kya bhagwan ram mans khate the

क्या भगवान राम मांस खाते थे?

‘क्या भगवान राम मांस खाते थे?’ एक सज्जन ने मुझ से यह सवाल पूछा। कुछ और लोग भी ऐसा सोचते हैं। कुछ लोग यह भी तर्क देते हैं कि वे क्षत्रिय राजा थे। क्षत्रियों के लिए मांस भक्षण निषिद्ध नहीं था। केवल जितने दिन वे वन में रहे उतने दिन नहीं खाया क्योंकि ‘तापस वेश विशेष उदासी, चौदह बरस राम वनवासी’ का वचन था। अर्थात इतने दिनों तक उन्हें तपस्वी की तरह रहना था। दूसरी तरफ कुछ लोग ऐसे विषय पर बात करने को भी पाप मानते हैं क्योंकि वैष्णवों के लिए मांस तो क्या प्याज-लहसुन खाना भी वर्जित है। ऐसे में राम स्वयं भगवान विष्णु का अवतार होते हुए भी मांस कैसे खा सकते थे?

पर मेरे विचार से यह सवाल ही शरारतपूर्ण और अप्रासंगिक है। भगवान राम को मानने वाले तीन वर्गों के लोग हैं।

पहला वर्ग उन लोगों का है जो मानते हैं कि वे निरंकार परम ब्रह्म परमेश्वर के साकार अवतारी रूप थे। वह सर्व शक्तिमान होने के कारण हमारे सारे दुख और पाप दूर कर सकते हैं। इसलिए वे तरह-तरह से उन्हें खुश करने का प्रयास करते हैं। विभिन्न तरीकों के पूजा-पाठ, अनुष्ठान, चढ़ावा, तीर्थयात्रा, पवित्र नदियों में स्नान इत्यादि अनेक उपाय उन्हें खुश करने के लिए होते हैं। ये बहुत आस्तिक लोग होते हैं। पर माफ कीजिएगा, उन्हें भगवान की नहीं बल्कि एक क्लर्क या स्टाफ की  जरूरत होती है जो उनके कहे अनुसार थोड़े-बहुत कुछ लेकर उन्हें मनोवांक्षित वस्तु दे सके जिसमें भौतिक इच्छाओं के अलावा मुक्ति की इच्छा भी शामिल है।

पर ऐसे लोग भटकते रह जाते हैं। अगर राम से काम नहीं बना तो श्याम, हनुमान, दुर्गा, साई बाबा, ईसा मसीह इत्यादि अनेक ‘विकल्प’ उनके पास होते हैं। जिस भगवान के पास जाने से उनका काम बनता है, वे वहीं जाएंगे।

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दूसरा वर्ग ऐसे ‘बुद्धिजीवियों’ का है जिनके अनुसार राम एक ऐतिहासिक व्यक्ति थे जिन्होने बहुत अच्छे-अच्छे कार्य किए और उनकी जनता उनसे बहुत स्नेह करती थी। मेरे विचार से अगर ऐसा माने तो ये राम भी हमारे लिए अप्रासांगिक हैं। क्योंकि भले ही वे कितने भी अच्छे रहे हों, लेकिन अब वे इस नश्वर शरीर के साथ हमारे बीच नहीं हैं। उनकी कोई उपयोगिता नहीं है अब हमारे लिए। वे क्या खाते थे, क्या पहनते थे, कैसे दिखते थे, ये सब बातें अनुपयोगी जिज्ञासा के सिवा कुछ भी नहीं है।

तीसरा वर्ग मानता है कि उन्होने मानव जीवन के जो आदर्श स्थापित किए हैं, वे सभी समय, सभी क्षेत्र और सभी लोगों के लिए हैं।

अगर इस दृष्टि से देखें तो वे आज भी प्रासांगिक हैं और हमेशा रहेंगे। इस से कोई अंतर नहीं पड़ता कि वे अवतारी व्यक्ति थे, ऐतिहासिक व्यक्ति थे या साहित्यिक फ़िक्शन।     

अन्य धर्मों की तरह भगवान राम धरती पर किसी नए धर्म का प्रवर्तन करने नहीं बल्कि जीवन जीने का आदर्श सिखाने आए थे। ये आदर्श किसी समय, जाति, क्षेत्र, या वर्ण के लिए नहीं बल्कि मनुष्य मात्र के लिए कालातीत रूप से उपयोगी हैं।   

