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मेघनाद द्वारा राम-लक्ष्मण को युद्ध में घायल करना-भाग 48

भारतीय उपमहाद्वीप में युद्ध का एक सामान्य नियम था कि रात को युद्ध नहीं होता था। लेकिन राक्षसों की शक्ति रात को बढ़ जाती है। इसलिए वे रात को भी युद्ध करते रहे। इसलिए युद्ध दिन-रात दोनों चला। राक्षसों को उम्मीद थी कि रात्री युद्ध में वे नर (राम-लक्ष्मण) और वानर (वानर, रीछ आदि सेना की टुकड़ियों) को आसानी से हारा देंगे। किन्तु ऐसा हुआ नहीं। रात्री युद्ध में भी राम सेना ने उन्हें अच्छी टक्कर दिया। 

युद्ध भूमि में मेघनाद का आना

ऐसे में रावण का प्रतापी पुत्र मेघनाद युद्ध भूमि में आया। वह दिव्य अस्त्रों के साथ मायावी शक्तियों का भी ज्ञाता था।

अंगद द्वारा मेघनाद की पराजय और उसका मायावी युद्ध

पर घोर द्वन्द्व युद्ध में युवराज अंगद ने उसे पराजित कर दिया। अब वह मायावी युद्ध करने लगा। मेघनाद (जो देव राज इन्द्र को पराजित करने के कारण इन्द्र्जीत भी कहलाता था) अदृश्य हो गया। उसे अदृश्य होने की विशेष शक्ति थी। वरदान के कारण अदृश्य होने पर उसे देखा पाना किसी के लिए संभव नहीं था। वह अदृश्य होकर युद्ध भूमि में विभिन्न अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा करने लगा। इससे वानर सेना व्याकुल हो गई।

राम-लक्ष्मण का नागपाश में बंधना

सेना को व्यथित कर मेघनाद ने राम और लक्ष्मण को भी तीरों से घायल कर दिया। उनके कवच टूट गए। घायल होते हुए भी राम ने दस प्रमुख वानर योद्धाओं को मेघनाद की स्थिति पता करने के लिए कहा। तब तक मेघनाद ने नागपाश वाले ब्रह्मास्त्र का प्रयोग राम और लक्ष्मण पर कर दिया।

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इस दिव्य अस्त्र का प्रभाव ऐसा था कि तीर नाग (सांप) की तरह जा कर शरीर से लगते थे और लपेट लेते थे। इनके नुकीले और विषैले दाँत शरीर में चुभ जाते थे, जिससे मुक्त होना संभव नहीं होता था। इसलिए नागपाश का जिस पर प्रयोग किया जाता था उसकी मृत्यु निश्चित हो जाती थी।

मेघनाद का राम-लक्ष्मण को मरा मानना

नागपाश में बंध कर दोनों भाई अचेत हो गए। पहले से भी वे दोनों बहुत घायल थे। शरीर में नागफनी की तरह बाण लगे हुए थे। समस्त शरीर से रक्त निकल रहा था। उनके धनुष उनके हाथ से गिर कर कुछ ही दूर पर पड़े हुए थे। मेघनाद उन्हे मरा हुआ समझ कर नगर के अंदर चला गया। उसने सोचा मुख्य नायक के मरने के बाद सारी सेना स्वयं ही डर कर भाग जाएगी।

मेघनाद जीत की खुशी के साथ नगर में गया और अपने पिता रावण को राम लक्ष्मण की मृत्यु का यह सुखद समाचार सुनाया। रावण ने पुत्र का अभिनन्दन किया। राक्षसों में प्रसन्नता की लहर दौड़ गई। रावण ने राक्षसियों को पुष्पक विमान द्वारा सीता को रणभूमि में अपने पति की दुर्दशा दिखाने के लिए कहा।

सीता का युद्ध भूमि में राम-लक्ष्मण को घायल देखना

रावण की आज्ञा अनुसार सीता को विमान से जमीन पर पड़े हुए दोनों भाई को दिखाया गया। (इस समय भी अंधेरा ही था, लेकिन युद्ध रुके होने के कारण मशाल जल गया था)। वह रोने लगी लेकिन तृजटा ने उन्हे बताया कि राम-लक्ष्मण में जीवित होने के लक्षण है।

अगर कोई राजा मर जाए तो उसकी सेना में घबराहट होती है और वे डर कर भाग जाते हैं। लेकिन इतनी विशाल वानर सेना शांति से उन्हे घेरे खड़ी थी। उनके मुख पर दुख और घबराहट के बजाय क्रोध था। यहाँ तक कि दोनों भाइयों के चेहरे पर भी मृतक जैसे कोई चिह्न नहीं थे।

सीता को भी पता था कि राम के पास कई तरह के दिव्य अस्त्र थे, जिसका वे उपयोग कर सकते थे। लेकिन नहीं किया। इस से पता चलता था कि राम जानबूझ कर घायल हुए थे। इन सब लक्षणो से सीता जी को संतुष्टि मिली कि उनके पति और देवर सही-सलामत है। राक्षसी उन्हे फिर अशोक वाटिका में पहुँचा आई।      

