बेटी कोई वस्तु तो नहीं, फिर कन्यादान क्यों?

कन्यादान क्या है?

कन्यादान यानि की बेटी का उसके होने वाले पति को दान कर सदा के लिए सौंप देना। प्राचीन काल से यह परंपरा भारतीय संस्कृति में विवाह का एक महत्वपूर्ण अंग रहा है।

इसके विरोध के कारण

वर्तमान में कुछ बुद्धिजीवी लोग इस पर यह कह कर प्रश्न उठाते हैं कि बेटी कोई वस्तु है क्या जो उसका दान कर दिया जाय? एक विज्ञापन ने इस विवाद को और बढ़ावा दिया। इसके विरोध के दो कारण हैं:

कन्यादान के विरोधियों के अनुसार, दान का अर्थ होता है किसी को कोई वस्तु हमेशा के लिए दे देना। दान देने के बाद दाता का उस पर कोई अधिकार नहीं रह जाता है। इसलिए अगर बेटी का दान कर दिया जाय तो इसका अर्थ है बेटी पर से उसके माता-पिता का अधिकार हमेशा के लिए समाप्त हो जाना। इसके बाद उसका पति या पति के परिवार वाले चाहे जैसे रखे इस पर मायके वालों का कोई हस्तक्षेप नहीं हो सकता है। इसलिए यह पितृसत्तात्मक व्यवस्था की निशानी है और इस प्रथा को बंद किया जाना चाहिए?

कुछ लोग एक दूसरे कारण से भी इसका विरोध करते हैं। उनके अनुसार हमारे यहाँ तो स्वयंवर की परंपरा थी कन्यादान की नहीं। कन्यादान मध्यकाल में हिन्दू विवाह विधि में आई विकृति है। इसलिए इसका परित्याग किया जाना चाहिए।

वास्तव में शब्दों और परम्पराओं का अर्थ समय के साथ बदलता रहता है। अगर कोई विचार और परंपरा अप्रासांगिक हो जाए तो उसे बदलने में कोई बुराई नहीं है। परिवर्तन ही तो संसार का नियम है। लेकिन कन्यादान के संदर्भ में कुछ बिन्दुओं पर विचार करना भी प्रासंगिक होगा।

  • 1. कन्यादान शब्द का प्रचालन कब से हुआ?
  • 2. क्या कन्यादान विवाह का अनिवार्य अंग है?
  • 2. दान का क्या अर्थ होता है?
  • 4. दाता और आदाता के संबंध  
  • 3. क्या दान स्थायी होता है?

कन्यादान शब्द का प्रथम प्रयोग

वेद में विभिन्न देवताओं के स्तुति के मंत्र हैं। आरण्यक और उपनिषद मूल रूप से ईश्वर, आत्मा, इत्यादि दार्शनिक मतों पर विचार करते हैं। उनमें प्रसंगवश कहीं-कहीं विवाह की चर्चा है लेकिन विवाह विधि का विस्तृत उल्लेख गार्हस्थ्यसूत्र और मनुस्मृति में ही मिलता है। इनमें विवाह के विधि को पाँच भागों में बांटा गया है, जिसमें से एक कन्यादान भी था। ये दोनों ग्रंथ में लिखी बातें तो परंपरा से आ रही थी लेकिन लिपिबद्ध इन्हें आज से दो हजार वर्षों के बीच ही हुआ।

तो क्या कन्यादान दो हजार वर्षों के भीतर ही आरंभ हुई परंपरा है? नहीं अन्य कुछ संदर्भ इससे अलग प्रमाण देते हैं। वाल्मिकीकृत रामायण के अनुसार धनुष भंग होने के बाद जनक जी ने ‘विधिवत विवाह’ के लिए कहा। यद्यपि उन्होने कन्यादान का शब्द का प्रयोग नहीं किया लेकिन दशरथ जी किसी बात पर कहते हैं कि “लेने वाले से बड़ा देने वाला होता है। इसलिए आप मुझ से बड़े हुए और आपका आदेश मानना मेरा कर्तव्य है।” इसी तरह के कई और संदर्भ है जिससे पता चलता है विधिवत विवाह का एक अंग ‘कन्यादान’ भी था।

विवाह के कितने प्रकार होते हैं और किस विवाह में कन्यादान किया जाता है?

