राम राज्य की क्या विशेषता थी?-भाग 70

सीता के परित्याग, विशेष रूप से उनके धरती में समा जाने के बाद राम व्यक्तिगत जीवन में मानसिक रुप से खिन्न हो गए थे। लेकिन अपने व्यक्तिगत दुख को उन्होंने कभी भी अपने राजकीय या प्रशासनिक कार्य में बाधा नहीं बनने दिया। कुश और लव को उन्होंने एक आदर्श पिता की तरह पाला। लेकिन उनका अधिकांश समय राजकीय और धार्मिक कार्यों में ही बीतता था।

प्रशासनिक विशेषता

प्रशासनिक और राजनीतिक कुशलता के कारण राम राज्य बहुत लोकप्रिय था। वे प्रजा की प्रत्येक प्रकार की सहायता के लिए हमेशा तत्पर रहते थे। वे प्रजा के लिए हर समय उपलब्ध रहते थे। कभी किसी को उनके दर्शन या न्याय के लिए प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती थी।

राम राज्य में न तो कोई प्रकृतिक विपदा आई और न ही किसी की अकाल मृत्यु हुई। प्रकृति अनुकूल रहती थी। खेत बहुत अच्छी फसल देती। लोग समृद्ध थे। किसी को किसी प्रकार की शारीरिक, मानसिक या दैवीय कष्ट नहीं था।

राम राज्य में किसी को किसी प्रकार का दुख नहीं था। समय आने पर कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी मृत्यु को प्राप्त हुई। राम ने उन सबका विधिवत श्राद्ध कर्म किया। इस प्रकार धर्मानुसार राज्य करते हुए राम को ग्यारह हजार वर्ष बीत गए।

विदेश नीति

लेकिन इतनी समृद्धि और शक्ति होने बावजूद राम ने कभी अन्यायपूर्वक किसी अन्य राजा का राज्य नहीं हड़पा। कोई अनावश्यक युद्ध नहीं किया। सभी देशों (जनपदों) से उनके राजनीतिक संबंध अच्छे थे। यद्यपि उन्होंने कई राज्य और नगरों की स्थापना की लेकिन ये राज्य किसी राजा को कष्ट देकर नहीं बसाया गया था। यही इन राज्यों की विशेषता थी।

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पारिवारिक जीवन

अपने भाइयों और सगे-सबंधियों से राम का स्नेह जीवन पर्यंत बना रहा। राम और उनके तीनों भाइयों को दो-दो पुत्र हुए। राम के पुत्र- कुश और लव, भरत के पुत्र -तक्ष और पुष्कल, लक्ष्मण  के पुत्र अंगद और चन्द्र्केतु, शत्रुघ्न के पुत्र सुबाहु और शत्रुघाती।

ये सभी आठों भाई अपने पिता और चाचा की तरह ही सदगुणी और युद्ध में पराक्रामी थे। राम ने अपने तीनों भाइयों के पुत्रों के लिए राज्य की स्थापना की और उसे दो राजधानियों में बाँट दिया। लेकिन यह ध्यान रखा कि यह किसी प्रकार के अन्याय से न हो।

राज्यों और शहरों का निर्माण

शत्रुघ्न के पुत्रों के लिए राज्य का निर्माण

शत्रुघ्न ने पहले ही राम के आदेश के अनुसार यमुना तट के निवासियों को पीड़ा देने वाले लवणासुर को मार कर इस क्षेत्र में एक राज्य स्थापित किया जिसका नाम था शूरसेन। बाद में उन्होंने अपने दोनों पुत्रों में दो राजधानी बना कर इस राज्य को बाँट दिया।

भरत के पुत्रों के लिए राज्य का निर्माण

कैकेयी देश के राजा युधाजित (भरत के मामा) ने अपने पुरोहित ब्रह्मर्षि गार्ग्य को राम के पास अनेक प्रेमोपहार के साथ भेजा। स्वागत-सत्कार और कुशल प्रश्न के बाद उन्होने राम से सिंधु नदी के दोनों ओर बसे सुंदर गंधर्व देश के विषय में बताया। यहाँ का राजा शैलुष गंधर्व था।

