राम ने रावण का वध कैसे किया?-भाग 56

मेघनाद वध के बाद रावण के भेजे गए तीनों अंतिम सेनापति भी मारे गए। रावण का स्वयं युद्ध भूमि में आना भी उसकी सेना के लिए अधिक कारगर नहीं हो सका। रावण ने विभीषण को मारने के लिए उन पर शक्ति चलाया जिसे आगे बढ़ कर लक्ष्मण ने अपनी छाती पर झेल लिया। पहले भी वह लक्ष्मण को घायल कर चुका था लेकिन उन्हें उठाने में असमर्थ रहा था। राम से भी वह हार चुका था। लंका के किले की सुरक्षा के सभी इंतजाम ध्वस्त हो चुके थे। किले पर भी राम सेना का कब्जा था। राम सेना नगर के अंदर तक जा चुकी थी। अब कोई और रक्षा पंक्ति रह नहीं गया था। इसलिए इस बार उसने कोई खतरा नहीं लिया। लक्ष्मण को घायल कर वह तेजी से लंका के अंदर चला गया। वानर योद्धाओं ने उसे रोकने का प्रयास भी नहीं किया क्योंकि वे सब लक्ष्मण के लिए चिंतित थे।

रावण के जाते ही राम भाई के पास आ गए। सभी सैनिक उन दोनों भाइयों को घेरे हुए दुखी, पर सावधान होकर खड़े थे। सुषेण के सलाह के अनुसार हनुमान संजीवनी बूटी ले आए जिससे उपचार के बाद लक्ष्मण ठीक हो गए। उनके ठीक होते ही राम पक्ष में हर्ष और उत्साह छा गया।

लक्ष्मण ने सचेत होते ही राम से रावण को मार कर विभीषण के राज्याभिषेक की प्रतिज्ञा पूरी करने के लिए कहा। लक्ष्मण का यह शौर्ययुक्त वचन सुन कर राम भी रावण को मारने का संकल्प लेकर उठ खड़े हुए। उन्होने धनुष हाथ में ले लिया।  

रावण का पुनः युद्ध भूमि में आना

तभी तक रावण भी दूसरा रथ लेकर थोड़े विश्राम और तैयारी के बाद युद्ध भूमि में फिर आ पहुँचा। राम ने रावण को लक्ष्य करके बाण छोड़ना शुरू कर दिया।

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अब सब समझ चुके थे कि राम-रावण में अंतिम युद्ध शुरू हो चुका था। रावण की तरफ से अब कोई योद्धा जीवित नहीं बचा था। अतः देवता भी बड़ी उत्सुकता के साथ यह युद्ध देख रहे थे।

इंद्र द्वारा राम के लिए रथ भेजना और द्वैरथ युद्ध

इस द्वंद्व युद्ध में रावण रथ पर था। राम पैदल। यह देख कर देवराज इन्द्र ने अपने सारथी मातलि को रथ सहित राम के पास भेजा, ताकि युद्ध बराबरी का हो। मातलि के आग्रह करने पर राम रथ की परिक्रमा और प्रणाम कर उस पर सवार हुए।

अब दोनों रथी योद्धाओं के बीच (द्वैरथ) घमासान युद्ध शुरू हुआ। उस समय रावण दस मस्तक और बीस भुजाओं से युक्त था। दोनों ने एक दूसरे को घायल किया। एक-दूसरे के रथ और सारथी भी आहत किए।

रावण का पुनः घायल होकर नगर आ जाना

युद्ध देखने के लिए देवता, दानव, ऋषि आदि भी आकाश में आ गए। दोनों पक्ष की सेनाएँ अपने-अपने नायकों की जय घोष कर रही थी। घायल यद्यपि दोनों हुए थे, तथापि रावण की स्थिति ज्यादा खराब हो गई।

राम के दिव्य अस्त्रों से रावण विचलित हो गया। उसमें धनुष को खींचने की क्षमता भी नहीं रही। वह निढ़ाल होकर रथ पर गिर पड़ा। उसकी यह हाल देख कर उसका सारथी रणभूमि से रथ को निकाल कर नगर में आ गया।

रावण को जब होश आया तब उसे पराजित होने और रणभूमि से भाग आने को लेकर ग्लानि हुई। उसने रणभूमि से ले आने के लिए सारथी को डांटा। लेकिन सारथी ने विनम्र वचन कह कर उसे शांत किया।

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यह तीसरा अवसर था जब रावण युद्ध भूमि में राम से परास्त होकर लंका भाग आया था। लेकिन फिर भी उसने अपनी हार नहीं मानी। वह फिर युद्ध भूमि के लिए चला।