इस संदर्भ में ध्यान देने की बात यह भी है कि सभी विवाह एक ही प्रकार के नहीं थे। इन्हें आठ श्रेणी में रखा गया था, जिनमें से पहले चार को धर्मानुकूल माना गया था लेकिन बाकी चार को यद्यपि अधिक स्वीकृति नहीं थी लेकिन लड़की के हित के लिए इसे भी विवाह मान लिया गया था ताकि वधू को विवाहिता स्त्री के सभी अधिकार मिल सके। मनुस्मृति के अनुसार ये विवाह थे:

ब्रह्म विवाह: इसमें विद्वान और सुशील वर को बुला कर उसका पूजन और सत्कार कर वधू के अभिभावक उसे अपनी पुत्री सौंप देते थे। (आच्छाद्य चार्चयित्वा च श्रुतशीलवते स्वयम्। आहूय दानं कन्याया ब्राह्मो धर्मः प्रकीर्तितः)

दैव विवाह: बड़े यज्ञ में ऋत्विक ब्राह्मण को वस्त्र-आभूषण से शोभित कन्या का दान “दैव विवाह” कहा जाता था। (यज्ञे तु वितते सम्यग् ऋत्विजे कर्म कुर्वते। अलङ्कृत्य सुतादानं दैवं धर्मं प्रचक्षते)

आर्ष विवाह: एक या दो गाय एवं बैल के जोड़े को वर की तरफ से यज्ञ के लिए उपहार में पिता प्राप्त करता था। इसके बाद वह अपनी कन्या का दान उस वर को कर देता था। यह आर्ष विवाह कहलाता था। (एकं गोमिथुनं द्वे वा वरादादाय धर्मतः। कन्याप्रदानं विधिवदार्षो धर्मः स उच्यते ॥२९॥)

प्रजापात्य विवाह: “तुम दोनों साथ धर्माचरण करो” ऐसा कहकर वर-कन्या का पूजन करके जो कन्यादान होता है, उस को प्राजापत्य विवाह कहते थे। (सहौभौ चरतां धर्ममिति वाचाऽनुभाष्य च। कन्याप्रदानमभ्यर्च्य प्राजापत्यो विधिः स्मृतः)

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ये चारों अर्थात ब्रह्म, दैव, आर्ष और प्रजापात्य विवाह धर्म संगत माना जाता था। निम्नलिखित चार विवाह धर्मसंगत नहीं माने गए थे लेकिन फिर भी इन्हें विवाह की मान्यता मिली थी ताकि वधू और उसके संतान के अधिकार बने रहे।

असुर विवाह: वर के माता-पिता को एवं कन्या को यथाशक्ति धन (दहेज) देकर इच्छापूर्वक कन्यादान होता है, उस को असुर विवाह कहते थे। (ज्ञातिभ्यो द्रविणं दत्त्वा कन्यायै चैव शक्तितः। कन्याप्रदानं स्वाच्छन्द्यादासुरो धर्म उच्यते)

गांधर्व विवाह: कन्या और वर अपनी इच्छा से माता-पिता की अनुमति के बिना जो विवाह करते थे उसे गांधर्व विवाह कहते थे। इसे आधुनिक अर्थ में प्रेम विवाह माना जा सकता है। (इच्छयाऽन्योन्यसंयोगः कन्यायाश्च वरस्य च। गान्धर्वः स तु विज्ञेयो मैथुन्यः कामसंभवः)

राक्षस विवाह: बलपूर्वक किसी स्त्री का अपहरण कर विवाह करना राक्षस विवाह कहलाता था। इस अपहरण में लड़की की सहमति भी हो सकती थी। इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण कृष्ण-रुक्मणी विवाह है।

पिशाच विवाह: यह वास्तविक अर्थ में विवाह नहीं बल्कि दुष्कर्म था। इसमें सोई, बेहोश या पागल स्त्री के साथ संबंध बनाया जाता था जिसमें न तो लड़की की और न ही उसके अभिभावक की सहमति होती थी। लेकिन अगर इसे विवाह के रूप में मान्यता नहीं दी जाती तो हो सकता था उस स्त्री से कोई अन्य पुरुष विवाह नहीं करता। इसलिए नीतिकारों ने इसे भी विवाह के रूप में मान्यता दे दिया। इससे उस स्त्री के, और अगर इस संबंध से कोई संतान होता तो उस संतान के, पालन-पोषण और संपत्ति विषयक अधिकार मिल जाते। सभी वर्णों के लिए इस तरह के विवाह का निषेध था। यह सबसे निकृष्ट विवाह माना जाता था।

