भागवत क्या है?- भाग 1

भागवत महापुराण

भागवत एक पुराण है जिसे इसके महत्त्व के कारण ‘श्रीमदभागवत महापुराण’ कहते हैं। संक्षेप में इसे भागवत भी कहते हैं। यह हिन्दू धर्म के सबसे सम्मानित ग्रन्थों में से है।

पुराण क्या होता है?

पुराण का अर्थ होता है पुरानी कहानियाँ। अर्थात ऐसी कहानियाँ जिनसे हमे शिक्षा मिल सके। ये प्रश्न-उत्तर की शैली में होते थे।

कहानियों और प्रश्न-उत्तर के माध्यम से बातें बताना बहुत प्राचीन समय से भारत में प्रचलित रही है। प्राचीन मनीषियों का मानना था कि इतिहास तिथियों एवं घटनाओं का निर्जीव विवरण मात्र हो जाएगा अगर इसकी वर्तमान के लिए कोई उपयोगिता नहीं हो तो। इसीलिए इतिहास के उन्हीं घटनाओं और कहानियों का वर्णन किया जाता था जिससे वर्तमान के लिए उपयोगी कोई शिक्षा मिल सके।

भागवत का अर्थ

भागवत का शाब्दिक अर्थ होता है “वह जिसके प्रति भक्ति की जाय”। इसमें भगवान के प्रति भक्ति और भगवान से प्रेम को ही मुक्ति का मार्ग बताया गया है। कालक्रम में इससे पहले के ग्रन्थों, जैसे वेद, आरण्यक, उपनिषद आदि में तपस्या, यज्ञ आदि की महिमा का वर्णन किया गया था और ईश्वर प्राप्ति के लिए इन पर बल दिया गया था। लेकिन यज्ञ और तपस्या सबके वश की बात नहीं थी। भागवत में ईश्वर प्राप्ति का एक ऐसा मार्ग बताया जो सबके लिए सुलभ था। सामान्य भौतिक साधन और आध्यात्मिक क्षमता का व्यक्ति भी यह कर सकता था। भागवत के बाद से भक्ति मत का बहुत प्रचलन हो गया।

ग्रन्थों की मौखिक परंपरा क्या होती है?

भारत में ज्ञान और विचार मौखिक परंपरा के अनुसार एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जाता था। उदाहरण के लिए समस्त वेद पहले श्लोक के रूप में बनाए गए। इन्हें गुरु या आचार्य अपने शिष्यों को सुनाते थे। शिष्य उन्हें ज्यों-का-त्यों याद कर लिया करते थे। इसीलिए वेदों को श्रुति भी कहते थे जिसका अर्थ होता था जिसे सुना गया हो। लिखने की परंपरा नहीं थी। इसलिए उच्चारण की शुद्धता और यदाश्त की तीव्रता बहुत आवश्यक होती थी। इन्हें गाने योग्य श्लोक में लिखा जाता था ताकि याद करना सहज हो।

लेकिन जब हजारों श्लोकों के ग्रंथ रचित किए जाते थे तो उन्हें उसी रूप में याद करना बहुत कठिन होता था। इसलिए प्राचीन हिन्दू ग्रन्थों में किसी भी कथा को कहने से पहले वाचक यह बताता था कि उसके पास यह ज्ञान कैसे आया। यह श्रोताओं को यह विश्वास दिलाने के लिए होता था कि वह जो कथा उन्हें सुनाने जा रहे वे विश्वसनीय श्रोत से आई है।

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 यद्यपि कुछ ग्रंथ लिखे भी गए, जैसे वेदव्यास ने गणेश जी की सहायता से महाभारत लिखवाया था। लेकिन उसकी प्रति कहाँ थी इसकी कोई जानकारी कहीं नहीं मिलती। लिखित ग्रन्थों की प्रति बहुत कम होती थी और ऐसे ग्रंथ भी कहने-सुनने से ही प्रचलित होता था। कथा मिलता है कि वेद व्यास ने अपनी रचना अपने शिष्यों को सुनाया। उनकी आज्ञा से उनके एक शिष्य ने जनमेजय के सर्प यज्ञ में यह कथा अनेक लोगों के समक्ष सुनाया। वहीं से इसका प्रसार-प्रचार मौखिक रूप से कहने-सुनने के कारण हुआ।

अधिकांश ग्रन्थों की रचना ऐसे ही हुई थी। बहुत बाद में इन्हें लिपिबद्ध किया गया था। भागवत के साथ भी ऐसा ही हुआ। रचना होने के लगभग चार हजार वर्ष बाद इसे लिखा गया।

