श्रीकृष्ण ने आग से बृजवासियों की रक्षा कैसे किया?-भाग 18

वृजवासियों पर आग का संकट   

कालिय नाग का मान मर्दन कर कृष्ण जब आए तब उनसे मिलने और दान आदि के बाद ब्रजवासी और गाएँ सब बहुत थक गए थे। भूख-प्यास भी लगी हुई थी। गर्मी का समय था। अतः सभी बृजवासी वहीं पर यमुना नदी के किनारे ही सो गए। गर्मी का मौसम होने के कारण वन के वृक्ष सूखे हुए थे। रात को अचानक वन में आग लग गई।

अग्नि के दहन से जब ब्रजवासियों की नींद खुली तो उन्होंने अपने को अग्नि से गिरा हुआ पाया। 

कृष्ण द्वारा रक्षा

उन्होने श्रीकृष्ण से अपनी रक्षा की प्रार्थना की। श्रीकृष्ण ने अपने संबंधियों को व्याकुल देखा तो वह उस भयंकर अग्नि को पी गए। श्रीकृष्ण द्वारा अग्नि को पीने के घटना की अनेक प्रकार से व्याख्या की गई है।

इस घटना के बाद आनंदित श्री कृष्ण अपने सगे-संबंधियों के साथ उनके मुँह से अपनी लीला का गान सुनते हुए अपने घर को गए। इस प्रकार अपनी योगमाया से ग्वाल की तरह का वेश बनाकर बलराम और श्याम ब्रज में क्रीड़ा कर रहे थे।

श्रीकृष्ण द्वारा दुबारा अग्निपान करना

प्रलम्बासुर के वध के बाद फिर इस तरह का आग का संकट वृजवासियों पर आया। इस बार भी कृष्ण ने उन्हें बचाया। कथा इस प्रकार है।

प्रलंबासुर के वध के बाद कृष्ण दोनों भाई और उनके मित्र फिर खेलकूद में लग गए। जब वे इस तरह से खेलकूद में लगे हुए थे उस समय उनकी गायें बेरोकटोक चरती हुई बहुत दूर निकल गई और गहन वन में घुस गईं।  उनकी बकरी, गाय और भैंस चरते हुए एक वन से दूसरे वन में चली गई थी। वे गर्मी और प्यास से व्याकुल होकर बेसुध सी हो गई। इस हालत में वे सरकंडे के एक वन में घुस गई।

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जब इधर श्री कृष्ण के मित्रों ने देखा कि गाय आसपास कहीं नहीं है तो उन्हें अपने खेल पर पश्चाताप हुआ क्योंकि गाय ही तो ब्रज वासियों की जीविका का साधन थी। गाय के खूर और दांतो से कटी घासों के निशान को देखते हुए वे आगे बढ़े।

अंततः उन्हे सरकंडे के वन में रास्ता भूल कर डकारती हुई गाएँ मिली। वे सब बहुत थकी हुई और प्यासी थी। उस समय श्री कृष्ण सभी गायों को उसका नाम लेकर पुकारने लगे। गायें अपने नाम सुनकर अत्यंत हर्षित हुई और उत्तर में हुंकारने और रंभाने लगी। श्री कृष्ण जब गायों को इस तरह पुकार ही रहे थे कि उस वन में अकस्मात आग लग गई। साथ ही बड़े जोरों की आंधी भी चलने लगी जिससे वह अग्नि और फैल गई।

वन में रहने वाले सभी जीव जन्तु जलने लगे। ग्वालबालों ने इस भयंकर अग्नि को देखकर घबराकर श्री कृष्ण के शरण में अपने को अर्पित कर दिया। उनके दीन वचन सुन कर श्रीकृष्ण ने कहा “डरो मत, तुम अपनी आंखें बंद कर लो”। ग्वालबालों ने ऐसा ही किया। तब योगेश्वर श्रीकृष्ण ने उस भयंकर अग्नि को अपने मुँह से पी लिया।

कालिय दमन वाली रात को उन्होंने सबके सामने अग्नि का पान किया था। अभी उन्होंने अपने मित्रों की आँखें बचा कर यानि उन्हें बंद करवा कर पुनः अग्नि का पान किया।

कृष्ण द्वारा अपने को अग्नि से बचाया गया देखकर वे ग्वालबाल बहुत ही विस्मित हुए। उन्होंने श्री कृष्ण की इस योगसिद्धि और योगमाया के प्रभाव के कारण उन्हें देवता समझा।

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