उन्होने उस नगर को जीत कर उसे अपने अधिकार में करने और दो सुंदर नगर बसाने के लिए कहा। अपने मामा और ब्रहर्षि दोनों का ऐसा विचार देख कर राम सहर्ष तैयार हो गए।

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राम ने भरत को उस देश को जीत कर अपने पुत्रों तक्ष और पुष्कल को वहाँ का राजा बनाने का आदेश दिया। तक्ष और पुष्कल- दोनों कुमारों का राज्याभिषेक वहीं अयोध्या में ही किया गया। योजना अनुसार अयोध्या और केकेय देश की सेना ने गन्धर्वों को हरा दिया। जीत के बाद भरत ने वहाँ दो सुंदर नगर बसाए– तक्षाशिला, यहाँ का राजा कुमार तक्ष को बनाया गया और पुष्कलावत– यहाँ का राजा कुमार पुष्कल को बनाया गया। इन दोनों राजधानी नगरों को पूरी तरह से बसा कर भरत अयोध्या लौट आए।

लक्ष्मण के पुत्रों के लिए राज्य का निर्माण

राम लक्ष्मण के दोनों पराक्रमी पुत्रों के लिए भी राज्य का निर्माण करना चाहते थे। पर उनका स्पष्ट निर्देश दिया कि “कोई ऐसा देश देखो जहाँ निवास करने से दूसरे राजाओं को उद्वेग न हो, आश्रमों का भी नाश नहीं करना पड़े और हमलोगों को किसी की नजर में अपराधी भी न बनाना पड़े।”

उनकी इच्छानुसार भरत ने कारूपथ देश का नाम सुझाया। उन्होने वहाँ कुमार अंगद और चन्द्रकेतू (चन्द्रकान्त) के लिए दो राजधानी बसाने का भी सुझाव दिया। राम और लक्ष्मण को भी यह विचार पसंद आया। शत्रुघ्न और कुमार पुष्कल और कुमार तक्ष की तरह लक्ष्मण के दोनों पुत्रों- कुमार अंगद और कुमार चंद्रकेतु का अभिषेक भी राम ने अयोध्या में ही कर उन्हें भेजा। 

योजना के अनुसार भरत और लक्ष्मण दोनों भाइयों को लेकर कारुपथ गए। तदनुसार उन्होने कारुपथ देश को अपने अधिकार में कर अंगद को वहाँ का राजा बना दिया। अंगद के लिए अंगदिया नामक नगर और चन्द्रकान्त के लिए चन्द्रकान्ता नामक नगर बसाया गया। कुमार चंद्रकांत शरीर से मल्ल यानि पहलवान की तरह हृष्ट-पुष्ट थे, इसलिए उनके लिए उनका जनपद मल्ल देश कहलाया जिसकी राजधानी चन्द्रकान्ता नगर थी।

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राम, लक्ष्मण और भरत तीनों ने मिलकर उन दोनों भाइयों का राज्याभिषेक किया। मल्ल देश का पश्चिम भाग अंगद को और उत्तर भाग चंद्रकेतु मिला। अंगद के साथ लक्ष्मण और चंद्रकेतु के साथ भरत उनके सहायक बन कर गए। लक्ष्मण और भरत दोनों लगभग एक वर्ष तक साथ रह कर, जब वे दोनों कुमार स्वयं राज्य संभालने में पूर्ण सक्षम हो गए, तब लौट आए।

राम के ग्यारह हजार वर्ष लंबे शासन काल में देश के अंदर या बाहर किसी में कोई रोष नहीं हुआ। विदेशों से उनके अच्छे संबंध बने रहे। सुग्रीव, विभीषण आदि सुदूर देशों के राजाओं से उनकी मित्रता आजीवन बनी रही।  

राम, लक्ष्मण और भरत तीनों भाई धर्म और प्रजा का कार्य करते हुए सुखपूर्वक अयोध्या में रहे। समय आने पर चारों भाइयों से साथ ही इस पृथ्वी से विदा लिया। उनकी लोकप्रियता इतनी थी कि उनके साथ प्राणियों के एक बड़े समूह ने सरयू नदी में जल समाधि ले लिया।

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