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राम द्वारा युद्ध रोकने के अंतिम प्रयास के रूप में अंगद को दूत बना कर भेजाना-भाग 46 

रावण द्वारा अपने भाई विभीषण, अपने नाना माल्यवान (माल्यवन्त) तथा कुछ अन्य मंत्रियों के सीता को लौटा कर संधि करने की सलाह को अस्वीकार करने के बाद युद्ध अवश्यंभावी हो गया था। राम की सेना लंका का घेरा डाल कर खड़ी थी। दोनों ही पक्षों ने ऊंचे स्थान पर चढ़ कर एक दूसरे की शक्ति को अच्छी तरह देख लिया था। दोनों ही पक्षों के अपने-अपने कमजोर और मजबूत पक्ष थे। उसी के अनुसार दोनों ने रणनीति बनाया था।

लंका के सेना की खामी और खूबियाँ

लंका का कमजोर पक्ष यह था कि युद्ध उसके घर में लड़ा जा रहा था। अतः सबसे अधिक जान और माल का नुकसान उन्हें ही होता। शत्रु सेना ने उसे चारों तरफ से घेर रखा था। इसलिए अगर उन्हें किसी चीज के बाहर से जरूरत होती तो बाहर से आ नहीं सकता था। वे अपने ही घर में घिर गए थे। लेकिन उनके पास सुविधा ये होती कि थकने या घायल होने पर उनके सैनिक घर आ कर आराम कर सकते थे। खाद्य सामग्री, वाहन और हथियार संग्रह भी उनके पास अधिक था। रथकार, सूत, वैद्य, आदि की सहायता उन्हें नगर से जल्दी मिल जाती।

पर कई लोग लंका में भी मानते थे कि यह युद्ध अनावश्यक था। युद्ध में विनाश तो दोनों पक्षों का होता है। कुंभकर्ण जैसे लोग यद्यपि युद्ध को अनावश्यक विनाश मानते थे और इसलिए सीता को वापस दे कर संधि कर लेने के पक्ष में थे। फिर भी वे अपने देश की रक्षा के लिए वे लड़ते, भले ही उनका देश गलत हो। विभीषण जैसे कुछ लोग तो अपने देश के हित में रावण का विरोध करते हुए पहले ही साथ छोड़ चुके थे। किन्तु रावण और उसके बहुत से समर्थको को अपनी शक्ति का अभिमान था। वे सोचते थे कि वे आसानी से ये युद्ध जीत जाएंगे। उन्हें अपने योद्धाओं की शक्ति, मायावी शक्तियों, हथियारों, अधिक साधनों, अपने किलेबंदी आदि पर भरोसा था।

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राम के सेना की खामी और खूबियाँ

दूसरी तरफ राम की सेना को राम का भरोसा था। वे सब यह मानते थे की रावण ने गलत किया था और उसे हरा कर सीता को कैद से मुक्त कर वापस ले जाना उन सबके लिए एकमात्र लक्ष्य था। उनके पास हथियार, वाहन आदि युद्ध के साधन कम थे, उनकी खाद्य सामग्री भी सीमित थे, वे एक तरफ लंका से तो दूसरी तरफ समुद्र से घिरे थे। लेकिन अधिक संख्या और बढ़ा हुआ मनोबल उनके जीत को आसान बनाने वाला था।

राम सेना ने इसीलिए यह तय किया था कि वे युद्ध और भोजन के लिए स्थानीय रूप से उपलब्ध सामग्री पर अधिक निर्भर रहेंगे। पास के पहाड़ और जंगलों में उपलब्ध फल-मूल उनका भोजन था। वहीं उपलब्ध पत्थर और वृक्ष का वे हथियार के रूप में प्रयोग करते थे। वे युद्ध जल्दी खत्म करना चाहते थे। राम के अयोध्या लौटने का समय भी पास आ गया था।

युद्ध रोकने के लिए राम का अंतिम प्रयास

इधर बाह्य रक्षा पंक्ति के राक्षसों से वानरों का युद्ध शुरू हो गया था। तथापि इस विनाशकारी युद्ध को रोकने के लिए राम ने फिर एक प्रयास करने के निश्चय किया। उन्होने अंगद को दूत के रूप में रावण के पास भेजा। उनका मानना था कि अगर अभी भी वह सीता को लौटा दे तो महा विनाशकारी युद्ध टल सकता था।

अंगद का दूत बन कर लंका जाना

अंगद तुरंत कूद कर आकाशमार्ग से रावण के राजभवन में चले गए। वहाँ रावण अपने मंत्रियों के साथ शांत भाव से बैठा था। अंगद ने अपना परिचय दिया। फिर राम का संदेश रावण को सुना दिया। अंगद के इन बातों से रावण को क्रोध आ गया। बैठने के लिए आसन नहीं देने पर उन्होने अपनी पूंछ  का आसन बना लिया।

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उन्होने अपनी शक्ति दिखाते हुए अपना पैर जमीन पर रख कर उसे उठाने की शर्त रखी। पर कोई भी उनका पैर हिला नहीं सका। क्रुद्ध होकर रावण ने अपने सेवकों को उन्हे पकड़ कर मार देने का आदेश दिया। उनसे इस आदेश का पालन करते हुए चार राक्षसों ने अंगद को पकड़ लिया।

अंगद ने अपने पकड़े जाने का कोई विरोध नहीं किया। फिर अचानक ज़ोर से उछल कर महल की चोटी पर चले गए। उनका वेग इतना अधिक था कि उन्हे पकड़े हुए चारो राक्षस गिर पड़े। भवन की छत तोड़ कर उन्होने अपना नाम सुनाते हुए तेज गर्जना की। इस तरह, सबको अचंभित कर और अपनी शक्ति दिखा कर उनका मनोबल तोड़ते हुए अंगद राम के पास पहुँच गए। रावण को क्रोध तो बहुत आया पर कुछ कर नहीं सका।

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