राम ने सीता को वनवास क्यों दिया?-भाग 62

राम के राज्याभिषेक के बाद की घटनाओं का वर्णन रामायण के अंतिम अध्याय यानि कांड में है जिसे उत्तर कांड कहते हैं। उत्तरकाण्ड का आशय ऐसे काण्ड (अध्याय) से है जो अभी तक घटित नहीं हुआ था, लेकिन अपनी दिव्य दृष्टि के कारण वाल्मीकि भविष्य में होने वाली घटनाओ को देख पाए थे और उसी के आधार पर इसे लिखा था। इसके मूल रामायण का अंश होने या बाद में जोड़े गए होने को लेकर विवाद है। अब अधिकांश विद्वान सम्पूर्ण उत्तरकाण्ड अथवा इसके अधिकांश भाग को बाद में जोड़ा गया अंश मानते हैं।

वर्तमान में वाल्मीकि कृत रामायण के उत्तरकाण्ड में सीता वनवास की कथा इस प्रकार है:

राज्याभिषेक के बाद राम की दिनचर्या

राज्याभिषेक के बाद राम अपने शासकीय कार्यों में लग गए। वे सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठ कर धर्म कार्य और उसके बाद राजकीय कार्य करते थे। वे इस बात का विशेष ध्यान रखते थे कि अगर कोई न्याय माँगने आए या कुछ माँगने आए तो उसे प्रतीक्षा न करनी पड़े।

वे इस बात के लिए भी विशेष उत्सुक रहते थे कि प्रजा अपने राजा और उसके शासन के विषय में क्या विचार रखती हैं, इसे जान सके ताकि आवश्यक सुधार कर सके।

राजकीय कार्यों में व्यस्तताओं के कारण राम सीता को अधिक समय नहीं दे पाते। उनके अंतःपुर के पास एक राजकीय उपवन था, जिसका नाम था अशोक वनिका। इसके पास ही एक सुंदर महल था (इसी महल में उन्होने सुग्रीव को ठहराया था।) इसके पास ही उनके महल का मध्य खंड था, जहाँ वे अपने मित्रों आदि से मिलते थे। दोनों के बीच आने-जाने के लिए एक गली थी।

राजकीय कार्यों से अगर समय मिलता था तो वे सीता के साथ इस वनिका और उसके साथ बने महल में रमण करते थे और गीत-संगीत द्वारा अपना मनोरंजन करते थे।

गर्भवती सीता का गंगा किनारे रहने वाले ऋषि पत्नियों से मिलने की इच्छा प्रकट करना

इसी तरह कुछ समय बीत गया। एक दिन उन्हें सीता के गर्भवती होने का पता चला। इस पर उन्होने बहुत प्रसन्नता व्यक्त किया।

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सीता और राम दोनों अशोक वनिका में बैठे थे। राम के पूछने पर सीता ने गंगा के किनारे रहने वाले महात्माओं का दर्शन करने के लिए जाने की इच्छा प्रकट किया। एक रात उनके आश्रम में रह कर उनकी पत्नियों से मिलकर अगले दिन वापस आ जाती। राम ने उनकी ये इच्छा पूरी करने का वचन दिया।

गुप्तचरों द्वारा सीता के संबंध में प्रजा के संदेह का राम को पता चलना

इसके बाद वे अपने महल के मध्यखंड में आ गए, जहाँ उनके कुछ मित्र उनसे मिलने आए थे। ये सब मित्र उनका मनोरंजन भी करते और उन्हे सलाह भी देते थे। साथ ही ये नगर में चलने वाली चर्चाओं से उन्हे अवगत कराते रहते थे। इस तरह गुप्तचर का कार्य भी करते थे।

राम के पूछने पर हिचकिचाते हुए उनके मित्र (गुप्तचर) भद्र ने उन्हे यह बताया कि नगर में लोग उनके द्वारा समुद्र पर पुल बनाने और रावण मारने आदि बातों की तो बड़ी प्रशंसा करते है, लेकिन इस बात के लिए निंदा करते हैं और आश्चर्य व्यक्त करते हैं कि उन्होने बहुत दिनों तक किसी दूसरे पुरुष के घर में रह कर आई हुई पत्नी को कैसे स्वीकार कर लिया है।

