शिव रुद्राष्टकम

शिव रुद्रष्टाक्म भगवान शिव का एक अत्यंत लोकप्रिय स्तोत्र है। शिव के ही एक अन्य अत्यंत लोकप्रिय स्तोत्र शिव तांडव स्तोत्र के विपरीत यह उनके रुद्र रूप की मधुर भाव से वंदना करता है। रुद्र भगवान शिव का ही एक भयंकर रूप माना जाता है। अष्टम या अष्टक ऐसे प्रार्थना को कहते हैं जिसमें आठ छंद होते हैं। ये छंद साहित्य की दृष्टि से जगति छंद या भुजङ्प्र्यात् छंद में लिखे गए हैं।

शिव रुद्रष्टाक्म की रचना 16वीं शताब्दी में गोस्वामी तुलसीदास ने अपनी सुप्रसिद्ध रचना रामचरित मानस के उत्तर कांड में शिव की स्तुति करते हुए किया था। यह मानस के सबसे प्रसिद्ध स्तोत्रों में से है। काकभुशुंडि प्रसंग में अपने शिष्य को शाप से मुक्त करने के लिए एक गुरु द्वारा यह स्तोत्र भगवान शिव को सुनाया गया था। इससे शिव ने प्रसन्न होकर न केवल शिष्य को शाप मुक्त कर दिया बल्कि उसे आशीर्वाद भी दिया। माना जाता है कि जो कोई इस शिव रुद्रष्टाक्म का पाठ करता है, उस पर भगवान शिव सतत कृपा बनाए रखते हैं।

इसकी संगीत और गायन की विशेषता के कारण इसे गाने से मन को अद्भुत शांति और आनंद की प्राप्ति होती है।

यह स्तोत्र इस तरह है:  

नमामीशमीशान निर्वाण रूपं, विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदः स्वरूपम्‌ ।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं, चिदाकाश माकाशवासं भजेऽहम्‌ ॥1

शमीशान शब्द का दो तरह से अर्थ किया जाता है। कुछ विद्वानों के अनुसार शमीशान संस्कृत शब्द “श्मशान” से आया है, जिसका अर्थ होता है “मृतकों का स्थान”। यह ऐसा स्थान होता है जहां मृत हिंदुओं को जलाया जाता है। शमशान में भगवान शिव का वास माना जाता है। कुछ अन्य विद्वानों के अनुसार यह दो शब्दों शम+ईशान से बना है। इसका अर्थ होता है ईशान दिशा के ईश्वर। निर्वाण शब्द का अध्यात्म में अर्थ होता है परम शांति या मोक्ष या मुक्ति। निर्वाण का सांसरिक आशय भी लिया जा सकता है। अर्थात निर्वाण का भावार्थ हुआ संसार से या समस्त सांसरिक दुःखों से मुक्ति।

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हे ईशानदिशा के ईश्वर, हे मोक्षरूप, विभु, व्यापक ब्रह्म, वेदस्वरूप और सबके स्वामी शिवजी, मैं आपको नमस्कार करता हूं। निज स्वरूप में स्थित, भेद रहित, इच्छा रहित, चेतन, आकाश रूप शिवजी मैं आपको नमस्कार करता हूं।

निराकार मोंकार मूलं तुरीयं, गिराज्ञान गोतीतमीशं गिरीशम्‌ ।
करालं महाकाल कालं कृपालुं, गुणागार संसार पारं नतोऽहम्‌ ॥ 2

निराकार, ओंकार के मूल, तुरीय वाणी, ज्ञान और इन्द्रियों से परे, कैलाशपति, विकराल, महाकाल के भी काल, कृपालु, गुणों के धाम, संसार से परे परमेशवर को मैं नमस्कार करता हूं।

तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं, मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरम्‌ ।
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारू गंगा, लसद्भाल बालेन्दु कण्ठे भुजंगा॥ 3

