यमलार्जुन कौन थे और कृष्ण ने उनका उद्धार कैसे किया?-भाग 11

यमलार्जुन उद्धार श्रीकृष्ण की एक प्रमुख बाललीला है। जब उन्होंने चलना सीखा ही था, तभी इस छोटी-सी उम्र में जिस ऊखल में वे बंधे थे, उससे अर्जुन के दो जुड़वा वृक्षों को उखाड़ दिया था।

श्रीकृष्ण की शरारतें

कार्तिक मास की बात है। माता यशोदा श्रीकृष्ण जी के लिए दही मथ कर माखन बना रही थी। माखन मथते हुए वह श्रीकृष्ण द्वारा अभी तक किए गए बाल-लीलाओं का स्मरण और गान करती जा रही थी। अत्यधिक वात्सल्य स्नेह के कारण उनके स्तन से अपनेआप दूध निकल रहा था।

उसी समय श्रीकृष्ण वहाँ माता की दूध पीने की लालसा से आए। माता उन्हें अपना दूध पिलाने लगी। लेकिन तभी दूसरे तरफ चूल्हे पर रखे दूध पर उनकी नजर गई जिसमें उफान आने लगा था। यशोदाजी श्रीकृष्ण को गोद से उतार कर दूध की तरफ दौड़ पड़ीं। श्रीकृष्ण को दूध पीने से अभी तृप्ति नहीं हुई थी। इसलिए माता का इस तरह चला जाना उन्हे अच्छा नहीं लगा और थोड़ा-सा क्रोध आ गया।

क्रोध में उन्होंने पास रखे लोढ़े से दही की मटकिया फोड़ डाली और बनावटी आँसू आँखों में भर कर वहाँ से चले गए और दूसरे घर में जाकर अकेले में बासी माखन खाने लगे। जब यशोदाजी आई तो उन्हें वहाँ पर कृष्ण नहीं मिले। दूसरे घर में जाकर देखा तो कृष्ण जी उल्टी रखे हुए ऊखल के ऊपर चढ़कर स्वयं भी माखन खा रहे थे और बंदरों को भी खिला रहे थे। कहीं मेरी चोरी न खुल जाए इस डर से चौकन्ने होकर इधर-उधर देख भी रहे थे।

माता द्वारा दंड देना

Read Also  राम के पिता राजा दशरथ की मृत्यु कैसे हुई?-भाग 19  

माता हाथ में छड़ी लिए पीछे से धीरे-से उनके पास जा पहुंची। माँ को आया देखकर वह ऊखल से कूद कर भाग गए। यशोदा मैया भी उनके पीछे भागी। बहुत मुश्किल से वह कृष्ण को पकड़ पाई। 

माता के पकड़ में आने के बाद और माता की हाथ में छड़ी देखकर श्रीकृष्ण डर कर रोने लगे। रोते हुए हाथों से आंखें मल रहे थे, इससे उनकी काजल की स्याही फैल गई थी। उनका यह विलक्षण रूप देख कर माता का वात्सल्य प्रेम उमड़ पड़ा।

रस्सी छोटी पड़ना

माता ने देखा कि पुत्र बहुत डर गया है इसलिए उन्होंने छड़ी फेंक दी। उन्होंने सोचा श्रीकृष्ण को इस बार रस्सी से बांध देना चाहिए ताकि वह कहीं भागे नहीं।

जब माता यशोदा अपने नटखट बालक को रस्सी से बांधने लगी तब वह रस्सी दो उंगली छोटी पड़ गई। तब उन्होंने दूसरी रस्सी लाकर उसमें जोड़ी। जब वह भी छोटी हो गई। उसके साथ और भी रस्सियाँ जोड़ी। इस प्रकार यशोदा जी ने घर की सारी रस्सियाँ जोड़ डाली फिर भी वह भगवान श्रीकृष्ण को न बांध सकी।

श्रीकृष्ण का ऊखल से बांधा जाना

उनकी असफलता पर देखने वाली गोपियां मुस्कुराने लगी। वह स्वयं भी मुस्कुराते हुए आश्चर्यचकित हो रही थीं। भगवान श्रीकृष्ण ने देखा कि मेरी मां का शरीर पसीने से लथपथ हो गया है और वह बहुत थक गई है तब कृपा करके वे स्वयं ही अपनी माँ के बंधन में बंध गए। उन्हें दंड देने के लिए माता ने उन्हें ऊखल से बांध दिया। उन्हें बांध कर यशोदा जी घर के कामों में लग गई। 

Read Also  देवी सरस्वती का हाथ अभय मुद्रा में क्यों नहीं होता?