भद्र की ये बाते सुनकर राम बहुत व्यथित हो गए। उन्होने उन सब को जाने की आज्ञा देकर अपने तीनों भाइयों को बुलाया।

राम द्वारा सीता के परित्याग का निश्चय

तीनों भाइयों के आने पर राम ने सीता के कारण अपने अपयश की बात बताया। फिर लक्ष्मण को सीता को लेकर गंगा के तट पर वन में, जहाँ से वाल्मीकि का आश्रम नजदीक था, वहाँ छोड़ आने के लिए कहा।

तीनों भाइयों को यह निर्णय कठोर प्रतीत हुआ लेकिन बड़े भाई की दृढ़ता के समक्ष वे कुछ नहीं कह सके। यह आज्ञा देते समय राम भी बहुत दुखी थे और रो रहे थे। इसलिए भाइयों ने चुपचाप उनकी आज्ञा मान ली।

लक्ष्मण द्वारा सीता को वन में ले जाना

अगले दिन सुबह में लक्ष्मण सीता के पास गए और बताया कि राम ने उन्हे सीता को गंगा तट ले जाने का आदेश दिया है। सुमंत्र रथ लेकर आ गए। सीता यह सुनकर प्रसन्न हो गई क्योंकि एक दिन पहले ही शाम को राम ने उनकी इच्छा की पूर्ति के लिए वचन दिया था। वे उत्साहपूर्वक तैयार होकर मुनि पत्नियों के लिए बहुत-सा उपहार लेकर रथ पर चढ़ी।

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जब उन्होने इन उपहारों के विषय में उत्साह से लक्ष्मण को बताया तो लक्ष्मण शांत और शोक में डूबे हुए लगे। रथ पर चढ़ते ही सीता को अपशकुन होने लगे। लक्ष्मण का उतरा हुआ चेहरा और इन अपशकुन को देख कर वे कुछ आशंकित हो उठी। फिर ईश्वर को प्रणाम कर चल पड़ी।

रास्ते भर लक्ष्मण शांत रहे। दोपहर में रथ गंगा तट पर पहुँचा। गंगा को देखते ही लक्ष्मण फफक-फफक कर रोने लगे। उन्हे देख कर सीता को उनके रोने का कारण समझ नहीं आया।

उन्होने समझा वे शायद अपने भाई राम के लिए रो रहे हैं। सीता में उन्हें समझाया कि आज भर की ही तो बात है कल तो फिर राम के पास चले ही जाएँगे इसलिए उन्हे रोना नहीं चाहिए। लक्ष्मण ने अपने आँसू पोछे और नदी पार जाने के लिए मल्लाह को बुलाया।

लक्ष्मण द्वारा राम का सीता के परित्याग की बात बताना

नाव से लक्ष्मण और सीता दोनों गंगा नदी के पार आ गए। इस पार आकर लक्ष्मण हाथ जोड़ कर रोने लगे। वे रोते हुए कहने लगे ऐसा निर्दय आदेश पालन से अच्छा उन्हे मृत्यु आ जाती। अब सीता आश्चर्य और आशंका के साथ पूछने लगी।

लक्ष्मण ने उन्हे बताया कि यद्यपि लक्ष्मण को और स्वयं राम को सीता की पवित्रता पर पूर्ण विश्वास है। उनके और बहुत लोगों से लोगों के समक्ष अग्नि देवता, इन्द्र, ब्रहमा आदि उनके पवित्रता को प्रमाणित कर चुके हैं। पर, प्रजा में फैले अपयश के भय से राम ने उनका परित्याग कर दिया है। राम ने गंगा पार के तट पर वाल्मीकि के आश्रम के पास उनको छोड़ देने का आदेश दिया है।

सीता का विलाप

यह सुनकर सीता अचंभित रह गई। फिर रोते हुए कहने लगी अगर मुनि पत्नियाँ पूछेंगी कि किस अपराध में पति ने उनका परित्याग किया है तो वे क्या कहेंगी। इस कलंकित जीवन को गंगा में समा कर समाप्त कर लेती लेकिन रघुकुल का वंश उनके गर्भ में है, इसलिए वे ऐसा भी नहीं कर सकती।