तुषाराद्रि यानि हिमालय। इन्दु चंद्रमा। चारु यानि सुंदर। 

जो हिमाचल के समान गौरवर्ण तथा गंभीर हैं, जिनके शरीर में करोड़ों कामदेवों की ज्योति एवं शोभा है, जिनके सिर पर सुंदर नदी गंगाजी विराजमान हैं, जिनके ललाट पर द्वितीया का चंद्रमा और गले में सर्प सुशोभित है।

चलत्कुण्डलं शुभ्र नेत्रं विशालं, प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम्‌ ।
मृगाधीश चर्माम्बरं मुण्डमालं, प्रिय शंकरं सर्वनाथं भजामि ॥ 4

जिनके कानों में कुंडल शोभा पा रहे हैं। सुंदर भृकुटी और विशाल नेत्र हैं, जो प्रसन्न मुख, नीलकंठ और दयालु हैं। सिंह चर्म का वस्त्र धारण किए और मुण्डमाल पहने हैं, उन सर्वप्रिय और सबके नाथ श्री शंकरजी को मैं भजता हूं।

प्रचण्डं प्रकष्टं प्रगल्भं परेशं, अखण्डं अजं भानु कोटि प्रकाशम्‌ ।
त्रयशूल निर्मूलनं शूल पाणिं, भजेऽहं भवानीपतिं भाव गम्यम्‌ ॥ 5

भानु यानि सूर्य। कोटि करोड़। पाणी हाथ। भाव गम्यम यानि भावना से प्राप्त होने वाले।

प्रचंड, श्रेष्ठ तेजस्वी, परमेश्वर, अखण्ड, अजन्मा, करोडों सूर्य के समान प्रकाश वाले, तीनों प्रकार के शूलों को निर्मूल करने वाले, हाथ में त्रिशूल धारण किए, भाव के द्वारा प्राप्त होने वाले भवानी के पति श्री शंकरजी को मैं भजता हूं।

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कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी, सदा सच्चिनान्द दाता पुरारी।
चिदानन्द सन्दोह मोहापहारी, प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥ 6

मोहापहारी अर्थात मोह को हरने वाला। प्रसीद प्रसन्न होना। कल्पांतकारी कल्प का अंत यानि प्रलय  करने वाला।

कलाओं से परे, कल्याण स्वरूप, प्रलय करने वाले, सज्जनों को सदा आनंद देने वाले, त्रिपुरासुर के शत्रु, सच्चिदानन्दघन, मोह को हरने वाले, मन को मथ डालनेवाले हे प्रभो, प्रसन्न होइए, प्रसन्न होइए।

न यावद् उमानाथ पादारविन्दं, भजन्तीह लोके परे वा नराणाम्‌ ।

न तावद् सुखं शांति सन्ताप नाशं, प्रसीद प्रभो सर्वं भूताधि वासं ॥ 7

सर्व भूताधिवासम सभी प्राणियों में निवास करने वाले।

जब तक मनुष्य श्री पार्वतीजी के पति के चरणकमलों को नहीं भजते, तब तक उन्हें न तो इस लोक में, न ही परलोक में सुख-शांति मिलती है और अनके कष्टों का भी नाश नहीं होता है। अत: हे समस्त जीवों के हृदय में निवास करने वाले प्रभो, प्रसन्न होइए।

न जानामि योगं जपं नैव पूजा, न तोऽहम्‌ सदा सर्वदा शम्भू तुभ्यम्‌ ।
जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं, प्रभोपाहि आपन्नामामीश शम्भो ॥ 8

मैं न तो योग जानता हूं, न जप और न पूजा ही। हे शम्भो, मैं तो सदा-सर्वदा आप को ही नमस्कार करता हूं। हे प्रभो! बुढ़ापा तथा जन्म के दुख समूहों से जलते हुए मुझ दुखी की दुखों से रक्षा कीजिए। हे शंभो, मैं आपको नमस्कार करता हूं।

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