क्या राम स्त्री विरोधी थे?-भाग 66

सीता की अग्नि परीक्षा और बाद में किसी और के कहने मात्र से गर्भवती अवस्था में उनका निर्वासन– ये दो ऐसी घटनाएँ हैं जिसके कारण कई लोग राम को स्त्री-विरोधी मानते हैं। आधुनिक स्त्रीवादी लेखक तो इस के आधार पर सनातन धर्म को ही कठघरे में खड़े करते हैं। लेकिन अगर कोई वाल्मीकि कृत रामायण, जो कि राम के विषय में मूल ग्रंथ है, को पूरा पढ़े तो यह दृष्टिकोण बदल जाएगा। इस संबंध में कुछ तथ्य ध्यान में रखने वाला है:

1. जब से सीता हरण हुआ, राम ने हमेशा उनकी कुशलता के लिए ही चिंता की। आश्रम में बिखरे फलों को देखने के बाद, जटायु-रावण युद्ध स्थल में उनके बालों के फूलों को बिखरे देखने के बाद, रिष्यमुक पर्वत पर उनके आँचल के टुकड़े को देखने के बाद या प्रवर्षण पर्वत पर बरसात के मौसम बीतने की प्रतीक्षा करते समय, जब भी राम सीता के लिए दुखी होते हैं, तब यही कहते हैं, पता नहीं सीता किस हाल में होगी? वह इतनी भीरु थी, उस पर क्या बीत रही होगी? उसके बिना मैं घर लौटूंगा तो उसके पिता को क्या जवाब दूंगा? कहीं भी हो, अगर जीवित हो तो मैं उसे ले आऊँगा, इत्यादि। हनुमान जब लंका में बंदिनी सीता के दुखों का वर्णन करते हैं तो राम जल्दी-से-जल्दी जाकर उन्हें इससे मुक्ति दिलाना चाहते हैं।

2. युद्ध जीतने के बाद वे हर्ष के साथ हनुमान को सीता के पास यह सूचना देने के लिए भेजते हैं। पूरे प्रसंग में कहीं भी यह लेशमात्र भी आभास नहीं होता है, कि उन्हें सीता से वितृष्णा हो गई हो कि वह किसी पर-पुरुष के पास है।

3. लेकिन जैसे ही सीता उनके पास लायी जाती है, अचानक वे उन्हें कटु वचन कहते हैं। जिसे सुन कर सीता अग्नि परीक्षा देती है, जिसके राम भी मौन सहमति देते हैं।

4. तभी सारे देवता आकाश में देवता प्रकट होते हैं। वे सीता की पवित्रता को सत्यापित करते हैं। इतना ही नहीं वे राम को विष्णु होने की याद भी दिलाते हैं जबकि दशरथ के यज्ञ के समय यही देवताओं ने विष्णु से अवतार लेने की प्रार्थना की थी। ऋषि शरभंग के आश्रम में इन्द्र और राम आमने-सामने आए थे, लेकिन इन्द्र ने रावण वध तक उनसे बात नहीं करने की बात मुनि से कहा था।

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5. ठीक इसी समय अग्नि देव सीता को लेकर आ जाते हैं और उसके पवित्रता को सत्यापित करते हुए राम को सौंप देते हैं। इतना ही नहीं आकाश में दशरथ भी आ जाते हैं। वे सीता से अपनी परीक्षा की बात सोच कर राम के प्रति कठोर भाव नहीं रखने के लिए कहते हैं।

6. यहाँ यह द्रष्टव्य है कि जब राम ने एक दिन पहले ही देवताओं का चीर प्रतीक्षित कार्य यानि रावण वध किया था, तब भी इतने देवता और दशरथ जी नहीं आए थे। इन्द्र भी अभी आए और युद्ध में मृत वानर और रीछों को जीवित किया, एक दिन पहले नहीं।

7. इसके बाद राम कहते हैं कि उन्हें तो सीता पर पूरा भरोसा था, उन्होंने तो सीता की बदनामी रोकने के लिए यह किया था। इसके बाद वे सीता को स्वीकार कर लेते हैं। फिर सब कुछ ऐसे सामान्य हो जाता है जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो।

8. यानि इस घटना के बाद फिर वही पुराने वाले राम हो जाते हैं। केवल यही छह श्लोक ऐसे हैं जिनमें एक अलग राम और नाटकीय दृश्य दिखता है। कहानी में यह घुमाव (twist) इतना तीव्र और अचानक हैं कि पाठक को लगता है “अरे अचानक यह क्या हुआ!”    

8. अग्नि परीक्षा से तुरंत पहले जब सीता राम के पास लायी जा रही थी, तब राम ने स्त्रियों के लिए पर्दा का बहुत समर्थन नहीं किया।

(2). अनेक शोधकर्ताओं और भाषाविदों ने उत्तरकाण्ड और सीता के अग्नि परीक्षा जैसे प्रसंगों को प्रमाणों के आधार पर रामायण का मूल भाग नहीं बल्कि बाद में जोड़ा गया माना है। अग्नि परीक्षा प्रसंग की तरह सम्पूर्ण उत्तर कांड या कम-से-कम इसका अधिकांश भाग भाषा, शैली और विचार की दृष्टि से वाल्मीकि की रचना प्रतीत नहीं होती है। युद्ध कांड के अंत पर लगता है पुस्तक यहाँ समाप्त हो गई। यहाँ तक कि यहीं रामायण सुनने का फल भी लिखा है। लेकिन फिर अचानक उन्हीं बातों को फिर से विस्तार से बताते हुए कहानी शुरू हो जाती है जिनका वर्णन युद्धकाण्ड के अंत में संक्षेप में हुआ था। इसलिए उत्तरकाण्ड की सत्यता पर संदेह करने के पर्याप्त कारण हैं।  