अब हम फिर अपने टॉपिक यानि कि कन्यादान पर आते हैं। इन आठ में से केवल पहले चार में ही कन्यादान किया जाता था। कुछ लोग तर्क देते हैं कि विवाह के लिए कन्यादान नहीं बल्कि ‘पाणिग्रहण’ शब्द आया है। लेकिन यह भी पूर्ण सच नहीं है। “वाग्दानञ्च वरणं पाणिपीडनम्। सप्तपदीति पंचांगो विवाह: प्रकीतिर्त:।” यानि (1) वाग्दान या सगाई, (2) कन्या का दान, (3) वरण या वर द्वारा स्वीकृति (4) पाणिग्रहण करना और (5) सप्तपदी अर्थात सात वचनों के पालन की प्रतिबद्धता– इन पाँच चरणों में विवाह संस्कार सम्पन्न होता है।

यहाँ यह भी ध्यान देने की बात है कि शास्त्रों में कन्यादान को नहीं बल्कि विवाह को संस्कार की श्रेणी में रखा गया है। दूसरा, विवाह के समय औपचारिक रूप से कन्या का पिता या अभिभावक कन्या का हाथ कुछ उपहार यानि द्रव्य जैसे सोना, चाँदी आदि और मंगल की कोई वस्तु जैसे चावल, दूब आदि के साथ वर के हाथ में रखता था। पर अनौपचारिक रूप से वर द्वारा कन्या का हाथ स्वयं कन्या से या उसके अभिभावक से मांगने के अनेक उदाहरण हैं। यही सांकेतिक उपहार बाद में दहेज बन गया। 

स्वयंवर

कुछ लोग स्वयंवर और विवाह में थोड़े संदेह में आ जाते हैं और दोनों को एक समझ लेते हैं। स्वयंवर स्वयं अपना वर चुनने की प्रथा थी। यह निःशर्त या सशर्त दोनों हो सकता था। वधू को उपस्थित वर में से जो भी पसंद आ जाता था उसे वह बिना किसी शर्त के चुन लेती थी। सशर्त में वधू के अभिभावक कोई शर्त रखते थे जिसे पूरा करने वाले से विवाह तय हो जाता था। इसके लिए ‘वीर्यशुल्का’ शब्द आया है जिसका अर्थ होता है वीर्य यानि पराक्रम ही जिसके लिए शुल्क हो। श्रीराम द्वारा शिव धनुष तोड़ कर सीता से विवाह और श्रीकृष्ण द्वारा सात बैलों को नाथ कर नाग्ञ्जिती से विवाह इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है।

लेकिन ये विवाह तय करने की विधि थीं विवाह की विधि नहीं।     

क्या कन्या दान की ‘वस्तु’ थी?

स्मृति और सूत्र साहित्य में दान पर अधिक ज़ोर दिया जाने लगा। इस समय दान देने के वस्तुओं की सूची भी कई ग्रन्थों में है लेकिन इस सूची में ‘कन्या’ शामिल नहीं है।

‘वस्तु’ को जब दान दिया जाता है तो उस वस्तु से पूछा नहीं जाता है। लेकिन जब कन्यादान की बात आती है तो कन्या के मर्जी के विरुद्ध उसका दान करने का उल्लेख कहीं नहीं है। हो सकता है कन्या को यह भरोसा हो कि उसके पिता या अभिभावक उसका हित ही चाहेंगे, इसलिए वह सहमति दे देती हो।

शास्त्रों में दान को वस्तु तक ही सीमित नहीं रखा गया है। उदाहरण के लिए विद्यादान, वाग्दान, वरदान, सिंदूरदान आदि। निश्चय ही यह दान शब्द मध्यकाल में प्रचालन में आए उर्दू के ‘दान’ से अलग है जिसका अर्थ होता है स्थान जैसे पीकदान, खानदान, शमादान आदि। 

