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राम द्वारा लंका की घेराबंदी-भाग 45

लंका नगर के बाहर शिविर लगाना

समुद्र पार कर राम सेना सहित उस द्वीप पर आ गए जिस पर लंका स्थित था। इस पार आकर राम ने लंका नगर को घेरे हुए वनों और पर्वतों को देखा और नगर के सुरक्षा व्यवस्था का निरीक्षण किया। उन्होने अपनी सेना को व्यूह बना कर खड़ा किया। उन्होने सुवेल पर्वत शिविर लगाया गया।

शुक द्वारा रावण को राम की सैन्य शक्ति के विषय में बताना

जब राम सेना सहित लंका के द्वीप पर आ गए तब तक उनके द्वारा रामेश्वरम तट पर छुड़ाया गया रावण का दूत (गुप्तचर) शुक भी लंका पहुँच चुका था। उसने राम की सेना की विशालता और युद्ध के प्रति उत्साह के विषय में बताया। लेकिन रावण ने उसे अपनी शक्ति का बखान कर चुप करा दिया।

इसी समय राम के समुद्र पार आ जाने की सूचना रावण को मिली। उसने फिर से शुक और सारण को राम की सेना के विषय में पता लगाने के लिए उनसे शिविर में गुप्तचर बना कर भेजा। दोनों गुप्तचर वानर के वेश में राम की सेना में जा मिले। लेकिन विभीषण ने उन्हे पहचान लिया। इस बार भी राम ने दया कर उन्हे बचा दिया।

वानर सेना से मुक्त होकर शुक और सारण रावण के पास आए। वे दोनों राम का संदेश देकर उसे समझाने लगे कि इतनी विशाल वानर सेना और उनके वीर योद्धाओं को जीतना कठिन है इसलिए समझौता के लिए सोचा जाए। पर रावण क्रुद्ध हो गया और वह अपने निश्चय पर अडिग रहा।

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रावण का ऊँचे महल से राम के सेना का निरीक्षण

रावण उन दोनों गुप्तचरों को साथ लेकर बहुमंजिला भवन पर चला गया। उस ऊँचे भवन से नीचे राम का सैन्य शिविर दिख रहा था। उसने जब देखा तो लंका के द्वार के बाहर सभी जगह पर्वत, वन आदि में वानर सैनिक भरे थे। उनकी संख्या करोड़ो में होगी।

सेना की इस विशालता से वह अचंभित रह गया। फिर उसने राम की सेना के प्रमुख सेनापतियों का परिचय देने के लिए शुक और सारण से कहा। दोनों ने उस ऊँची  अट्टालिका पर से रावण को प्रमुख वानर सेनापतियों का

परिचय दिया। वहीं से रावण ने राम और लक्ष्मण को भी देखा।

रावण द्वारा सीता को राम के मृत्यु की झूठी खबर देना

दोनों पक्ष अब आमने-सामने थे। दोनों पक्ष शत्रु के शक्तियों और रणनीतियों का पता लगा कर अपनी रणनीति बना रहे थे। इसी बीच रावण ने सीता को धोखा देने के लिए एक योजना बनाया।

उसने अपने एक मंत्री विध्युत्जीहव, जो कि बहुत मायावी था, को सीता के समक्ष माया से बना राम का एक कटा हुआ सिर लेकर आने और राम का लक्ष्मण और प्रमुख वानर सेनापतियों के साथ मारे जाने की खबर सुनने के लिए कहा। उसका मानना था कि राम की मृत्यु की सूचना से सीता विवश होकर रावण की बात मान लेगी।

योजनानुसार रावण अशोक वाटिका में सीता से मिलने पहुँचा। उसने उन्हे राम, लक्ष्मण आदि के समुद्र तट पर शिविर में सोते समय हत्या करने की झूठी सूचना दी। तब तक विध्युत्जीहव राम का माया रचित खून टपकता हुआ कटा सर लेकर आ गया। इसे देख कर सीता रोने लगी। लेकिन उन्होने रावण की बात मानने की अपेक्षा पति के साथ मर जाना बेहतर माना।

तभी एक सेवक सेनापति प्रहस्त द्वारा किसी आवश्यक राजकीय कार्य से रावण को बुलाने का संदेश लेकर आया। संदेश सुनते ही रावण वहाँ से चल पड़ा। रावण के निकलते ही वह कटा हुआ मस्तक भी गायब हो गया।

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रावण के जाने के बाद कटा सिर गायब हो गया था। पर सीता रो रही थी। तब सरमा नामक एक राक्षसी जो कि सीता अशोक वाटिका की रक्षा में तैनात थी, लेकिन जिसकी सीता के प्रति मैत्री का भाव था। उसने रावण के द्वारा राम के मारे जाने के झूठ को बता कर और उनके विजयी होने का विश्वास दिलाकर सीता को सांत्वना दिया। सरमा ने ही रावण के मंत्रियों के साथ होने वाले मंत्रणा के विषय में भी बताया।         