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इस दृष्टि से वे मांस खाते थे या नहीं यह आप्रासंगिक है। लेकिन भिन्न सामाजिक व्यवस्था से आने वाले लोगों के प्रति उनका व्यवहार आज भी प्रासंगिक है। उनका परम मित्र और गुरुकुल का सहपाठी निषाद राज था। वह पशु-पक्षियों का शिकार कर जीवनयापन करने वाले वनवासी समुदाय से आता था। राम ने उसे परम मित्र माना और भाई के समान गले से लगाया। उन्होने उनसे यह नहीं कहा कि भाई बाकी सब तो ठीक है, तुम मांस खाना छोड़ दो, तभी हमारी दोस्ती हो पाएगी। मातंग ऋषि के आश्रम में आने से पहले शबरी शबर भील जनजाति की परंपरा के अनुसार मांस खाती थी। लेकिन राम ने इसके लिए उनसे भी प्रायश्चित करने के लिए नहीं कहा। जटायु तो मृतक जीवों का मांस भक्षण करने वाले गिद्ध ही थे। लेकिन राम ने उन्हे पिता तुल्य माना। विभीषण उस राक्षस समुदाय से थे जो आदमी का मांस भी खाते थे। रावण सीता को एक साल का समय देते हुए कहता है अगर एक साल के अंदर वह रावण की बात नहीं मानती तो साल बीतने के अगले दिन उसके रसोइये कलेवा में सीता का मांस पका देंगे। दूसरी तरफ फल खाने वाले वानरों से भी उनकी मित्रता थी। 

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स्पष्टतः राम ने मित्रता में खानपान का कोई महत्त्व नहीं माना। ये सभी राम के परम भक्त थे। तुलसी के राम कहते हैं “मानहु एक प्रेम कर नाता।” तुलसी स्वयं कहते हैं “रामही केवल प्रेम पियारा, जान लेहु जो जाननिहारा।” तो क्या इसका अर्थ यह लगाया जाय कि जो कोई राम का मित्र या भक्त हो वह कुछ भी कर ले तो राम उसे क्षमा कर देंगे?

नहीं। राम का कोई सच्चा भक्त जानबूझ कर तो कोई ऐसी गलती करेगा ही नहीं, अगर कर ले तो उसे कर्मफल के सिद्धान्त के अनुसार दंड मिलेगा। स्वयं उनके पिता राजा दशरथ ने युवावस्था में भूल से श्रवण कुमार की हत्या कर दी थी। पुत्र शोक में उनके माता-पिता ने भी प्राण त्याग दिया था। इस पाप के परिणाम से भगवान के पिता होते हुए भी राजा दशरथ नहीं बच सके थे।

राम ने अपने मित्र सुग्रीव के भाई बाली का वध पेड़ के पीछे से छुप कर किया। बाली उनसे पूछता है “मैं वैरी सुग्रीव पियारा, कारण कवन नाथ मोही मारा।” इतना ही नहीं वह यह भी कहता है “धर्म हेतु अवतरउ गोसाईं, मारेऊ मोही व्याध की नाईं।” अर्थात आपने धर्म की रक्षा करने के लिए अवतार लिया है, फिर व्याध की तरह छुप कर धर्म विरुद्ध तरीके से मुझे क्यों मारा? जबाव में राम यह नहीं कहते कि तुम मेरे मित्र के शत्रु हो इसलिए मारा, बल्कि उसे उसके कर्मों की याद दिलाते हैं “अनुज वधू, भगिनी, सुत नारी, सुनू सठ कन्या सम ए चारी। इनहि कुदृष्टि विलोकही जोई, ताही वधे कछु पाप न होई।” अर्थात राम ने उसे उसके अपने छोटे भाई की पत्नी पर कुदृष्टि रखने के कारण मारा था।

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बाली वध के बाद वे सुग्रीव से कहते हैं “जाओ अपने कुल की रीति के अनुसार भाई का अंतिम क्रिया सम्पन्न करो।” रावण वध के बाद ऐसा ही वह विभीषण से कहते हैं।

स्पष्टतः राम व्यक्ति के कार्यों और विचारों को महत्त्व देते हैं, उनके पहनावे या खानपान को नहीं। वह संस्कृतियों की विविधता को मान देते हैं। यद्यपि खानपान का महत्त्व है लेकिन वह अलग संदर्भ में है। प्राणी मात्र के प्रति दया को मनुष्य का गुण और निर्दोष प्राणी की हत्या को उचित नहीं माना गया है। किन्तु किसी समुदाय में अगर किसी विशेष आवश्यकतावश यह प्रचलित हो तो केवल इस आधार पर उस समुदाय को त्याज्य नहीं माना गया है।

इसलिए राम स्वयं मांस खाते थे या नहीं यह महत्त्वपूर्ण नहीं है बल्कि विभिन्न खानपान की आदतों वाले समुदायों को कैसे समान भाव से गले लगाया, यह मत्वपूर्ण है। विविधता को कैसे सहज भाव से अपनाया यह महत्त्वपूर्ण है।            

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