मौखिक परंपरा के लाभ और हानि

मौखिक परंपरा का सबसे बड़ा लाभ यह हुआ कि ग्रन्थों की बातें और कथाएँ कहने-सुनने के माध्यम से आम जनता तक भी पहुँच जाता था। अर्थात ज्ञान केवल पढे-लिखे और संभ्रांत वर्ग तक ही सीमित नहीं था। धर्म सत्र अर्थात अधिवेशन से प्रचार-प्रसार में और भी सहायता मिलती थी।

पर इससे बुराई यह हुई कि सबके समझ का स्तर और यदाश्त एक जैसा नहीं हो सकता था। कभी-कभी जानबूझ कर तो कभी अनजाने में इन ग्रन्थों के मूल रूप बहुत हद तक बदल गए। इसका एक प्रसिद्ध उदाहरण यह है कि जब मध्य काल में व्यक्ति के स्वयं का बौद्धिक और नैतिक स्तर गिर गया तब उसने परम शौर्यशाली कृष्ण के प्रेमी और बाल रूप पर अधिक ज़ोर देना शुरू किया।

कभी-कभी लिपिकार अर्थात उस ग्रंथ को लिपिबद्ध करने वाले भी अपने कुछ विचार उसमें जोड़ देते थे। उदाहरण के लिए भागवत की मूल कथा एक दिगंबर बाल संत द्वारा गंगा नदी के तट पर एक वृक्ष के नीचे एक राजा को सुनाई गई थी। श्रोता एक राजा था वह चाहता तो अपनी राजधानी में कथा करवा सकता था या हरिद्वार में भी कोई भव्य पंडाल बना सकता था। लेकिन उस समय ऐसा कुछ नहीं किया गया। लेकिन भागवत का जो लिखित रूप अभी मिलता है उसके अनुसार कथा अपने सगे-संबंधियों के साथ भव्य रीति से पंडाल बना कर करना चाहिए। इसके अतिरिक्त भी अनेक प्रसंग ऐसे हैं जो ईस्वी पूर्व पहली-दूसरी शताब्दी अर्थात जब इसे लेखबद्ध किया गया उस समय के विचार प्रतीत होते हैं।

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भागवत की रचना कब हुई?

सर्वप्रथम इसे शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को महाभारत के कुछ ही दिनों बाद ही, अर्थात आज से करीब छह हजार वर्ष पहले सुनाया था। जो मौखिक परंपरा के अनुसार हजारों वर्षों तक प्रचलित रहा। इतिहासकारों के अनुसार इसको लिपिबद्ध ईस्वी पूर्व पहली या दूसरी शताब्दी में अर्थात आज से लगभग दो हजार वर्ष पहले किया गया।    

भागवत को सबसे पहले किसने कहा और किसने सुना?

परीक्षित ने अपने सन्निकट मृत्यु को देखते हुए अपने पुत्र जनमेजय का हस्तीनापुर के सिंहासन पर अभिषेक कर दिया और स्वयं हरिद्वार चले गए। यहीं एक विशाल वृक्ष के नीचे गंगा नदी के पवित्र तट पर मायातीत बाल ऋषि शुकदेव जी ने उन्हें यह कथा सुनाया था। श्याम वर्ण के दिगंबर बालक शुकदेव जी ने सात भागों में बाँट कर सात दिनों में सम्पूर्ण कथा सुनाया।

भागवत की पहली कथा क्यों सुनाई गई थी।

हस्तीनापुर के राजा परीक्षित ने किसी ऋषि का कोई अपराध कर दिया। उस ऋषि के पुत्र ने राजा को “आज से सातवें दिन” मरने का शाप दे दिया। इस मृत्यु को टालने का कोई उपाय नहीं देख कर राजा परीक्षित ने कुछ ऐसा करने के लिए सोचा जिससे इन सात दिनों में ही उनका जीवन संवर जाए और मृत्यु बाद भी उन्हें सदगति मिले। इसके लिए उन्हें कई सलाह दिए गए। लेकिन अंततः जो रास्ता उन्होने चुना वह था भागवत की कथा सुनना।

bhagwat

राजा परीक्षित कृष्ण के परम मित्र और संबंधी अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु के पुत्र थे। जब वह अपनी माँ उत्तरा के गर्भ में ही थे तभी अश्वस्थामा ने उन्हें मारने के लिए ब्रह्मास्त्र चलाया था कृष्ण ने ही उनके जीवन को बचा कर पांडव कुल को बचाया था। महाभारत के युद्ध में उनके सहयोग से ही पांडवों की जीत हो सकी थी।

