sugriv

राम-सुग्रीव मित्रता- भाग 36

राम-लक्ष्मण का रिष्यमुक पर्वत पर आना

कबंध की सलाह के अनुसार राम सुग्रीव से मित्रता करने के लिए रिष्यमुक पर्वत पर आए। दो आयुधधारी वीर पुरुषों को देख कर सुग्रीव को आशंका हुई कि कहीं वे उनके शत्रु तो नहीं। उन्होने अपने मंत्री हनुमान को दोनों भाइयों के पास उनके आने का उद्देश्य पता करने के लिए भेजा।

राम-हनुमान प्रथम मिलन 

सुग्रीव की आज्ञा के अनुसार हनुमान राम-लक्ष्मण का वास्तविक परिचय जानने के लिए उनसे मिले। पहले वे ब्राह्मण के छद्म वेश में उनसे मिले। उनके वाक चातुर्य और संस्कृत के ज्ञान से दोनों भाई बहुत प्रभावित हुए। बातचीत के बाद हनुमान अपने आराध्य को पहचान गए। वे अब अपने वास्तविक वानर रूप में आ गए। उन्हें जब पता चला कि ये दोनों भाई उनके स्वामी सुग्रीव से मित्रता की इच्छा से आए थे। तो उन्हें और भी प्रसन्नता हुई। उन्हे यह भी विश्वास था कि यही दोनों भाई सुग्रीव की कठिनाइयों का अंत कर सकते थे। अतः वे दोनों भाइयों को अपने साथ रिष्यमुक पर्वत पर वहाँ ले आए, जहाँ सुग्रीव रहते थे।

राम-सुग्रीव मित्रता

हनुमान के कहने पर सुग्रीव-राम में अग्नि को साक्षी मान कर मित्रता हुई।

Read Also  वनवास काल में राम के प्रारम्भिक रात्री विश्राम और पहला आवास कहाँ था?-भाग 18

सीता द्वारा गिराया आभूषण सुग्रीव का राम को दिखाना

जब राम ने सुग्रीव और उनके सभी मंत्रियों को अपनी पत्नी सीता के अपहरण और उन्हे ढूँढने में सहायता के लिए कहा तो सुग्रीव को कुछ याद आया। सुग्रीव ने राम को बताया कि अपने चार मंत्रियों के साथ रिष्यमुक पर्वत पर बैठे हुए एक दिन उन्होने एक स्त्री को देखा जिसे कोई राक्षस आकाशमार्ग से लिए जा रहा था। वह रोती हुए राम, लक्ष्मण का नाम ले रही थी। इसलिए वह संभवतः सीता ही होगी। जब उस स्त्री द्वारा वस्त्र में लपेट कर फेंके  गए आभूषण उन्होने दिखाया तब राम ने उन आभूषणों को पहचान लिया कि वे सीता के ही थे।  

सुग्रीव भी सीता को ले जाने वाले राक्षस का नाम, पता, कुल आदि नहीं जानते थे। फिर भी उन्होनें उसे ढूँढने में हर संभव सहायता का विश्वास दिलाया।

सुग्रीव और वाली के शत्रुता की कथा

अगले दिन राम के पूछने पर सुग्रीव ने बाली से अपनी शत्रुता और वहाँ छुप कर रहने का कारण बताया। उसने यह भी बताया कि उसके बड़े भाई बाली ने उसका राज्य, संपत्ति और यहाँ तक कि पत्नी तक छीन लिया। सब कुछ लेने के बाद भी बाली का क्रोध, जो कि अकारण था, शांत नहीं हुआ और वह सुग्रीव की जान लेना चाहता था। बाली के अधर्म संगत आचरण पर विचार कर राम ने उसका वध करने की प्रतिज्ञा की।

सुग्रीव को राम के बल पर संशय और उसका निवारण

सुग्रीव को यद्यपि राम की शक्ति पर भरोसा था लेकिन उसने पहले कई बार अपने भाई बाली की शक्ति का प्रत्यक्ष अनुभव किया था। बाली आज तक किसी से हारा नहीं था। उसने बड़े-बड़े शक्तिशाली योद्धाओं को द्वंद्व युद्ध में परास्त किया था। इसलिए सुग्रीव को शंका हुई कि राम उसे मारने की अपनी प्रतिज्ञा को पूरी कर सकते थे या नहीं।

Read Also  ताटका कौन थी और भगवान राम ने स्त्री का वध क्यों किया?-भाग 7 

राम ने उसकी शंका दूर करने का निश्चय किया। उन्होने सुग्रीव से बाली के बल के विषय में पूछा। सुग्रीव ने मातंग वन में पड़े राक्षस दुंदुभी की हड्डियों के ढ़ेर राम को दिखाया। साथ ही साल के सात विशाल वृक्षों के भी दिखाया जिसे बाली हिला कर पत्रहीन करने का बल रखता था।

दुंदुभी के अस्थियों को राम द्वारा अपने पैर के अंगूठे से दस योजन दूर फेंकना  

बाली के शक्ति के बखान के बाद सुग्रीव ने संशय प्रकट किया कि शक्तिशाली बाली को मार सकेंगे या नहीं। इस पर लक्ष्मण ने हँसते हुए पूछा कि क्या करने से उन्हे विश्वास हो जाएगा कि राम बाली को मार सकते हैं। बातों-बातों में ही राम ने दुंदुभी के अस्थियों को अपने पैर के अंगूठे से उठा लिया और इतनी ज़ोर से फेंका कि वह दस योजन दूर जा गिरा। लेकिन सुग्रीव उससे भी संतुष्ट नहीं हो सके।  

राम द्वारा एक तीर से सात साल वृक्ष को छेदना  

राम ने अपने धनुष से एक तीर चलाया। वह तीर एक साथ ही सातों साल के वृक्ष को छेदता हुआ पाताल लोक तक चला गया। फिर वापस तरकश में आ गया। यह सब इतनी तीव्रता से हुआ कि सुग्रीव सहित सभी विस्मित रह गए।

अब सुग्रीव को विश्वास हो गया कि वे बाली को मारने में सक्षम थे। अतः अब वह राम के कहे अनुसार बाली को चुनौती देने का साहस कर सके।

****

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top