इधर उखल में रस्सी से बंधे हुए भगवान को अर्जुन वृक्षों की याद आ गई जिन्हें उन्हें मुक्ति देना था।

यमलार्जुन को शाप

अर्जुन के ये दोनों वृक्ष (जिन्हें संयुक्त रूप से यमलार्जुन कहते थे) वास्तव में यक्षराज कुबेर के पुत्र थे। इनके नाम थे नलकूबर और मणि ग्रीव। इनका घमंड देखकर देवर्षि नारद जी ने इन्हें शाप दे दिया था और इस कारण वे वृक्ष बन गए थे।

हुआ यह था कि एक बार यह दोनों मंदाकिनी के तट पर कैलाश के रमणीय उपवन में वारुणी मदिरा पीकर बहुत-सी स्त्रियों के साथ विहार कर रहे थे। संयोगवश उस समय उधर से नारदजी निकले। नारदजी को देख कर भी इन्होने न तो कपड़े पहने और न ही उन्हें प्रणाम किया जबकि अन्य अप्सराओं ने ऐसा किया। जब देवर्षि नारदजी ने देखा कि यह देवताओं के पुत्र होकर भी अभिमान से अंधे और मदिरा पान करके मत हो रहे थे तब उन्होंने उन पर अनुग्रह करने के लिए शाप देते हुए कहा की मदिरा में मत होकर वह दोनों वृक्ष की भांति निर्वस्त्र खड़े रह गए थे इसलिए वह दोनों वृक्ष बन जाए।

उनके द्वारा क्षमा माँगने पर नारदजी यह कहा कि वृक्ष योनि में जाने पर भी उनकी कृपा से इन्हें भगवान की स्थिति बनी रहेगी और देवताओं के 100 वर्ष बीतने पर इन्हें भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य प्राप्त होगा और फिर भगवान के चरणों में परम प्रेम प्राप्त करके अपने लोक चले जाएंगे। इस कारण नलकूबर और मणिग्रीव दोनों भाई अर्जुन के वृक्ष बन गए। दोनों भाई अर्जुन के वृक्ष के रूप में यमला-अर्जुन के नाम से प्रसिद्ध हुए।

Read Also  नन्द-यशोदा को भगवान की बाललीला देखने का सौभाग्य क्यों मिला था?-भाग 9   

यमलार्जुन की मुक्ति 

यमलार्जुन को श्राप मुक्त कर उनका उद्धार करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण जिस उखल में बंधे हुए थे, उसके सहित घुटनों के बल चलते हुए उन दोनों वृक्षों के तरफ बढ़े। वे दोनों वृक्षों के बीच से निकले। उनके पीछे लुढ़कता हुआ उखल दोनों वृक्षों के बीच फंस गया। श्रीकृष्ण ने ऊखल को जोर से खींचा जो कि इन दोनों वृक्षों के बीच अटका हुआ था। इससे दोनों ही वृक्ष जड़ से उखड़ गए और धरती पर गिर पड़े।

उन दोनों वृक्षों में से दो तेजस्वी सिद्ध पुरुष निकले। उन्होंने श्रीकृष्ण के चरणों में प्रणाम कर उनकी स्तुति की और उनसे अपनी भक्ति कर वरदान प्राप्त कर अपने लोक को चले गए। उन्होंने देवर्षि नारद का परम उपकार माना कि उनके शाप के कारण उन्हे श्रीकृष्ण का दर्शन प्राप्त हुआ।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top