दान का अर्थ

दान का सामान्य अर्थ होता है किसी वस्तु पर से अपना स्वत्व यानि उसे अपना मानने के अधिकार का त्याग। आरंभ में दान हमेशा के लिए दे या कुछ समय के लिए, यह दाता के ऊपर निर्भर था। इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण भूमि के संबंध में मिलता है। पहले राजा यज्ञ या शिक्षण कार्य में लगे ब्राह्मणों को उनके जीवन यापन के लिए भूमि का कोई टुकड़ा दान दे देता था। लेकिन वह उस कार्य के छोड़ देने पर उसे वापस ले सकता था। प्रायः आदाता यानि लेने वाले की संतति भी यही कार्य करती थी। इसलिए भूमि उसके परिवार के पास ही रह जाती थी। बाद में स्थायी रूप से भूमि दान पर ज़ोर दिया जाने लगा। दक्षिण भारत के मंदिरों में लगे शिलापट्टों पर या ताम्रपत्रों पर भूमि दान ‘जब तक सूरज- चाँद रहेगा” तब तक के लिए यानि के हमेशा के लिए दिए जाने का उल्लेख मिलता है। भागवत में एक ही गाय गलती से दो ब्राह्मणों को दे देने की कथा का वर्णन है जिस कारण राजा को शाप मिलता है। दान दी हुई वस्तु पर से दान देने वाले का स्वामित्व हमेशा के लिए हटने पर ज़ोर दिया जाने लगा।

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लेकिन कन्यादान इन सबसे अलग होता था। उत्तर मध्यकाल से पहले यह कहीं वर्णन नहीं है कि कन्यादान के बाद से पिता या परिवार का संबंध कन्या से स्थायी रूप से विच्छेद हो गया और अब वह उसकी कोई सहायता नहीं कर सकता। पुत्री के घर का पानी नहीं पीने जैसा कोई संदर्भ नहीं मिलता है। दक्ष प्रजापति की पुत्री सती कन्यादान के बाद भी अपने पिता के घर गई थी। इसे कोई असामान्य घटना नहीं माना गया। 

सामान्य दान और कन्यादान में अंतर

दान हमेशा निःशुल्क और निःशर्त होता था। अगर वृति के लिए किसी को जमीन या कोई अन्य चीज दी जाती थी तो उसे वृति में गिना जाता था दान में नहीं। लेकिन कन्यादान के समय पिता या अभिभावक वर से सात वचन लेता है। ये सात वचन कन्या वर से मांगती है:

1. तीर्थव्रतोद्यापन यज्ञकर्म मया सहैव प्रियवयं कुर्या:

वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति वाक्यं प्रथमं कुमारी!। (यदि आप कभी तीर्थयात्रा को जाओ तो मुझे भी अपने संग लेकर जाना। कोई व्रत-उपवास अथवा अन्य धर्म कार्य आप करें तो आज की भांति ही मुझे अपने वाम भाग में अवश्य स्थान दें। यदि आप इसे स्वीकार करते हैं तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूं।)

2. पुज्यो यथा स्वौ पितरौ ममापि तथेशभक्तो निजकर्म कुर्या:

वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं द्वितीयम!! (जिस प्रकार आप अपने माता-पिता का सम्मान करते हैं, उसी प्रकार मेरे माता-पिता का भी सम्मान करें तथा कुटुम्ब की मर्यादा के अनुसार धर्मानुष्ठान करते हुए ईश्वर भक्त बने रहें तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूं।)

3. जीवनम अवस्थात्रये पालनां कुर्यात

वामांगंयामितदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं तृतीयं!! (आप मुझे यह वचन दें कि आप जीवन की तीनों अवस्थाओं (युवावस्था, प्रौढ़ावस्था, वृद्धावस्था) में मेरा पालन करते रहेंगे, तो ही मैं आपके वामांग में आने को तैयार हूं।)

4. कुटुम्बसंपालनसर्वकार्य कर्तु प्रतिज्ञां यदि कातं कुर्या:

वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं चतुर्थ:।। (अब तक आप घर-परिवार की चिंता से पूर्णत: मुक्त थे। अब जब कि आप विवाह बंधन में बंधने जा रहे हैं तो भविष्य में परिवार की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति का दा‍यित्व आपके कंधों पर है। यदि आप इस भार को वहन करने की प्रतिज्ञा करें तो ही मैं आपके वामांग में आ सकती हूं।)

5. स्वसद्यकार्ये व्यहारकर्मण्ये व्यये मामापि मन्‍त्रयेथा

वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: पंचमत्र कन्या!! (अपने घर के कार्यों में, लेन-देन अथवा अन्य किसी हेतु खर्च करते समय यदि आप मेरी भी मंत्रणा लिया करें तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूं।)

