श्रीकृष्ण का अवतार क्यों हुआ?-भाग 2 

(गीता प्रेस से प्रकाशित श्रीमदभागवत के दशम स्कन्ध पर आधारित)  

श्रीकृष्ण अवतार की पृष्ठभूमि

द्वापर युग में दैत्यों द्वारा अभिमानी राजाओं के रूप में अपने अत्याचारों से सबको पीड़ित करना श्रीकृष्ण अवतार का तात्कालिक कारण बना। इन दैत्यों से आक्रांत हो कर पृथ्वी गाय का रूप धारण कर ब्रहमाजी के पास गई। उसकी पीड़ा सुन कर ब्रहमाजी गौ रूपधारिणी पृथ्वी, भगवान शंकर तथा अन्य सभी देवताओं को साथ लेकर क्षीर सागर के तट पर गए।

भगवान का पृथ्वी पर अवतार लेने के लिए वचन देना

क्षीर सागर के तट पर ब्रह्मा जी ने “पुरुषसूक्त” गाकर अपने इष्टदेव परमपुरुष सर्वांतर्यामी प्रभु की स्तुति की। इस सूक्त का संकलन ऋग्वेद में है। स्तुति करते-करते ब्रहमाजी समाधि में लीन हो गए। इस अवस्था में उन्होने आकाशवाणी सुनी।

आकाशवाणी सुनने के बाद ब्रहमाजी ने सभी देवताओं से कहा कि भगवान को पृथ्वी की पीड़ा का पहले से ही पता था। इसके हरण के लिए वे धरती पर अवतार लेकर लीलाएँ करेंगे। वे अपने अंशों सहित यदुकुल मे जन्म लेंगे। भगवान स्वयं वसुदेवजी के पुत्र के रूप मे अवतार लेंगे। भगवान शेष उनसे पहले उनके बड़े भाई के रूप मे अवतार लेंगे।

अन्य देवताओं का पृथ्वी पर मानव रूप में आना

ब्रह्मा जी ने सभी देवताओं को भी अपने-अपने अंशों के साथ यदुकुल मे जन्म लेकर भगवान के धरती पर रहने तक उनका सहयोग करने के लिए कहा। सभी देवताओं ने प्रसन्न होकर ब्रहमाजी के आदेश का पालन किया। इस तरह श्रीकृष्ण जन्म की पृष्ठभूमि निर्मित हो गई। 

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भगवान के अवतार के कारण

यद्यपि जब देवताओं को भगवान ने धरती पर मानव रूप में आने का वचन दिया उस समय धरती पर दुष्ट और शक्तिशाली राजाओं और राक्षसों ने तबाही मचा रखी थी। और यही उनके अवतार के प्रत्यक्ष और तात्कालिक कारण दृष्टिगोचर होते थे।

पर भगवान के पृथ्वी पर आने का प्रत्यक्ष कारण भले ही किसी अत्याचारी का विनाश होता है लेकिन इससे भी बड़ा कारण होता है अपने भक्तों को सुख देना। एक ऐसी परमशक्ति जिसका न कोई नाम हो, न रूप हो, न कोई अपना हो न पराया, जिसकी कोई इच्छा भी न हो, उसे सामान्य लोग कैसे याद रखेंगे? स्वयं देवता भी उनका सानिध्य नहीं पाते हैं। इसीलिए वे एक साकार रूप लेकर पृथ्वी पर आते हैं। उनके आते ही देवता, उनके भक्त आदि भी विभिन्न रूप में पृथ्वी पर आ जाते हैं ताकि इस समय तो कम-से-कम उनके सानिध्य का अवसर मिले।

इस साकार रूप को, उनके कार्यों और विचारों को, लोग जानते, देखते, सुनते और कहते हैं। अत्याचारी राक्षसों को तो वे बिना अवतार लिए भी मार सकते थे। लेकिन वे मानव रूप में रह कर मानव के लिए उचित मर्यादाओं का पालन करते हुए, उनकी भावनाओं, कमियों और खूबियों के अनुरूप कार्य कर मानव मात्र के लिए जीवन जीने का एक आदर्श प्रस्तुत करते हैं।

भगवान के जीवन को लीला क्यों कहते हैं?

भगवान का जीवन लीला कहलाता है। लीला यानि नाटक। जिसमें सबकुछ पहले से तय होता है और निर्देशक के नियंत्रण में रहता है। यह नियंता और निर्देशक भगवान स्वयं होते हैं।

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भगवान के जन्म को क्यों अवतार कहते हैं?