अगस्त मुनि का रणभूमि आकर राम को “आदित्यहृदय स्तोत्र” देना

इधर अगस्त्य मुनि रणभूमि में आए। उन्होने राम को “आदित्यहृदय स्तोत्र” का पाठ करने के लिए कहा जिससे युद्ध में विजय प्राप्त होना निश्चित होता है। राम ने विधिपूर्वक तीन बार इसका जप किया। सूर्य देव, जो कि युद्ध देखने आए देवताओं के मध्य में थे, ने प्रसन्न होकर राम से कहा “रघुनंदन! अब जल्दी करो।”

तब तक रावण का रथ आता दिखा। राम ने मातलि के अनुभव और कार्यों की प्रशंसा करते हुए कुछ सावधानी बताया क्योंकि उनके शत्रु राक्षस माया और छल करने में सिद्धहस्त थे। 

अब रावण के पराजय और राम की जय दर्शाने वाले कई शकुन प्रकट होने लगे।

राम-रावण में अंतिम युद्ध शुरू होना

राम और रावण दोनों फिर आमने-सामने आ गए। दोनों एक-दूसरे पर बाणों की वर्षा करने लगे। इन दोनों का युद्ध इतना रोमांचक था कि दोनों सेनाएँ अस्त्र लेकर एक-दूसरे के सामने होते हुए भी प्रहार नहीं कर रहे थे। वे आश्चर्य से रुक कर राम-रावण का युद्ध देखने लगे।

वे अपने-अपने नायकों को विस्मित हो कर देख रहे थे। दोनों बाणों के साथ ही अन्य अस्त्र-शस्त्र भी चला रहे थे। दोनों के सारथी भी अद्भुत कौशल दिखा रहे थे। जैसे-जैसे युद्ध आगे बढ़ रहा था राम को अपनी जीत कर और रावण को अपनी मृत्यु का निश्चय होने लगा।

रावण का माया युद्ध और राम द्वारा रावण के अनेक सिर, हाथ आदि काटना

राम के एक बाण ने रावण के सिर को काट डाला। उसका कटा हुआ सिर जमीन पर गिर पड़ा। लेकिन उस कटे हुए सिर की जगह रावण को एक नया वैसा ही सिर उत्पन्न हो गया। एक-एक कर राम ने उसके सौ सिर काट डाले। पर कटते ही नए सिर उग जाते थे। राम इसका कारण सोचने लगे। सोच में पड़े होने पर भी राम सावधान रहे। उन्होने उसकी छाती पर बाणों की झड़ी लगा दी।

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रावण भी क्रोधित होकर राम पर गदा, मूसल आदि से प्रहार करने लगा। रावण माया के कारण रूप और स्थान बदल कर प्रहार करता था। राम भी उसी तरह अस्त्रों से उसका प्रत्युत्तर देते थे। अतः दोनों के बीच यह युद्ध कभी आकाश में, कभी जमीन पर और कभी पर्वत पर होता था। दिन के बाद वह सारी रात भी बीत गई। युद्ध लगातार चलता रहा।

सारथी मातली द्वारा राम से रावण वध की प्रार्थना 

अब मातलि (सारथी) ने राम से कहा “आप सर्वज्ञ होते हुए भी क्यों अनजाने की तरह रावण का अनुसरण कर रहे है (अर्थात केवल उसके अस्त्रों का प्रत्युत्तर दे रहे है)। आप इसके वध के लिए ब्रह्मा जी द्वारा दिए गए अस्त्र का प्रयोग कीजिए। देवताओं ने इसके वध के लिए जो समय बताया है, वह अब आ पहुँचा है।”

रावण वध

मातली के इस प्रकार कहने से राम को भी उस अस्त्र का स्मरण हो आया। ब्रहमा का यह बाण अगस्त्य मुनि ने उन्हे पंचवटी में तब दिया था, जब वे उनके आश्रम में गए थे।

राम ने ब्रह्मा के उस विशिष्ट बाण का संधान किया। धनुष पर रख कर उसे रावण की छाती को लक्ष्य कर के चला दिया। बाण के लगते ही रावण का हृदय विदीर्ण हो गया। यह बाण रावण के प्राण को हर कर धरती में समा गया। फिर अपने आप राम के तरकश में आ समाया।

प्राणहीन होकर रावण जमीन पर गिर पड़ा। उसके हाथ से अस्त्र छुट गए। उसे मरा देख कर उसके बचे हुए सैनिक भाग गए। वानरों ने उन्हे मार-मार कर नगर में भेज दिया।

आकाश में देवताओं की दुदुंभियाँ बजने लगे। समस्त लोक में आनंद मनाया जाने लगा। सबको भय देने वाला रावण आज प्राणहीन हो चुका था। वानर सेना जश्न मनाने लगी।

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