raja dashrath ka antim sanskar

राजा दशरथ का अंतिम संस्कार किसने किया?-भाग 21  

राजा दशरथ की मृत्यु के समय अयोध्या की स्थिति

राम-लक्ष्मण-सीता के वन जाने के छठे दिन उनके पिता राजा दशरथ की मृत्यु हो गई। उस समय भरत-शत्रुघ्न भरत के ननिहाल केकेय देश में थे। इस तरह चारों राजकुमारों में से कोई भी पिता का अंतिम संस्कार करने और राजकीय दायित्वों को संभालने के लिए राजधानी में नहीं था। अतः मंत्रियों और उच्चाधिकारियों की बैठक में लिए गए निर्णय के अनुसार राजा के शव को सुरक्षित रखने के लिए नाव में तेल भरवा कर उसमे रख दिया गया। पाँच दूत को बुला कर कुलगुरु वसिष्ठ ने उन्हे यथाशीघ्र कैकेयी देश जाने के लिए कहा गया। (इन पाँचों के नाम थे– सिद्धार्थ, विजय, जयंत, अशोक और नन्दन)

भरत को बुलाने के लिए दूत भेजना

इन पाँचों को यह आदेश दिया गया कि वे राजा के मृत्यु सूचना भरत या किसी अन्य व्यक्ति को नहीं दे। कैकेय नरेश या भरत को किसी अनहोनी की आशंका न हो इसलिए दूतों के साथ बहुत से उपहार भी भेजे गए।

सूचना गुप्त रखने का एक कारण तो यह था कि इतने बड़े आघात पर पता नहीं भरत की प्रतिक्रिया कैसी होती। दूसरा, राजनीतिक और सुरक्षा की दृष्टि से राजा की मृत्यु की सूचना तब तक सार्वजनिक नहीं की जाती है जब तक नया राजा न बन जाय। क्योंकि इस स्थिति का लाभ उठा कर कोई शत्रु आक्रमण कर सकता है।                     

उस दिन यह सब करते-करते रात हो गई थी। इसलिए अगली सुबह ये पाँचों दूत तीव्रगामी घोड़ो पर कैकेय देश के लिए निकले।

जिस दिन ये पाँचों दूत कैकेय देश की राजधानी पहुँचे। उस रात भरत ने बुरा स्वप्न देखा। उन्हे अपशकुन भी हो रहे थे। स्वप्न का आशय उनके किसी अतिप्रिय व्यक्ति की मृत्यु हो सकता था। इसलिए वे अपने कुल की कुशलता के लिए चिंतित हो गए थे। उनका मन किसी कार्य में नहीं लग रहा था।

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तब तक अयोध्या से दूत आ गए। दूत भरत के नाना और मामा, कैकेय के राजा अश्वपति और युवराज युधाजित, से मिले। परस्पर कुशलक्षेम का आदान-प्रदान किया और उन्हे उपहार दिया।

तत्पश्चात दूतों ने भरत से मिलकर किसी अति आवश्यक कार्य के लिए गुरु द्वारा उन्हे बुलाए जाने का आदेश सुनाया। भरत और शत्रुघ्न सबसे मिलकर और उनकी आज्ञा लेकर जल्दी अयोध्या के लिए निकल आए। आते समय उनके नाना और मामा ने बहुत से हाथी, घोड़े और गाड़ियों ने लाद कर अनेक उपहार दिया। उनकी सुरक्षा के लिए सेना और अन्य कर्मचारी भी दिए।

स्वप्न से, और दूत जिस तरह जाने की जल्दी मचा रहे थे, उससे भरत-शत्रुघ्न को किसी अनहोनी की आशंका हो गई। दूत आते समय घोड़े से आए थे। इसलिए उन्होने छोटा रास्ता लिया था और जल्दी पहुँच गए थे। लेकिन इस समय उनके साथ बहुत सारे लोग, पशु और गाड़ियाँ थी। इसलिए काफिले को लंबा रास्ता लेना पड़ा।

भरत का अयोध्या पहुँचना

भरत को अयोध्या पहुँचने की जल्दी थी। सेना के कारण समय लग रहा था। इसलिए आधे से अधिक रास्ते आने के बाद उन्होने सेना को पीछे से आने के लिए कहा और स्वयं रथ से आगे निकल गए। कैकेय से चलने के आठवें दिन वे अयोध्यापुरी पहुँच गए।

अयोध्या में हर तरफ शोक और उदासी देख कर भरत और घबड़ा गए। उन्होने अपनी आशंका अपने सारथी से कहा। वे सीधे अपने पिता से मिलने उनके महल चले गए। पर किसी की हिम्मत उन्हे सच बताने की नहीं हुई। वहाँ पिता नहीं मिले तो वे अपनी माँ कैकेयी के महल में चले गए। क्योंकि सबसे प्रिय रानी होने के कारण राजा प्रायः वहीं होते थे।