6. न मेपमानमं सविधे सखीना द्यूतं न वा दुर्व्यसनं भंजश्वेत

वामाम्गमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं च षष्ठम!! (यदि मैं अपनी सखियों अथवा अन्य स्‍त्रियों के बीच बैठी हूं, तब आप वहां सबके सम्मुख किसी भी कारण से मेरा अपमान नहीं करेंगे। यदि आप जुआ अथवा अन्य किसी भी प्रकार के दुर्व्यसन से अपने आपको दूर रखें तो ही मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूं।)

7. परस्त्रियं मातूसमां समीक्ष्य स्नेहं सदा चेन्मयि कान्त कूर्या।

वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: सप्तमंत्र कन्या!! (आप पराई स्त्रियों को माता के समान समझेंगे और पति-पत्नी के आपसी प्रेम के मध्य अन्य किसी को भागीदार न बनाएंगे। यदि आप यह वचन मुझे दें तो ही मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूं।)

स्पष्टतः कन्यादान में यद्यपि दान शब्द आया है लेकिन यह अन्य दानों से भिन्न और सशर्त है। अगर वर इन वचनों में से किसी को भंग करे तो कन्या या पिता को यह अधिकार है कि वह दान के बंधन से मुक्त हो सकता है। निश्चय ही यह व्यवहार में नगण्य रूप से प्रचालन में था, विशेष रूप से उच्च वर्णों में लेकिन सिद्धान्त में यह संभव था।

दूसरा अंतर यह था कि वस्तु के दान में दान लेने वाला उसे किसी अन्य को दान कर सकता था। लेकिन कन्यादान के मामले में यह संभव नहीं था यानि पति अपनी पत्नी किसी और को दान नहीं कर सकता था।

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जब दान लेने वाला यानि कि पति कि मृत्यु हो जाती तब स्त्री के दूसरे पुरुष से विवाह को मान्यता मिली थी। देवर से विवाह सबसे प्रचलित था। देवर द्विवर कर तत्भव रूप है। छोटा भाई बड़े भाई कि विधवा से विवाह कर सकता था लेकिन बड़ा भाई छोटे भाई की विधवा से विवाह नहीं कर सकता था। यद्यपि सूत्र काल से उच्च वर्णों में विधवा विवाह अमान्य कर दिया गया। फिर भी इससे यह तो सिद्ध होता ही है कि वस्तु के दान और कन्या के दान में मौलिक अंतर था।    

कन्यादान, kanyadaan

कन्या की इच्छा को मान्यता

विवाह के लिए वधू की इच्छा का भी सम्मान किया जाता था। स्वयंवर, जो कि क्षत्रियों में अधिक प्रचलित था, तो इसका सबसे बड़ा प्रमाण है ही पर अन्य अनेक ऐसे उल्लेख मिलते हैं जिससे यह सिद्ध होता है कि कन्या की इच्छा के बिना उसका दान नहीं होता था।

इस संदर्भ में राजा रथवीति की कथा, जिसका उल्लेख बृहद्देवता (5-50-80) नामक ग्रंथ में है, महत्वपूर्ण है। श्यावाश्व ऋषि ने राजा से उनकी कन्या से विवाह का प्रस्ताव किया। राजा ने पहले अपनी रानी शशीयसी से सलाह की। रानी ने पुत्री से पूछने के बाद कहा कि श्यावाश्व को पहले ऋषित्व प्राप्त करना चाहिए। जब श्यावाश्व ने यह पद और प्रतिष्ठा प्राप्त कर ली, तभी रथवीती ने उन्हें अपनी बेटी का पाणिग्रण करने की इजाजत दी। (बृहद्देवता 5-50-80) 

दानग्रहण के लिए पात्रता

यद्यपि ‘दान’ देने पर ज़ोर दिया जाता था लेकिन इस समय दान के लिए पात्रता पर भी विचार किया जाता था। ग्रंथकारों ने दान योग्य व्यक्ति हो ही देने पर ज़ोर दिया है। ‘दान’ सुयोग्य ब्राह्मण को ही देने की बात कही गई है। लेकिन विवाह तो सभी वर्णों के होते थे। इससे यह भी संकेत मिलता है कि ‘कन्यादान’ शब्द में आए ‘दान’ का अर्थ साधारण वस्तु से भिन्न था।