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राम का सचेत होना

राम, लक्ष्मण को मरणासन्न अवस्था में अचेत पड़े देख कर वानर सेना शोक में डूब गई। वे सब उन दोनों को घेर कर खड़े हो गए। किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था। राम ने ब्रह्मास्त्र का और मेघनाद के वरदान का सम्मान रखने के लिए उसका प्रभाव अपने पर स्वीकार किया था। वे चाहते तो इसे निष्फल कर सकते थे। कुछ देर बाद राम स्वयं सचेत हो गए। (यद्यपि वे अभी भी नागपाश में जकड़े हुए थे)।

राम से कुछ ही दूरी पर लक्ष्मण अभी भी अचेत पड़े हुए थे। उन्हे देख कर राम विलाप करने लगे। तब तक विभीषण भी वहाँ आ गए। वे अभी तक दूसरे द्वार के पास अपनी सैन्य टुकड़ी को संभाल रहे थे। सुग्रीव, विभीषण आदि भी विलाप कर रहे थे और एक-दूसरे को सांत्वना दे रहे थे।

सुषेण द्वारा औषधि बताना

इस बीच वानर सेनापति सुषेण ने बताया कि जब देवासुर संग्राम हुआ था, तब वे भी उसमे थे। उस युद्ध में देवगुरु बृहस्पति मंत्र विद्या और दिव्य औषधियों के प्रयोग से घायल देवताओं के स्वस्थ कर देते थे। उसी युद्ध में सुषेण ने कुछ दिव्य औषधियों का ज्ञान प्राप्त किया था।

सुषेण ने उन औषधियों का नाम बताया संजीवकरणी और विशल्यकरणी। इन दोनों औषधियों का निर्माण स्वयं ब्रह्माजी ने किया था। इन का पता बताया–क्षीर सागर के तट पर चंद्र और द्रोण नामक दो पर्वतों पर। 

(जब बाद में फिर लक्ष्मण जी घायल हुए थे, तो के लिए संजीवनी बूटी सुषेण की इस सलाह से ही हनुमान जी लाए थे। अन्य कई ग्रंथ लक्ष्मण को जीवित करने वाले सुषेण को लंका का राज वैद्य बताते है। लेकिन वाल्मीकि रामायण में स्पष्ट रुप से बताया गया है कि ये सुषेण लंका के राज वैद्य नहीं बल्कि वानर सेनापति थे और बाली की पत्नी तारा के पिता थे। उन्होने कहाँ से यह विद्या सीखा था, वो भी वो बताते हैं। संभवतः समान नाम होने से यह संदेह हुआ है।)  

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गरुड़ द्वारा दोनों भाइयों को नागपाश से मुक्ति

जब औषधियों की चर्चा चल रही थी तभी वहाँ तेज आँधी की तरह हवा का झोंका आया। सबने जब उधर देखा तो वे भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ जी थे। उन्हे देवताओं से राम, लक्ष्मण के नागपाश में बंधे होने की सूचना मिली थी। गरुड़ जी को देखते ही नाग की तरह के वे बाण अपने आप दोनों भाइयों के शरीर से निकल कर भाग गए।

गरुड़ जी ने बताया कि वो वास्तव में नाग थे जो मायावी मंत्र के कारण बाण के रूप में परिणत हो कर चुभ गए थे। इसलिए उनकी पकड़ से निकलना किसी भी उपाय से संभव नहीं था। लेकिन चूंकि नाग गरुड़ से डरते है इसलिए उन्हे देखते ही भाग खड़े हुए।

इसके बाद गरुड़ जी ने दोनों भाइयों को स्पर्श किया। उनके स्पर्श करते ही उनके सारे घाव भर गए, पीड़ा जाती रही और वे पहले की तरह ही हो गए। गरुड़ जी राम को प्रणाम कर चले गए।

राम-लक्ष्मण के जीवित होने की रावण को सूचना 

उनके जाते ही राम-लक्ष्मण को स्वस्थ देख कर समस्त वानर सेना में हर्ष और उत्साह भर गया। सब ने एक साथ मिलकर ज़ोर से हर्ष-ध्वनि की। यह गर्जन लंका तक पहुँची। राजा की मृत्यु होने पर इस तरह के गर्जन नहीं होती।

रावण ने कुछ सेवकों को यह पता लगाने के लिए भी कहा कि शोक के समय वानर सेना हर्ष क्यों प्रकट कर रही है? उनलोगों ने परकोटे पर चढ़ कर देखा कि दोनों भाई जीवित हैं। इस असंभव को संभव देख कर राक्षस सेना में दुख छा गया।  

रावण और मेघनाद आश्चर्य से भर उठे। इस नागपाश से मुक्त होना असंभव था, जो कि संभव हो गया। पहली बार नागपाश निष्फल हुआ था।

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