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राम-रावण युद्ध में रावण का अंतिम सेनापति कौन था?- भाग 54

अपने परम पराक्रमी पुत्र मेघनाद जो कि अब लंका के लिए अंतिम उम्मीद था, के युद्ध में लक्ष्मण के हाथों मारे जाने पर लंका की सेना और स्वयं रावण का जीत की रही-सही उम्मीद भी जाती रही। अब युद्ध में भेजने योग्य कोई बड़ा योद्धा जीवित नहीं रह गया था। अब वह बहुत ही कातर और हतोत्साहित हो गया।

सीता वध का विचार

इस निराशा और हताशा में रावण को सीता पर क्रोध हो आया। अब उसे मिले सारे शाप की याद आई। क्रोध से विक्षिप्त होकर वह सीता को मार डालने के लिए उद्धत हुआ। लेकिन सुपार्श्व ने समझाबुझा कर उसे शांत किया।

रात्री में राक्षस सेना का वानर सेना पर आक्रमण

सेना समाप्त थी। सभी प्रमुख योद्धा और सेनापति मारे जा चुके थे। राजकोष खाली था। प्रजा में भय और दीनता व्याप्त था। रावण जीत के लिए उचित-अनुचित कोई भी साधन अपना कर राम-लक्ष्मण को मार डालने के लिए अंतिम प्रयास करना चाहता था।

अतः उसने रात में ही अपनी सेना के जीवित बचे हुए प्रधान-प्रधान योद्धाओं को बुलाया और उन्हे चतुरंगिणी (हाथी, घोड़े, रथ और पैदल) सेना के साथ राम को घेर कर मार डालने का आदेश दिया। उसके सनिकों ने रात में ही वानर सेना पर धावा बोल दिया।

राम सेना का कठोर प्रतिकार

राम सेना के योद्धा तब तक सुषेण की औषधि से स्वस्थ हो चुके थे। वे सावधान भी थे। इसलिए वे भी इस आक्रमण का कठोर प्रत्युत्तर देने लगे। सूर्योदय के समय तक युद्ध ने महाभयंकर रूप धारण कर लिया। युद्ध से उड़ता हुआ धूल रक्त की बौछार से शांत होने लगा।

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इस आक्रमण का मुख्य लक्ष्य राम को मारना था। इसलिए राक्षस सैनिक वानर सैनिकों का मुक़ाबला करते हुए राम की तरफ बढ़ रहे थे। राम भी फुर्ती से बाण चलाते हुए शत्रु सेना का संहार किए जा रहे थे।

बाण चलाने की उनकी गति इतनी तीव्र थी कि शत्रु उनके बाणों की आघात तो अनुभव करते थे लेकिन उन्हे चलाते हुए राम को नहीं देख पाते थे। उन्हे केवल धनुष के ऊपर का भाग दिखाई देता था। उनके बाणों से हजारों राक्षस सैनिक मारे गए। जो बच गए वे भाग खड़े हुए।

लंका में शोक

लंका नगर के अधिकांश घर का कोई-न-कोई सदस्य इस युद्ध में मारा गया था। मारे गए राक्षसों के परिवार वालों के विलाप के कारण समस्त नगर विलाप करता प्रतीत होता था। इन विलापों की आवाज रावण के कानों तक भी पहुँची। कुछ देर सोचने के बाद उसने महोदर, महापार्श्व और विरूपाक्ष नामक राक्षस को सेना के साथ युद्ध भूमि जाने के लिए आदेश दिया। उसने राक्षसों का मनोबल बढ़ाने के लिए युद्ध के लिए अपना उत्साह दिखाया और अपने शक्ति को याद किया।

रावण का युद्धभूमि में आना

रावण के सैनिकों का मनोबल टूट चुका था। अब उन्हें जीत की कोई उम्मीद नहीं दिख रहा था। रावण द्वारा अपने बल के बखान से भी उनका उत्साह नहीं लौटा था। पर आदेश के अनुसार बचे-खुचे सैनिक फिर से अपने सेनापतियों महोदर, महापार्श्व और विरूपाक्ष के साथ रणभूमि में पहुँच गए। उन सबका उत्साह बढ़ाने के लिए वह स्वयं भी युद्ध भूमि में आ पहुँचा। यद्यपि वह इससे पहले भी युद्धभूमि में आ चुका था और राम के हाथों बुरी तरह हार कर वापस लंका गया था।

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रावण द्वारा वानर सेना का संहार

रावण ने रणभूमि में आते ही अंधाधुंध बाण बरसाना शुरू कर दिया। उसके बाणों से वानर सेना का संहार होता देख सुग्रीव आगे आए। सुग्रीव के नेतृत्व में वानर सेना ने राक्षस सेना को बड़ी टक्कर दी।

रावण के सेनापतियों का वध

इस युद्ध में सुग्रीव के हाथों विरूपाक्ष और महोदर मारा गया। अंगद ने युद्ध मे महापार्श्व का वध किया। सेनापतियों के मरने से राक्षस सेना जो पहले ही हतोत्साहित थी, और भी निराश हो गए।

इधर अपने सेनापतियों के मारे जाने से रावण क्रुद्ध होकर अपना रथ राम-लक्ष्मण की ओर ले चला। उसके अस्त्र प्रहार से वानर सेना में भगदड़ मच गया। राम लक्ष्मण ने जब अपने सैनिको को भागते देखा और उसके पीछे रावण को आते देखा तो वे हर्षित हो उठे। उन्हें लगा रावण को मार कर युद्ध समाप्त कर देने का समय आ गया है।

राम-रावण युद्ध

राम ने अपने धनुष का टंकार किया। लक्ष्मण तेजी से उसकी ओर बाण छोड़ने लगे। लेकिन रावण उनके बाण को काट कर राम के पास जा पहुँचा। उसने राम पर कई बाण छोड़े। राम ने उन सभी को काट डाला। अब राम-रावण के बीच घोर युद्ध शुरू हो गया। दोनों ही घायल हो गए पर युद्ध का उत्साह कम नहीं हुआ। सूर्य अस्त हो गया। अगले दिन तक भी यह युद्ध जारी रहा। रावण के सभी दिव्य अस्त्रों को राम काट देते थे।

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