कन्यादान का मंत्र

कन्यादान करते समय कन्यादान करने वाला पिता या अभिभावजो जो मंत्र पढ़ता है, वह जानना भी रोचक है। यह मंत्र पारस्करगृह्यसूत्रम के हरिहर भाष्य में दिया गया है। इस सूत्र में कन्यादान के लिए पिता द्वारा मंत्र पाठ के साथ संकल्प लेने की व्यवस्था दी गई है। यह मंत्र इस प्रकार है:

“अद्येति………नामाहं………नाम्नीम् इमां कन्यां/भगिनीं सुस्नातां यथाशक्ति अलंकृतां, गन्धादि – अचिर्तां, वस्रयुगच्छन्नां, प्रजापति दैवत्यां, शतगुणीकृत, ज्योतिष्टोम-अतिरात्र-शतफल-प्राप्तिकामोऽहं ……… नाम्ने, विष्णुरूपिणे वराय, भरण-पोषण-आच्छादन-पालनादीनां, स्वकीय उत्तरदायित्व-भारम्, अखिलं अद्य तव पत्नीत्वेन, तुभ्यं अहं सम्प्रददे।” अर्थात ‘अमुक गोत्र में उत्पन्न….. अमुक नाम वाली, यथाशक्ति वस्त्रों तथा आभूषणों से सुसज्जित कन्या को, पुराणों में बताए गए कन्यादान की फल की कामना से मैं पिता तुम्हें पत्नी के रूप में अपनाने के लिए वर के लिए संप्रदान करता हूं।’

वर उन्हें स्वीकार करते हुए कहता है- ॐ स्वस्ति।

वर द्वारा इसे स्वीकार करने को ही पाणिग्रहण कहते हैं। इसलिए पाणिग्रहण कन्यादान के बाद होता है। पाणिग्रहण के बाद ही वर वधू एक दूसरे का हाथ पकड़ते हैं।

पिता या अभिभावक के लिए निर्देश

सूत्र और स्मृति साहित्य में कन्यादान की विस्तृत चर्चा है पर साथ ही पिता के लिए कुछ निर्देश भी है। मनुस्मृति के अनुसार “विवाह के लिए इच्छुक पिता अपनी कन्या अति उत्कृष्ट, शुभ गुण, कर्म और स्वभाव वाले, कन्या के सदृश, रूप और लावण्य आदि गुणों से युक्त वर को ही दे।” (मनुस्मृति : 9-88)। श्लोक में कन्या देने का अर्थ है वर को पाणिग्रहण करने की अनुमति देना।

मनुस्मृति का ही एक और प्रसिद्ध श्लोक है

पिता रक्षति कौमारे, भर्ता रक्षति यौवने।
रक्षंति स्थविरे पुत्रा:, न स्त्रीस्वातंत्र्यमर्हति।। (मनुस्मृति : 9-3)

अर्थात कन्या जब कुमारी रहती है तो पिता उसका लालन-पालन और उसकी रक्षा करता है, युवा अवस्था में पति और बुढ़ापे में पुत्र। स्त्री अरक्षित नहीं रह सकती। यहाँ स्त्री की रक्षा का दायित्व पिता, पति और पुत्र पर देने का आशय उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करने से है, उसकी स्वतंत्रता को सीमित करने से नहीं।


निष्कर्ष

“कन्यादान” शब्द में दान शब्द भले ही आया है पर यहाँ दान का आशय भिन्न है। दान देने का अधिकार पिता या किसी वरिष्ठ अभिभावक को दिया गया है। इसका सामान्य आशय यही है कि पुत्री के प्रति स्नेह और जीवन के अपने वास्तविक अनुभव के आधार पर पिता उसके लिए उपयुक्त वर की पहचान करने में अधिक सक्षम होता है। जब उसे कोई वर उपयुक्त लगता है तो सात शर्तों के मनाने के आधार पर वह उसे अपनी पुत्री को प्रदान करता है ताकि उसके पुत्री का भविष्य सुखमय हो सके। साथ ही वह इसके लिए पुत्री के विचारों का भी सम्मान करता है। फिर भी अगर पुत्री गांधर्व या राक्षस तरीके से विवाह कर ले तो उस स्थिति में कन्यादान आवश्यक नहीं होता है। पिता द्वारा दान नहीं देने पर भी उसे वैध विवाह माना जाता है।

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