इस तरह सीता ने बहुत प्रकार विलाप किया। फिर दृढ़ होकर बोली कि लक्ष्मण राम के आदेश का पालन करें।  अगर सीता के कारण उनके पति का अपयश होता है तो पतिव्रत धर्म यह है कि वह पति से दूर हो जाए।

वाल्मीकि मुनि द्वारा सीता को आश्रय देना

सीता को रोती छोड़ लक्ष्मण नाव से वापस गंगा पार आ गए और रथ से वापस अयोध्या के लिए चल पड़े। जाते हुए लक्ष्मण बार-बार मुड़ कर उन्हें देखते थे। सीता भी उन्हे देख रही थी। रथ के दृष्टि से ओझल हो जाने पर सीता अनाथ की तरह वहीं जमीन पर बैठ कर रोने लगी।

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वहीं पास में कुछ मुनि पुत्र खेल रहे थे। उन्होने सीता को देखा तो वाल्मीकि को जाकर बताया कि एक स्त्री अकेली बैठी रो रही है। दिखने में बहुत सुंदर और किसी रानी की तरह लगती है। उनकी बातें सुनकर वाल्मीकि ने ध्यान लगा कर देखा। वे सब कुछ समझ गए।

वाल्मीकि जल्दी से सीता के पास पहुँचे। उन्होने यह कहते हुए सीता का स्वागत किया कि वे जानते हैं कि सीता परम पवित्र है। राम ने केवल अपयश के डर से उनका त्याग किया है। दशरथ वाल्मीकि के मित्र थे। इसलिए सीता उनके संरक्षण में सम्मानपूर्वक रह सकती हैं।

वाल्मीकि के आश्रम के पास ही एक आश्रम था जहाँ मुनि पत्नियाँ रहती थीं। वे सीता को लेकर वहाँ गए। सीता का परिचय देकर उनसे बार-बार सीता को आदर और स्नेह से रखने के लिए कहा।

गर्भवती सीता उन्ही मुनि पत्नियों के साथ वाल्मीकि आश्रम के पास ही तपस्विनी की तरह रहने लगी।

राम के संबंध में दुर्वासा मुनि की भविष्यवाणी

इधर लक्ष्मण छुप कर देख रहे थे। जब उन्होने देख लिया कि वाल्मीकि आकर सीता को ले गए तो उन्हे थोड़ी संतुष्टि हुई और वे अयोध्या के लिए चले। रास्ते में वे बहुत उदास थे। उन्हे उदास देख कर सुमंत्र ने उन्हे बताया कि राम के विषय में इस तरह की भविष्यवाणी दुर्वासा ऋषि तभी कर चुके थे, जब चारों भाई छोटे थे।

गुरु वशिष्ठ के आश्रम में दुर्वासा से दशरथ मिले थे। पूछने पर उन्होने बताया था कि राम पूर्णायु प्राप्त करेंगे। वे ग्यारह हजार वर्ष तक राज्य करेंगे। उनके दो पुत्र होंगे। वे कई राजवंशों की स्थापना करेंगे। लेकिन राम को मानसिक कष्ट का योग है। उन्हे अपने प्रिय व्यक्ति से वियोग होगा। ये पत्नी और भाइयों का भी त्याग कर देंगे।

सुमंत्र ने कहा आज दुर्वासा की भविष्यवाणी सत्य हो रही है। सुमंत्र ने यह भी कहा कि भविष्यवाणी के अनुसार राम लक्ष्मण का भी त्याग करेंगे। सीता और राम को जो मानसिक कष्ट हो रहा था यह विधि का विधान था, इसलिए लक्ष्मण को इसके लिए सोच नहीं करनी चाहिए। सुमंत्र के इस प्रकार कहने पर लक्ष्मण का मन कुछ शान्त हुआ।

सीता के निर्वासन के बाद राम की स्थिति

अयोध्या पहुँच कर लक्ष्मण ने देखा कि राम बहुत दुखी होकर अपने महल में सिंहासन पर बैठे थे। उनकी आँखों में आँसू थे। लक्ष्मण ने उन्हे समझाकर सांत्वना दिया। चार दिन से राम प्रजा से नहीं मिले थे। लक्ष्मण के समझाने पर वे फिर राज्य के कार्य पर अपना ध्यान केंद्रित करने लगे।

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