जाता है कि जब बौद्ध और जैन का अधिक प्रचार हो गया तो इसकी प्रतिक्रिया में सनातन धर्म के अनुयायियों ने अपने धर्म को अधिक मजबूती से स्थापित करने के लिए सचेत रूप से प्रयास किया। इसी क्रम में सभी प्राचीन ग्रंथों को फिर से लिखा गया। यह प्रक्रिया गुप्त काल में सबसे अधिक हुई।

रामायण के कथानक में अनेक विचलन

ऐसे ही परिवर्तनों का परिणाम यह है कि ऋषि वाल्मीकि द्वारा लिखे गए राम के मूल कथा के आधार पर अनेक भाषाओं और स्थानों पर अनेक नाम से राम कथाएँ लिखी गई। इस सब के कथानक में बहुत अन्तर भी है।

ऐसे में यह पता लगा पाना कठिन होता होता है कि कौन-सा ग्रंथ का मूल भाग है और कौन-सा बाद में जोड़ा गया है। फिर भी उस ग्रंथ के अधिकांश भाग के संदर्भ, विचार, भाषा आदि के आधार पर इसका अनुमान लगाया जा सकता है।

बहुत से लेखक यह मानते हैं कि रामायण का संपूर्ण उत्तरकांड बाद में जोड़ा गया है। पहले के छह कांड में भी कई जगह कथा में व्यवधान और विसंगति से ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ श्लोक बाद में जोड़े गए हैं। 

छह विवादस्पतद श्लोक

बहुत-से लेखक अग्नि परीक्षा वाले भाग को भी बाद में जोड़ा गया प्रसंग मानते हैं। कारण यह है कि रामायण की कथा जिस प्रवाह में चल रही थी, उसमें केवल छह श्लोक ऐसे हैं जो पूरे कथानक को एक अलग दिशा में मोड़ देते हैं। उसके बाद फिर कथा अपने पुराने प्रवाह में लौट आती है। सीता राम के पास लायी जाती है और सौम्य भाव से वहाँ खड़ी होती है। इसके बाद के छह श्लोक में राम द्वारा कटु वचन कहने, सीता द्वारा अग्नि में प्रवेश, देवताओं और दशरथ जी का आकाश में प्रकट होना आदि नाटकीय घटनाक्रम होता है।

अग्नि देव राम को “सीता को स्वीकार करने का आदेश” देते हैं। ब्रह्मा राम को “विष्णु रूप होने की याद दिलाते” हैं। जबकि कुछ देर पहले ही जब राम रावण का वध करते हैं तो सभी देवताओं ने आकर उनकी स्तुति की थी, राम को याद था कि वे विष्णु के अवतार थे। सारे रामायण में सभी देवता राम की स्तुति और विनती ही करते हैं केवल यही एक ऐसा श्लोक है जहां अग्नि देव राम को “आदेश” देते हैं।

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इन छह श्लोक के बाद फिर कहानी वहीं से शुरू होती है, जैसे सीता राम के बगल में खड़ी थी। इसके बाद राम फिर उन से वैसे ही स्नेह और सम्मान से व्यवहार करते हैं, जैसे पहले करते थे। लौटते समय वे रास्ते में आने वाले उन सभी स्थानों को प्रेम से सीता को दिखाते हैं जहां वे उनके बिना गए थे। उनके कहने पर किष्किन्धा में रुक कर सुग्रीव आदि की पत्नियों को साथ लेते हैं और सब को लेकर अयोध्या आते हैं। इनमें सुग्रीव की वह पत्नी भी शामिल थी, जो कई वर्षों तक अपने जेठ बाली द्वारा पत्नी बना कर रखी गई थी।

इतने बड़े अपमान के बाद सीता की मानसिक स्थिति बिलकुल सामान्य है। इससे लगता है, ये छह श्लोक बाद में जोड़े गए हैं और कथा के प्रवाह में एक व्यवधान की तरह आते हैं। 

इतना नाटकीय वर्णन इन छह श्लोक और उत्तर काण्ड से पहले पूरे रामायण में और कहीं नहीं है। यहाँ तक कि जब राम ने रावण को मारा या अकेले खर-दूषण के चौदह हजार राक्षसों की सेना को मारा, तब भी देवताओं का इतना नाटकीय आगमन नहीं हुआ।

