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क्या डाकू रत्नाकर ही ऋषि वाल्मीकि बना?- भाग 2  

उल्टा नाम जपत जग जाना। वाल्मीकि भय ब्रह्म समाना॥

गोस्वामी तुलसीदास जी ने राम नाम की महिमा बताते हुए वाल्मीकि मुनि के विषय में रामचरितमानस में ये दोहा कहा है। यह दोहा उस प्रचलित मान्यता की ओर संकेत करता है जिसके अनुसार वाल्मीकि पहले डाकू थे। अन्य कई ग्रंथों में भी ऐसे प्रसंग हैं। लेकिन कई ग्रंथ उन्हें उच्च कुल के ऋषि सिद्ध करते हैं।

महर्षि वाल्मीकि न केवल आदि महाकाव्य रामायण के लेखक हैं बल्कि वे स्वयं इसके बहुत ही महत्वपूर्ण पात्र भी हैं। वनवास काल में सीता इनकी ही छत्रछाया में रहीं थीं। यहीं कुश-लव का जन्म और पालन-पोषण हुआ था। उनके संबंध में ऐसे परस्पर विरोधी दावे निश्चय ही जिज्ञासा उत्पन्न करता है।

वाल्मीकि जी के पूर्व जीवन में डाकू होने के संबंध में तीन तरह के विचार हैं

  • Þ वाल्मीकि आरंभ में रत्नाकर नामक डाकू और लुटेरे थे;
  • Þ वाल्मीकि जी इस जन्म में नहीं बल्कि पूर्व जन्म में व्याध थे (लुटेरे नहीं);
  • Þ उपरोक्त दोनों विचार मनगढ़ंत हैं, वे उच्च कुल में उत्पन्न थे और आरंभ से ही सदज्ञान और तपस्या में लगे थे।

ऐसे विरोधी विचारों के कारण क्या हैं? इसे जानने से पहले इन तीनों तरह के विचारों को एक बार देख लेते हैं:

वाल्मीकि आरंभ में रत्नाकर नामक डाकू और लुटेरे थे

इस कथा में भी दो उप-विचार हैं। कुछ ग्रंथों के अनुसार उनका जन्म उच्च कुल में हुआ था लेकिन लुटेरों के कबीले के एक निःसंतान भीलनी द्वारा चुरा लिए जाने के बाद उनका परवरिश के डाकू और लुटेरों के बीच ही हुआ। और अपने नए माता-पिता के साथ-साथ उनके अनुसरण में वे भी डाकू बन गए। इस समय उनका नाम रत्नाकर था। दूसरी विचारधारा के अनुसार उनका जन्म निम्न कुल में हुआ था। उन्हें नागा जनजाति के होने का उल्लेख भी एक पुराण में है।

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उनके आरंभ में डाकू और लुटेरे होने संबंधी कथा इस प्रकार है: 

महर्षि कश्यप और अदिति के पुत्र वरुण (प्रचेता) हुए। वरुण (प्रचेता) की पत्नी चर्षणी के गर्भ से एक पुत्र हुआ जिसका नाम रत्नाकर रखा गया। इस बालक का जन्म अश्विनी मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को हुआ था। महर्षि कश्यप के अन्य संताने भी मनस्वी ऋषि थीं।

ऋषियों के इस महान परिवार के बालक रत्नाकर को बाल्यकाल में ही एक निःसंतान भीलनी ने चुरा लिया। वह भीलनी अपने भील समुदाय में ही अपने पुत्र की तरह उनका पालन-पोषण करने लगी। वे लोग लुटेरे थे। अपने नए भील माता-पिता के साथ रत्नाकर भी उस जंगल से गुजरने वाले राहगीरों को लूटने लगा। इस तरह उच्च कुल के ऋषियों का वंशज एक डाकू बन गया ।

रहगीरों को बंदी बना कर लूटने के क्रम में रत्नाकर ने एक दिन नारद मुनि को भी बंदी बना लिया। नारद जी के पूछने पर डाकू रत्नाकर ने बताया कि वह यह पापकर्म अपने परिवार के लिए करता था। नारद जी ने उससे कहा कि वह जिस परिवार के सदस्यों को पालने के लिए यह पापकर्म करता है, क्या वे उनके पापों का परिणाम भोगने के लिए तैयार होंगे?

