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मेघनाद दुबारा युद्ध में क्यों आया?-भाग 51          

राम-रावण युद्ध में अब तक कुंभकर्ण सहित लगभग सारे प्रमुख योद्धा और सेनापति मारे जा चुके थे। स्वयं रावण भी एक बार राम से हार चुका था। केवल मेघनाद ही ऐसा योद्ध था जो बिना हारे या मरे युद्धभूमि से लौटा था। इतना ही नहीं उसने राम-लक्ष्मण को घायल भी कर दिया था। अतः पिता की विह्वलता देख कर मेघनाद ने उसे सांत्वना दी और स्वयं युद्ध के लिए जाने का निश्चय व्यक्त किया। रावण ने उसे प्रसन्नतापूर्वक इसके लिए अनुमति दे दिया।

मेघनाद का पुनः युद्ध के लिए जाना

मेघनाद को युद्ध के लिए निकलते देख कर राक्षस सेना में से नया उत्साह भर आया। लेकिन उसने युद्धभूमि में पहुँच कर तुरंत ही युद्ध नहीं शुरू किया। उसने अपनी राक्षस सेना को अपने रथ के चारो ओर घेर कर खड़ा कर दिया। स्वयं रथ से उतर कर जमीन पर अग्नि की स्थापना कर कुछ अनुष्ठान करने लगा। फिर उसने ब्रहमास्त्र का आवाहन किया। सिद्ध ब्राह्मास्त्र मंत्र से अपने धनुष, रथ आदि वस्तुओं को अभिमंत्रित किया।

मेघनाद का मायावी युद्ध

यह सब अनुष्ठान करने के बाद मेघनाद अपने रथ पर चढ़ा और अपने को आकाश में अदृश्य कर लिया। इसके बाद अपनी सेना का मनोबल बढ़ते हुए स्वयं भी वानर सेना पर भयंकर रूप से अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा करते हुए टूट पड़ा। लेकिन वानर सेना भी पीछे नहीं हटी। बहुत से वानर सैनिक मारे गए और उनके अधिकांश सेनापति घायल हो गए।

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अपने को जीता हुआ मान कर मेघनाद का लंका नगर लौट जाना

सेना को तितर-बितर करने के बाद मेघनाद राम-लक्ष्मण पर बाणों की वर्षा करने लगा। राम ने लक्ष्मण से कहा कि मेघनाद ब्रहमा के मंत्रों से अभिमंत्रित अस्त्र-शस्त्र चला रहा है। इसलिए उन दोनों को चुपचाप धैर्य के साथ इन अस्त्रों का प्रहार सहना चाहिए। उन्हे अचेत देख कर मेघनाद अपनी जीत मान कर नगर में चला जाएगा।

जैसा कि राम ने सोचा था, राम-लक्ष्मण सहित अधिकांश सेनापतियों को घायल और अचेत देख कर मेघनाद जयनाद करता हुआ नगर में लौट गया।

राम-लक्ष्मण को अचेत देख कर वानर सेना का असमंजस

इधर राम-लक्ष्मण को निश्चेष्ट देख कर किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। विभीषण ने उन सब से युक्तिसंगत बात कहा। दोनों भाइयों ने मेघनाद के ब्रहम अस्त्र को देख कर उसके प्रतिकार के लिए कोई अस्त्र नहीं चलाया था।

इसका अर्थ था कि उन्होने स्वयं ही अपनी इच्छा से ब्रहमा जी के वचनों के पालन के लिए अस्त्रों का प्रभाव अपने पर लिया था। इसलिए उनके प्राण पर कोई संकट नहीं आ सकता। वे केवल कुछ देर के लिए मूर्च्छित हैं। हनुमान जी को भी यह तर्कसंगत लगा।

घायल सैनिकों का हनुमान जी द्वारा निरीक्षण

हनुमान जी विभीषण के साथ अपने अपने हाथों में मशाल लेकर युद्धभूमि का निरीक्षण करने गए। उद्देश्य था मेघनाद के अस्त्रों से घायल सैनिकों की खोज-खबर लेकर उनकी सहायता करना और उन्हे सांत्वना देना। उन्होने सुग्रीव, अंगद, जांबवान, सुषेण इत्यादि बड़े-बड़े योद्धाओं को रणभूमि मे घायल पड़े देखा।