रावण द्वारा युद्ध की तैयारी और माल्यवान द्वारा सीता को लौटने की सलाह

रावण जाकर अपनी सभा में बैठ गया। राम की सेना ने लंका को घेर लिया था। अतः अब कारवाई करना आवश्यक था। तुरंत सभी सैनिकों को बुलाने का आदेश हुआ। इस तरह राक्षस की ओर से भी युद्ध की तैयारी होने लगी।

अभी भी वृद्ध मंत्री माल्यवान ने सीता को लौटा कर संधि कर लेने की सलाह दिया। लेकिन रावण ने राम को एक मनुष्य मात्र कह कर तुच्छ दिखाते हुए माल्यवान को झिड़क दिया। रावण ने लंका की सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत किया और सेनापतियों की नियुक्ति की।  

राम द्वारा शत्रु सेना और नगर का निरीक्षण

राम आक्रमण करने से पहले संपूर्ण तैयारी लेना चाहते थे। अतः वे प्रमुख वानरों के साथ सुवेल पर्वत पर चढ़ गए। उस रात सब वहीं रुके। अगली सुबह वे सब सुवेल पर्वत के सबसे ऊँचे शिखर पर चढ़ गए। वहाँ से सारा लंका नगर स्पष्ट रुप से दिखता था। उस ऊँचे शिखर पर से उन सब ने त्रिकुट शिखर पर स्थित लंका का निरीक्षण किया। राजमहल की स्थिति, नगर के द्वारों की स्थित आदि को अच्छे से देखा।

सुग्रीव-रावण का द्वन्द्व युद्ध

जब राम अपने प्रमुख वानरों के साथ इस तरह निरीक्षण कर रहे थे, उस समय नगर के गोपुर (प्रवेश द्वार) की छत पर रावण अपने पूरे राजसी ठाठ से बैठ हुआ था। रावण को बैठे देख कर सुग्रीव को बहुत क्रोध आ गया। वे उसी सुवेल पर्वत की शिखर से ही लंका के गोपुर की छत पर रावण के पास कूद कर चले गए। वे इतनी जल्दी से बिना किसी कुछ कहे वहाँ से कूद गए कि राम सहित कोई भी कुछ नहीं बोल सका।

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अपने सामने अचानक सुग्रीव को आया देख कर रावण कुछ समझ पाता, इससे पहले ही सुग्रीव ने अपना परिचय राम के सेवक और सखा के रूप मे दिया और उसे गिरा दिया। रावण भी ललकारते हुए उससे भीड़ गया।

रावण और सुग्रीव दोनों ही शारीरिक रूप से बल सम्पन्न योद्धा थे। दोनों तरह-तरह के दाँव-पेंच से द्वन्द्व युद्ध करने लगे। रावण ने देखा कि मल्ल युद्ध में सुग्रीव को हराना आसान नहीं था। तो उसने मायावी शक्तियों का प्रयोग करने का विचार किया। सुग्रीव उसकी मंसा समझ गए। इसलिए जैसे वे अचानक आए थे, उसी तरह अचानक रावण को चकमा देकर उछल कर सुवेल पर्वत पर राम जी के पास आ गए।

उन्हे सकुशल आया देख कर राम ने उन्हे गले से लगा लिया। साथ ही इस तरह का दुःसाहस नहीं करने के लिए

कहा। क्योंकि इससे उनकी जान को ख़तरा हो सकता था। इसके बाद राम सभी के साथ नीचे उतर आए।

राम द्वारा आक्रमण के लिए अंतिम तैयारी

राम ने अलग-अलग सेनापतियों के नेतृत्व में सेना का बँटवारा कर दिया। सभी सैन्य टुकड़ियों को लंका के किले के अलग-अलग द्वार पर खड़ा कर दिया। प्रत्येक भाग की जिम्मेदारी प्रमुख सेनापति को दे दिया गया।

लंका के किला का प्रमुख द्वार उत्तर की तरफ था। यहाँ राम, लक्ष्मण स्वयं थे। नील, मैंद, और द्विविद को पूर्वी द्वार की तथा अंगद, ऋषभ, गवाक्ष, गज और गवे को दक्षिण द्वार की जिम्मेदारी की गई। उत्तर और पश्चिम के मध्य के भाग में सुग्रीव थे। वानरो के एक दल का कार्य था किले की दीवार पर घूमते हुए शत्रु सेना की गतिविधियों पर नजर रखना। 

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