राम ने किन राज्यों और नगरों की स्थापना कराया था?-भाग 69

राम चारों भाइयों के दो-दो पुत्र थे। इन आठ कुमारों के लिए आठ राज्यों की स्थापना देश के विभिन्न भागों में हुई। इनमें वर्तमान पाकिस्तान, दिल्ली के आस-पास, नेपाल की तराई, और पूर्वी उत्तर प्रदेश जैसे विस्तृत प्रदेश शामिल थे। इन सब में अनेक नगरों की भी स्थापना कराया। वर्तमान लाहौर भी राम के छोटे पुत्र लव द्वारा स्थापित माना जाता है।

ये राज्य एक लंबे समय तक सुव्यवस्थित और शक्तिशाली बने रहे। स्पष्टतः देश के विभिन्न भागों में राम के वंशजों ने सैकड़ों वर्षों तक राज्य किया। राम द्वारा स्थापित राज्य थे: 

शूरसेन राज्य

राम की आज्ञा से आततायी राक्षस लवणासुर को मार कर शूरसेन राज्य की स्थापना शत्रुघ्न ने की थी। इसके राजधानी मधुरापुरी थी, जो बाद में मथुरा कहलाई। यह राम द्वारा स्थापित पहला राज्य था। यहाँ के राजा के रूप में शत्रुघ्न का अभिषेक राम ने अयोध्या में ही कर दिया था।

शत्रुघ्न के दो पुत्र थे- सुबाहु और शत्रुघाती। जब लक्ष्मण जी के अपने लोक जाने और राम एवं भरत के जाने की तैयारी की सूचना उन्हें मिली तो वे अपने दोनों पुत्रों का राज्याभिषेक कर स्वयं अयोध्या आ गए। उन्होंने शूरसेन राज्य के दो भाग कर दो राजधानी बनाया। सुबाहु को मथुरा का राज्य और शत्रुघाती को विदिशा का राज्य दिया।

गंधर्व देश

यह सिंधु नदी के दोनों तटों पर बसा एक सुंदर नगर था। यह क्षेत्र वर्तमान में पाकिस्तान में है। यह देश भरत के ननिहाल कैकेयी देश के पास था। भरत के मामा युधाजित इस समय कैकेय देश के राजा थे। ब्रह्मर्षि गार्ग्य उनके कुल पुरोहित थे।

युधाजित ने गंधर्व देश के तत्कालीन राजा शैलुष गंधर्व को हरा कर उसके राज्य पर अधिकार करने और वहाँ दो नगर बसने का संदेश ले कर अपने कुलपुरोहित ब्रह्मर्षि गार्ग्य को राम के दरबार में भेजा। अपने मामा और ब्रह्मर्षि गार्ग्य दोनों के ऐसे विचार देख कर राम इसके लिए तैयार हो गए।

राम ने गंधर्व देश जीतने की जिम्मेदारी अपने भाई भरत को दिया। योजना के अनुसार भरत के नेतृत्व में अयोध्या और कैकेय देश की सम्मिलित सेना गंधर्व देश को युद्ध में हरा कर उस पर अपना नियंत्रण कर लेती। वहाँ के सिंहासन पर भरत के दोनों पुत्र तक्ष और पुष्कल आसीन होते। दोनों राजकुमारों के लिए दो राजधानी तक्षाशिला और पुष्कलवती बसाने की भी योजना थी। अपने दोनों पुत्रों को वहाँ भली-भाँति स्थापित करने के बाद भरत अयोध्या लौटते।

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शत्रुघ्न की तरह कुमार तक्ष और कुमार पुष्कल दोनों का गंधर्व देश के राजा के रूप में राज्याभिषेक भी राम ने अपने हाथों से अयोध्या में ही किया।      

योजना अनुसार भरत और युधाजित की सम्मिलित सेना ने गंधर्व देश पर आक्रमण कर दिया। एक भयंकर युद्ध के बाद ही गंधर्व पराजित किए जा सके। भरत ने वहाँ दो सुंदर नगर बसाएँ। तक्षशिला का राजा कुमार तक्ष और पुष्कलावती का राजा कुमार पुष्कल बने। दोनों राजधानियों को अच्छी तरह बसा कर और राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था को व्यवस्थित करने के बाद जब भरत ने देखा कि दोनों कुमार अपनी जिम्मेदारियों को ठीक से निभाने लगे, तब वे अयोध्या लौटा आए।

कारुपथ

अब भरत और शत्रुघ्न के पुत्रों के लिए राज्यों की स्थापना हो चुकी थी। लक्ष्मण के भी दो पुत्र थे– अंगद और चंद्रकेतु। ये दोनों भी शास्त्र और शस्त्र के महान ज्ञाता और वीर थे। उनमें भी वे सभी गुण थे जो एक राजा में होने चाहिए। इसलिए राम इन दोनों कुमारों के लिए भी राज्य की स्थापना करना चाहते थे।

उन्होंने लक्ष्मण से अपने दोनों पुत्रों के लिए उपयुक्त देश खोजने के लिए कहा, जहाँ उन्हें राजा बनाया जा सके। लेकिन इस कार्य के लिए भी वे धर्म मार्ग से विचलित नहीं होना चाहते थे। उनके शब्द थे “कोई ऐसा देश देखो जहाँ निवास करने से दूसरे राजाओं को उद्वेग न हो, आश्रमों का भी नाश नहीं करना पड़े और हमलोगों को किसी की नजर में अपराधी भी न बनाना पड़े।”