उनका शरीर यद्यपि मानव शरीर जैसा ही दिखता है लेकिन आम मानव शरीर जन्म लेता है, बीमार होता है, बूढ़ा होता है और मरता है। पर भगवान का पार्थिव शरीर भी इससे अलग होता है। वह अपनी इच्छा से अनुकूल समय, स्थान और रूप में धरती पर आते हैं, न तो बीमार, न बूढ़े होते हैं और न ही शरीर का त्याग करते हैं। वास्तव में उनका अवतारी शरीर उनकी साक्षात मूर्ति होती है। राम और कृष्ण दोनों का अपने शरीर के साथ ही अपने धाम में गमन का वर्णन है। दोनों हमेशा युवा ही रहे थे। इसलिए भगवान का जन्म नहीं बल्कि अवतरण यानि कि अवतार होता है।

भगवान की मृत्यु क्यों नहीं होती है?

भगवान के अवतारी शरीर की मृत्यु नहीं बल्कि स्वधाम गमन होता है। इसका कारण यह है कि उनका शरीर धरती पर उनकी मूर्ति के समान होती है। अगर वे शरीर को छोड़ कर अपने धाम जाएंगे तो शरीर को जलाना पड़ेगा। भगवान की मूर्ति को जलाने से दोष लगेगा। राम और कृष्ण दोनों ही अपने शरीर के साथ ही गए थे। शरीर छोड़ना मृत्यु के लिए अनिवार्य है। इसलिए राम और कृष्ण का धरती से जाना स्वधाम गमन था, ‘मृत्यु’ शब्द का प्रयोग इसके लिए उचित नहीं है।    

कंस कौन था?

कंस कृष्णावतार का मुख्य खल पात्र था यद्यपि उससे भी भयंकर अनेक शत्रुओं का कृष्ण ने संहार किया था। लेकिन रामावतार के रावण से अलग वह कृष्ण के कुल का और माता की ओर से उनका निकट संबंधी यानि चचेरा मामा था।

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इस समस्त समीकरण को समझने के लिए उस समय के राजनीतिक-प्रशासनिक स्थिति को समझना होगा। समस्त यादवों की सभी शाखा वृषणी या भोज वंश को अपना अधिराज मानते थे। इनकी राजधानी मथुरा थी। इस वंश का राजा उग्रसेन बहुत सात्विक प्रवृति का और प्रजा का कल्याण चाहने वाला राजा था।

पर उग्रसेन का पुत्र था कंस अपने पिता के विपरीत बहुत अत्याचारी और पापकर्म करने वाला था। वह बहुत शक्तिशाली भी था। उसे उसके कुछ शक्तिशाली मित्रों का सहयोग भी मिलता था।  

कंस के मित्र

अत्याचार के कार्य में कंस का सहयोग उसके कई दैत्य मित्र किया करते थे। उसके दैत्य मित्रों में सबसे महत्वपूर्ण थे–

प्रलंबसूर, बकासुर, चानूण, तृणावती, अघासुर, मुष्टिक, अरिष्टासुर, द्विविद, पूतना, केशी और धेनुक। बाणासुर और भौमासुर आदि दैत्य राजाओं से भी उसके मैत्रीपूर्ण संबंध थे।

मगध नरेश जरासंध, जो उस समय के सबसे शक्तिशाली शासकों में से था, भी उसका मित्र था। बाद में कृष्ण ने कंस के अतिरिक्त इन सबका वध भी किया था।

कंस का राजा बनना

इन मित्रों की सहायता से कंस बहुत शक्तिशाली हो गया था। उसके पिता राजा उग्रसेन उसके गलत कार्यों का विरोध करते थे। इसलिए कंस ने अपने मित्रों के सहयोग से पिता को बलपूर्वक पदच्युत कर बंदी बना लिया और स्वयं राजा बन बैठा। उग्रसेन को अन्यायपूर्ण तरीके से पदच्युत कर बंदीगृह में डालना प्रजा को पसंद नहीं आया। लेकिन कंस की शक्ति का विरोध करने की न तो किसी में हिम्मत थी और न ही ताकत।

बाद में कृष्ण ने कंस को मार कर उग्रसेन को पुनः राजा बनाया। शक्ति और जनता का सहयोग दोनों था उनके पास। वे चाहते तो स्वयं राजा बन सकते थे या अपने पिता को बना सकते थे। लेकिन उन्होने ऐसा नहीं किया क्योंकि उनका सभी कार्य परमार्थ, धर्म और नीति के अनुकरण में होता था, व्यक्तिगत स्वार्थ के वशीभूत होकर नहीं।  

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