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कैकेयी सामान्य रूप से उनसे मिली और अपने मायके का हालचाल पूछा। वहाँ का हालचाल बताने के बाद भरत ने अपने कुल का हालचाल और अयोध्या के इस उदासी का कारण पूछा। इस पर रानी ने उन्हे पिता की मृत्यु के बारे में बताया। यह सुनते ही भरत-शत्रुघ्न दोनों भाई रोने लगे।

चूँकि पिता के बाद बड़ा भाई ही पिता की तरह होता है। इसलिए भरत अपने भाई राम-लक्ष्मण के महल में जाने के लिए उद्धत हुए। लेकिन जाने से पहले उन्होने पिता के मरने का कारण पूछ लिया।

अपने दोनों भाई और भाभी के निर्वासन का सदमा उनके लिए पिता की मृत्यु से भी बढ़ कर था। वे समझ नहीं पाए कि राम जैसा व्यक्ति ऐसा कोई अपराध कैसे कर सकता है, जिससे उन्हे निर्वासन की सजा मिले। इस पर कैकेयी ने अपनी सारी करतूत उन्हे सुना दिया।

सारा वृतांत भरत के लिए बहुत बड़ा सदमा था। इन सारी फसाद की जड़ वे स्वयं थे। उन्होने अनेक प्रकार से कैकेयी को धिक्कारा और उनके प्रति रोष प्रकट किया।

भरत-शत्रुघ्न दोनों भाई कैकेयी के महल से निकल कर रोते हुए कौशल्या के महल की तरफ बढ़े। उनकी आवाज सुनकर कौशल्या भी उधर ही आ रही थी। इसलिए दोनों की मुलाक़ात रास्ते में ही हो गई। भरत ने अनेक प्रकार से शपथ ले कर कौशल्या को यह विश्वास दिलाया कि इस कुचक्र के लिए उनकी सहमति नहीं थी।

भरत बार-बार कहने लगे कि उन्हे इस बात की कोई जानकारी नहीं थी। उन्हे राज्य का कोई लोभ भी नहीं था। इस प्रकार बोलते-बोलते वे जमीन पर गिर कर रोने लगे। कौशल्या ने उन्हे उठाया और सांत्वना दी। वह रात कौशल्या के भवन में रोते और शोक करते हुए ही बीत गया।

दशरथ का अंतिम संस्कार

अगले दिन राजा दशरथ का शव तेल से निकाला गया और विधिवत रूप से उनका अंतिम संस्कार हुआ। तेरहवें दिन तक भरत ने पिता के निमित्त समस्त कार्य किया। अस्थि संचय के लिए जब दोनों भाई पिता की चिता पर गए तब वे फुट-फुट कर रोने लगे। वसिष्ठ और सुमंत्र ने उन्हे समझाबुझा कर किसी तरह शांत किया।

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शत्रुघ्न द्वारा मंथरा की पिटाई और भरत का उसे बचाना

तेरहवीं के बाद जब भरत-शत्रुघ्न घर लौटे, शत्रुघ्न को अपने पिता पर रोष आ गया। वे भरत से बोल ही रहे थे कि तब तक दरवाजे पर मंथरा दिखी। उसे देखते ही शत्रुघ्न का खून खौल उठा। उन्होने उसे जमीन पर पटक कर गिरा दिया और घसीटने लगे। उनका क्रोध देख कर दासियों और कैकेयी की हिम्मत उसे बचाने की नहीं हुई। मंथरा बेहोश हो गई। यह देख कर भरत ने शत्रुघ्न को स्त्री हत्या धर्म विरुद्ध बता कर मंथरा को उनसे बचाया।

भरत का राजा बनना अस्वीकार करना

तेरहवें दिन राजा की अंतिम क्रिया सम्पन्न हो जाने के बाद सभा बैठी। सभा में भरत को राजा बनाने का प्रस्ताव हुआ। इस प्रस्ताव को सबकी सहमति मिली केवल भरत को छोड़ कर। सभासदों द्वारा बहुत समझाने पर भी वे राजा बनने के लिए तैयार नहीं हुए।

भरत द्वारा राम को बुलाने के वन में जाने और उनका राज्याभिषेक का प्रस्ताव

भरत ने राम के अभिषेक के लिए रखी सामग्रियों की परिक्रमा कर उन्हे प्रणाम किया। उन्होने कहा चूँकि धर्म के अनुसार ज्येष्ठ पुत्र ही राजा बनाना चाहिए, इसलिए वे वन में जाकर राम को बुलाएंगे और उनका ही अभिषेक होगा। पिता का वचन रखने के लिए वे राम के बदले वन में रह जाएँगे।

विचार-विमर्श के बाद अंततः तय हुआ कि अभिषेक के लिए रखी सारी सामग्री ले कर सब वन में चलेंगे। वन में ही राम का अभिषेक कर उन्हे वापस लौटा लाएँगे।

यह खबर जल्दी ही सारे नगर में फैल गई। सभी लोग राम के दर्शन और उनके पुनः अयोध्या आगमन के लिए मनाने के लिए वन में जाने के लिए तैयार हो गए। सभी उत्साह से भर गए। लोग राम और भरत के प्रेम और धर्मपरायणता की प्रशंसा करने लगे।

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