भरत ने ऐसे देश के रूप में कारूपथ का नाम सुझाया। राम और लक्ष्मण को भी यह विचार पसंद आया। शत्रुघ्न और कुमार तक्ष-पुष्कल की तरह राम, भरत और लक्ष्मण ने इन दोनों कुमारों- अंगद और चंद्रकेतु– का राज्याभिषेक भी अपने हाथों से अयोध्या में ही किया।

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पूरी योजना बना कर लक्ष्मण और भरत के नेतृत्व में सेना के साथ इन दोनों कुमारों को कारुपथ देश भेजा गया। यह संभवतः नेपाल की तराई का क्षेत्र था। कारुदेश का ही एक भाग मल्ल देश था।

मल्ल देश का पश्चिम भाग अंगद को और उत्तर भाग चंद्रकेतु को मिला। अंगद के साथ लक्ष्मण और चंद्रकेतु के साथ भरत उनके सहायक बन कर गए। लक्ष्मण और भरत दोनों लगभग एक वर्ष तक साथ रह कर, जब वे दोनों कुमार स्वयं राज्य संभालने में पूर्ण सक्षम हो गए, तब लौट आए।

कुमार अंगद के लिए अंगदिया और चंद्रकेतु के लिए चन्द्रकान्ता नामक नई राजधानी बसाया गया।

कुश और लव के राज्य

राम जब पृथ्वी लोक से जाने लगे तो उन्होंने अपने बड़े पुत्र कुश का दक्षिण कोशल और छोटे पुत्र लव का उत्तर कोशल के राजा के रूप में राज्याभिषेक किया। ये दोनों यद्यपि पहले से ही बसे हुए राज्य थे। लेकिन यहाँ दोनों भाइयों ने अनेक नगरों की स्थापना कराया। राम ने अपने जीवन काल में ही कुश के लिए कुशावती और लव के लिए श्रावस्ती नामक नगर बसाया था।

राम द्वारा स्थापित राज्यों की विशेषताएँ 

राम ने अनेक राज्यों और नगरों की स्थापना की थी। उनका यह कार्य दो अर्थों में अन्य राजाओं से विशेष था।

1. राम एक पराक्रमी और अत्यंत लोकप्रिय राजा थे। उनमें प्रशासनिक क्षमता जितनी थी उतनी ही रणनीतिक दूरदर्शिता भी। वे चाहते तो अन्य राजाओं को अपनी शक्ति से जीत कर अपने साम्राज्य का विस्तार कर सकते थे। लेकिन उन्होंने हमेशा यह ध्यान रखा कि किसी राजा को अन्यायपूर्वक और अकारण शक्ति द्वारा दबाया नहीं जाय।

2. इसीलिए उन्होंने अधिकांश राज्य उन क्षेत्रों में स्थापित कराया जहाँ पहले से कोई सुव्यवस्थित राज्य नहीं था या जो अभी तक बसा हुआ नहीं था। इसीलिए इतने लंबे शासनकाल में किसी राजा से उनकी शत्रुता नहीं हुई। अपने राज्य ही नहीं अन्य राज्यों में ही उनकी लोकप्रियता बनी रही। 

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3. वे राजा थे, नए स्थापित राज्यों को अपने राज्य में मिला सकते थे। ऐसे में उनके पुत्र ही उन राज्यों के राजा होते। लेकिन उन्होंने जो भी नए राज्य स्थापित कराया वहाँ का राजा अपने भाइयों के पुत्रों को बनाया।

4. उन्होंने अपने पुत्र से पहले अपने तीनों भाइयों के पुत्रों के लिए व्यवस्था किया। जब उन्होंने साकेत धाम जाने के निश्चय किया तो राजपद सबसे पहले युवराज भरत को देने का विचार किया। लेकिन भरत ने स्वयं इसे अस्वीकार कर राम के साथ जाने का निश्चय किया। भरत ने ही राजकुमार कुश और लव के राज्याभिषेक के लिए कहा।

5. राम चारों भाई बचपन की तरह ही सारी उम्र स्नेह से साथ रहे। लक्ष्मण और भरत अपने पुत्रों के लिए राज्य स्थापित कर उन्हें वहाँ का राज्य देकर स्वयं अयोध्या आ गए। केवल शत्रुघ्न को अपने द्वारा स्थापित राज्य का राजा स्वयं बनाना पड़ा क्योंकि इस समय तक या तो उनके पुत्र उत्पन्न ही नहीं हुए थे या फिर बहुत ही छोटे थे। वे राम की आज्ञा मान कर ही शूरसेन का राजा बनने के लिए सहमत हुए थे अन्यथा वे भी अपने भाइयों से दूर नहीं रहना चाहते थे। लेकिन भाइयों के जलसमाधि की सूचना मिलते थी वे भी उसमें शामिल होने आ गए क्योंकि वे भी भाइयों के बिना जीवित नहीं रहना चाहते थे।

संभवतः ये ही वे मूल्य थे जिस कारण राम राज्य और राम परिवार आने वाले युगों में भी आदर्श बना रहा।

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