जांबवान द्वारा हनुमान के विषय में पूछना

विभीषण ने जांबवान जी को अर्द्ध मूर्च्छित अवस्था में पड़े हुए देखा। वे उनके पास गए। उनके शरीर में बहुत से बाण चुभे हुए थे। पीड़ा और अत्यधिक रक्तस्राव के कारण वे आँखें भी नहीं खोल पा रहे थे। जांबवान जी ने विभीषण की आवाज पहचान कर उनसे हनुमान जी के विषय में पूछा।

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विभीषण को विस्मय हुआ कि वे राम, लक्षम, वानरराज सुग्रीव और युवराज अंगद आदि किसी के विषय में नहीं पूछ कर हनुमान के विषय में ही क्यों पूछ रहे थे। इसका उत्तर देते हुए जांबवान जी ने कहा कि अगर हनुमान जीवित हैं तो मरी सेना भी जीवित हो जाने की आशा थी और अगर वे जीवित नहीं होते तो सारी सेना मृतक तुल्य ही थी। 

घायल सैनिकों के लिए हनुमान जी द्वारा औषधि लाना

तब तक हनुमान जी भी जांबवान के नजदीक आ गए। उन्होने जांबवान जी के दोनों पैर पकड़ कर विनम्र भाव से उन्हे प्रणाम किया। जांबवान जी ने उनसे कहा “आओ संपूर्ण वानरों की रक्षा करो”।

उन्होने हनुमान से समुद्र पार कर बहुत दूर हिमालय जाने के लिए कहा। वहाँ ऋषभ और कैलाश पर्वत शिखर के बीच औषधियों का एक पर्वत था। उस पर्वत पर चार विशेष औषधियाँ थीं– मृतसंजीवनी,  विशल्यकरणी, सुवर्णकरणी और संधानी। इन औषधियों ने इतनी चमक थी कि ये पहचान में आ जाती। जांबवान ने हनुमान से उन्हे लाने के लिए कहा।

जांबवान की ये बाते सुनकर हनुमान जी तुरंत ही विशाल रूप मे एक पर्वत शिखर पर चढ़ कर हिमालय के लिए छलांग लगा दिया। उनके वेग और भार से पर्वत धँस गया। रास्ते में अनेक स्थानो को लाँघते हुए हजारों योजन की यात्रा कर के हनुमान उस औषधि वाले दिव्य पर्वत शिखर पर पहुँचे। उन दिव्य औषधियों ने जब देखा कि कोई उन्हे लेने आया है तो वे अदृश्य हो गईं।

यह देख कर हनुमान को क्रोध आ गया। उन्होने क्रोध से उस पर्वत शिखर को ही उखाड़ लिया। वे उसे लेकर वापस उसी वेग से वहाँ आ गए जहाँ उनकी सेना थी। उन्हे आया देख कर वानर सेना ने इतने ज़ोर का हर्षनाद किया कि लंका के राक्षस घबड़ा गए।

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घायल और मृत राम सैनिकों का स्वस्थ होना

उन महा औषधियों के सुगंध से राम-लक्ष्मण सहित सभी वानर और रीछों के शरीर से बाण अपने आप निकल गए और घाव भर गए। वे सब ऐसे उठ बैठे जैसे सो कर उठे हो। घायल ही नहीं मृत सैनिक भी उठ खड़े हुए।

राक्षस सैनिक क्यों नहीं जीवित हुए?

औषधियों के गंध से उस युद्ध भूमि में घायल या मरे सभी सैनिक स्वस्थ होकर उठ खड़े हुए। किन्तु राक्षस सैनिक इसमें शामिल नहीं थे। यह सच है कि उस रण भूमि में वानर और राक्षस दोनों सैनिक मरे थे। लेकिन रावण की आज्ञा के अनुसार जिस दिन से युद्ध शुरू हुआ था, उसी दिन से युद्ध में मरने वाले राक्षस सैनिकों का शव उठा कर समुद्र में फेंक दिया जाता था। इसका कारण यह था कि रावण नहीं चाहता था कि वानर समझ सके कि बहुत से राक्षस मारे गए है। इसीलिए रणभूमि में किसी राक्षस का मृत शरीर नहीं था। इन औषधियों के प्रभाव से केवल वानर जीवित हुए।

सब के जीवित और स्वस्थ होने के बाद हनुमान फिर उसी तरह प्रबल वेग से जाकर इस शिखर को वहीं पहुँचा आए, जहाँ से वे इसे लाए थे।

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