ग्रंथ के अन्य संदर्भों से विचलन

  • ग्रंथ के आरंभ से लेकर सीता के परीक्षा तक सभी जगह राम स्त्रियों के प्रति उदार दृष्टिकोण रखते हैं। उस समय का समाज भी ऐसा ही प्रतीत होता है। राम की सौतेली माँ ने अपने पति के साथ युद्ध में भाग लिया। युद्ध में स्त्रियों को वही समाज इजाजत दे सकता है, जो उनके युद्ध बंदी बन जाने के बाद की स्थिति को भी स्वीकार करता हो। यहाँ तक कि आज भी बहुत-से देश युद्ध के मैदान में अपने स्त्री सैनिकों को भेजने की हिम्मत नहीं कर पाते हैं। कौशल्या को उनके व्यक्तिगत खर्च के लिए 1000 गाँव मिले हुए थे।
  • स्वयं राम ने पतिव्रत से च्युत हुए अहल्या को उचित सम्मान दिया था। उनके मित्र सुग्रीव की पत्नी रुमा बाली द्वारा बहुत दिनों तक बलपूर्वक पत्नी बना कर रखी गई थी। बाली को छल पूर्वक मारने को राम ने इसी कारण धर्मसंगत सिद्ध किया था। सुग्रीव के मामले में दूसरे पुरुष के कब्जे में रही पत्नी को अपनाने में उन्होने कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाया था। वे स्वयं अपनी पत्नी को, जो रावण द्वारा बलपूर्वक बंदिनी बना कर रखी गई थी, इसी कारण से कैसे लांछित कर सकते थे।
  • इतना ही नहीं जब से सीता का हरण हुआ था, राम उनके वियोग में तड़पते रहे थे और उनकी कुशलता के लिए चिंतित थे। कभी भी उन्होंने यह प्रकट नहीं किया कि ‘अपवित्र’ हो जाने के कारण अब वे उनके साथ नहीं रहना चाहते थे।
  • युद्ध समाप्त होने के बाद राम ने यह शुभ समाचार देने हनुमान को सीता के पास भेजा, इस समय भी वे प्रसन्न थे। वाल्मीकि जी कहते हैं कि उस रात राम और सारे सैनिक आराम से सोए। (क्योंकि दस दिनों तक दिन-रात युद्ध होने के करण उन्हे आराम नहीं मिला था) यहाँ तक कि जब सीता युद्धभूमि में राम के पास लाई गई, तब उन्होंने उन्हें पैदल लाने के लिए कहा और स्त्री के लिए पर्दा की जरूरत को अस्वीकार किया था।
  • राम कहीं भी यह विचार प्रकट नहीं करते हैं कि पतिव्रता स्त्री अग्नि-रोधी हो जाती है। (जो अग्नि परीक्षा का सिद्धांत हैं)। अन्य संदर्भों से राम एक वैज्ञानिक दृष्टि सम्पन्न व्यक्ति लगते हैं। ऐसा अतार्किक दृष्टिकोण उनके व्यक्तित्व से मेल नहीं खाता लगता हैं।
  • यहाँ तक राम का व्यक्तित्व सीता के प्रति बहुत ही सहज है। विवादास्पद छह श्लोक के बाद अचानक कथा अपने मूल रूप में लौट आती है। राम सीता के साथ प्रसन्न खड़े हैं जैसे कि छह श्लोक पहले थे। राम पहले की ही तरह सीता से प्रेम करते हैं और स्त्रियों को सम्मान देते हैं।

भाषा शास्त्रीय आधार

कई भाषाशास्त्री इन छह श्लोक और उत्तर काण्ड में प्रयुक्त भाषा और शैली को वाल्मीकि के मूल भाषा और शैली से भिन्न बताते हैं।

इन प्रमाणों के आधार पर अब अधिकांश विद्वान मानते हैं कि अग्नि परीक्षा वाले छह श्लोक और सम्पूर्ण उत्तर कांड रामायण का भाग नहीं है। बल्कि पूर्व मध्यकाल में, जब समाज में स्त्रियों की स्थिति गिरी, तब अपने इस विचार को अधिक मान्य बनाने के लिए रामायण में ये जोड़े गए। इन्हीं जोड़े गए अंशों के आधार पर राम को कमजोर पति और स्त्री विरोधी साबित किया जाने लगा। राम को इसी कलंक से बचाने के लिए तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में अपहरण से पहले सीता को अग्नि में छुपा कर उनकी प्रतिछाया को रखने का वृतांत दे दिया है।

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