इस तरह कृष्ण ईश्वर होने के साथ-साथ उनके पूर्वज भी थे और उनके जीवन से गहरे रूप से संबन्धित थे। इसलिए परीक्षित उनकी कथा सुनना चाहते थे।

भागवत की विषय-वस्तु

भागवत में भागवत कहने-सुनने की विधि, इसका महत्त्व, सृष्टि का आरंभ, युग आदि समय

का विभाजन, भक्ति, विष्णु के सभी अवतार, इत्यादि अनेक विषयों का वर्णन है, पर इसमें सबसे विशद रूप से भगवान कृष्ण का वर्णन है। समस्त ग्रंथ अध्यायों में बंटा है जिसे स्कन्ध कहा गया है। इसके दसवें स्कन्ध में श्रीकृष्ण का वर्णन है।

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भागवत का महत्त्व

इसका महत्त्व तीन दृष्टियों से हम देख सकते हैं– ऐतिहासिक, धार्मिक और साहित्यिक।

ऐतिहासिक दृष्टि से वर्तमान हिन्दू धर्म इसी समय से अपने वर्तमान रूप में आया। इसमें कही गई बातें यद्यपि नई नहीं थी लेकिन उस सब को एकबद्ध कर लिख दिया गया। इसकी लोकप्रियता के कारण ही इसे भागवत पुराण नहीं बल्कि महापुराण नाम दिया गया। इसके बाद पुराण लिखने की एक परंपरा शुरू हो गई। हालांकि सबकी विश्वसनीयता और जन स्वीकृति एक जैसी नहीं है।

इसके महत्त्व का दूसरा कारण है कि पहले से प्रचलित भक्ति मत को इसने एक रूप और आकार दिया।

धार्मिक दृष्टि से भगवान कृष्ण के विषय में जानने का यह सबसे विश्वसनीय और विस्तृत लिखित साधन है। भगवान के विभिन्न अवतारों आदि अनेक विषयों का इसमें वर्णन है। कृष्ण के अतिरिक्त भी अनेक कथाएँ और उपकथाएँ इसमें है। विष्णु पुराण इसके बहुत बाद में लिखा गया था। इसका पठन-पाठन-श्रवण सभी तरह के पापों का नाश करने वाला और मनोवांक्षित फलों को देने वाली है। धुंधकारी जैसे पापी मनुष्य को मृत्यु के बाद इस ग्रंथ को सुनाने से उसे प्रेत योनि से मुक्ति मिल गई।

साहित्यिक दृष्टि से देखें तो विश्व साहित्य में शायद ही कोई ऐसा ग्रंथ हो जो ऐसे व्यक्ति को सुनाया गया है जो जानता है कि वह मरने वाला है। आम तौर पर अगर किसी व्यक्ति को पता चले की उसकी मृत्यु होने वाली है तो उसमें भय, दीनता, उद्वेग आदि की भावना आएगी। वह शांतचित्त होकर कोई कथा नहीं सुनेगा। परीक्षित न केवल सुन रहे हैं बल्कि रुचि से प्रसन्नतापूर्वक सुन रहे हैं और जहां उन्हें कृष्ण का कार्य भी अनुचित लगता है वहाँ वह इस पर प्रश्न उठाते हैं।

इस ग्रंथ के धार्मिक कलेवर को हटा दिया जाय तो यह वास्तव में जीवन जीने की कला को बताता है। केवल गीता का उपदेश ही नहीं बल्कि कृष्ण का समस्त जीवन भी निष्काम कर्म करते रहने का संदेश देता है। वह अपने आप में सम्पूर्ण हैं। युद्ध, रणनीति, राजनीति, प्रशासन, में तो वे सिद्धहस्त हैं ही नृत्य, गीत, श्रंगार जैसे कला में भी प्रवीण हैं। योगाचार्य है। प्रेम का महत्त्व समझते हैं, तो आदर्श पारिवारिक जीवन भी जीते हैं, दूसरी तरह मोह से बहुत दूर हैं।

अन्य अनेक कथाओं के माध्यम से भी जीवन जीने की कला यह ग्रंथ सिखाता है। जो व्यक्ति जीवन जीना जानता है, उसकी मृत्यु भी सफल होती है, भयदायक नहीं। इसीलिए कथा के अंत में जब शुकदेव जी राजा से पूछते हैं कि क्या अब वे अपना जीवन बचाना चाहते हैं, तो राजा मना कर देते हैं। वे जीवन में ही इतने संतुष्ट हो गए थे कि मृत्यु का उन्हें कोई भय ही नहीं रहा था।

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