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(3). सुग्रीव की पत्नी रुमा को बाली ने अपनी पत्नी बना कर रख लिया था। इसी कारण से राम ने बाली को छलपूर्वक मारने को न्यायसंगत बताया। इस पूरे प्रकरण में कहीं भी उनका यह विचार नहीं आया कि जो स्त्री किसी और पुरुष के पत्नी की तरह रही हो, उसे सुग्रीव फिर अपनी पत्नी कैसे स्वीकार करें। राम ने तारा और रुमा दोनों के प्रति सम्मान प्रदर्शित किया। इससे बहुत कम “अपराध” के लिए राम अपनी पत्नी को कैसे अपमानित कर सकते थे? 

(4). अहल्या एक दूसरी उदाहरण थी। उसने अपने पति से छल किया था। लेकिन राम ने उसके पैर छूए थे। यानि राम की नजर में पतिव्रत धर्म से च्युत होना इतना बड़ा अपराध नहीं था। उन्होंने अहल्या की तपस्या के आगे कुछ भी नहीं देखा।

(5). केकैयी दशरथ के साथ युद्ध में गई थी। स्त्री को युद्ध में भेजने का साहस आज भी कई देश नहीं कर पाते। इसके पीछे डर यह होता है, कि “अगर वह युद्धबंदी बना ली गई तो? लेकिन अयोध्यावासी और रघुवंशी उस समय इतना हिम्मत रखते थे। यही अयोध्यावासी बलपूर्वक बंदिनी बनाई गई सीता को केवल इस कारण कलंकित करते, यह विश्वसनीय नहीं है।

(6). कौशल्या को अपने व्यक्तिगत खर्च के लिए 1000 गाँव मिले हुए थे। यह भी सिद्ध करता है कि रघुकुल में स्त्रियों का सम्मान होता था।  

(7). राम तड़का, शूर्पनखा आदि जैसी राक्षसियों को भी इस कारण मारना नहीं चाहते थे कि वे स्त्री थीं।

(8). वे अपनी माता ही नहीं बल्कि पिता की सभी पत्नियों को माता के समान ही आदर देते थे। पूरे रामायण में कहीं भी यह ऐसा कोई वर्णन नहीं है कि राम ने किसी स्त्री को सम्मान नहीं दिया हो।

(9). राम साहस और अद्भुत युद्ध कौशल के साथ-साथ वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी रखते थे। अपने दिव्य अस्त्रों को गुरु के घर में रखना, विश्वामित्र से दिव्य अस्त्र-शस्त्र पाना, खर-दूषण से युद्ध के पहले सेना का निरीक्षण और रणनीति, लंका पर चढ़ाई से पहले ऊँचे पर्वत पर चढ़ कर नगर की बनावट का रणनीतिक निरीक्षण करना आदि साबित करता है कि वे अपने कार्यों के प्रति हमेशा सावधान रहते थे।

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(10). उन्हें स्वाध्याय का भी शौक था। शिक्षा के लिए गुरु आश्रम जाने से पहले स्वाध्याय द्वारा ही बहुत से ज्ञान अर्जन का उल्लेख है। एक ऐसा व्यक्ति ऐसा कैसे मान सकता था कि “पतिव्रता स्त्री अग्नि-रोधी  हो जाती है” या पर पुरुष द्वारा बंदिनी बनाए जाने मात्र से ‘अपवित्र’ हो जाती है।

(11). यह हो सकता है कि बाद के दिनों में जब स्त्रियों की स्थिति में गिरावट आई। तब उन्हें डरा कर नियंत्रण में रखने के लिए अग्नि, जल आदि से परीक्षा की बात हुई हो। (साक्षी देने के लिए इस तरह के परीक्षा के कुछ उल्लेख मध्यकाल में हैं।) इसी समय अपनी बातों को अधिक प्रामाणिक बनाने के लिए सीता के अग्नि परीक्षा की बात गढ़ ली गई हो।

(12). “अग्नि-परीक्षा” शब्द भी बड़ा भ्रामक है। परीक्षा शब्द तब प्रयुक्त किया जा सकता था, जब राम ने सीता से स्वयं अग्नि में प्रवेश कर अपनी पवित्रता सिद्ध करने के लिए कहा होता। लेकिन उन्होंने केवल सीता का परित्याग किया। सीता स्वयं “अपना कलंकित जीवन समाप्त करने” के लिए चिता में प्रवेश कर गई। राम सहित वहाँ उपस्थित किसी भी व्यक्ति ने उन्हें ऐसा करने से रोका नहीं। लेकिन इस तरह राम पर “अग्नि परीक्षा लेने” का आरोप नहीं लगाया जा सकता है। ज्यादा-से-ज्यादा यही कहा जा सकता है कि उन्होंने सीता को आत्महत्या करने से रोकने का प्रयास नहीं किया।

(13). अगर उत्तर कांड को सत्य भी मान लें, तो राम ने सीता के परित्याग के बाद भी दूसरा विवाह नहीं किया और महल में रहते हुए भी व्यक्तिगत जीवन में संन्यासी की तरह ही रहते रहे। इसलिए ब्रह्मा जी ने उन्हें राजर्षि कहा था।       

 (14). सम्पूर्ण रामायण को भूल कर केवल युद्ध कांड के छह श्लोक और उत्तरकाण्ड, जिसकी सत्यता संदेहास्पद है, के आधार पर राम को स्त्री विरोधी मानना तर्कसंगत नहीं लगता है।

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