रत्नाकर को पूरा भरोसा था कि उसका परिवार जरूर इस परिणाम में भी उसका साथ देगा। लेकिन जब नारद जी के कहने पर वह अपने घर गया और सदस्यों से पूछा कि क्या वे उनके पापों का फल भोगने के लिए तैयार हैं? तो सबने यही कहा कि अपने कर्मों का फल तो उसे स्वयं ही भोगना होगा।

इस जवाब से रत्नाकर का हृदय बहुत व्यथित हुआ। वह पापकर्म छोड़ कर सन्मार्ग पर चलने का निश्चय कर नारद जी के पास आया और उनसे ऐसा सन्मार्ग पूछा।

नारद जी ने रत्नाकर को राम नाम का मंत्र दिया। लेकिन हमेशा मारने-काटने की बात करने वाले डाकू रत्नाकर के लिए यह शब्द जपना कठिन हो रहा था। अतः नारद जी के सलाह के अनुसार उसने “राम-राम” के बदले “मरा-मरा” जपना शुरू किया। उल्टा नाम जपते-जपते ही राम में वह ऐसा तन्मय हो गया कि अब “राम-राम” का जप होने लगा।

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किंवदंती है कि वह जप में इतने तल्लीन हो गया था कि दीमक ने उनके शरीर पर घर “बॉबी” (जिसे वाल्मीकि कहते हैं) बना लिया। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी प्रकट हुए। ब्रह्मा जी ने ही उसके शरीर पर वाल्मीकि देख कर डाकू रत्नाकर को वाल्मीकि यह नाम दिया। ऋषि वाल्मीकि ने नारद और ब्रह्मा जी की प्रेरणा से आदिकाव्य “रामायण” की रचना की।      

वाल्मीकि जी इस जन्म में नहीं बल्कि पूर्व जन्म में व्याध थे

स्कन्द पुराण के अनुसार ऋषि वाल्मीकि जन्म-जन्मांतर के व्याध थे। भविष्य पुराण भी इसका समर्थन करता है। पुराणों के बहुत बाद मध्य काल में बांग्ला भाषा में लिखे गए “कृतिवास रामायण”, आनंद रामायण आदि में भी वाल्मीकि के पूर्व जन्म में व्याध होने का उल्लेख है।

पूर्व जन्म में व्याध (डाकू नहीं) होने की कथा इस तरह है:

वाल्मीकि जी कई जन्म पहले श्रीवत्स गोत्र के एक ब्राह्मण स्तंभ थे।

लेकिन कुछ पापकर्म के कारण अगला जन्म इन्हें व्याध का मिला। इस जन्म में इन्हें शंख नामक एक ऋषि मिले जिन्होंने इन्हें सन्मार्ग दिखाया और राम नाम की महिमा बताया (राम का जन्म वाल्मीकि जी के समय हुआ था। लेकिन राम सनातन ईश्वर हैं जो प्रत्येक कल्प में आते हैं।)

राम नाम के इसी महिमा के कारण व्याध अगले जन्म में रत्नाकर नामक ब्राह्मण हुए। कहीं-कहीं इस जन्म का नाम अग्निशर्मा भी मिलता है। लेकिन पूर्व जन्म के पापों के कारण इस जन्म में भी कुछ दिन तक वे ब्राह्मण होने के बावजूद व्याध की तरह हिंसा पूर्ण पाप कर्म में लगे रहे। लेकिन सप्तऋषियों के सत्संग के कारण उन्हें आत्म

बोध हुआ। इसी तीसरे जन्म में इन्होंने “मरा-मरा” का उल्टा नाम जप किया। तपस्या करते समय दीमक द्वारा शरीर पर घर बना लेने के कारण उनका नाम वाल्मीकि पड़ा।

इसी पुण्य प्रभाव से इन का चौथा जन्म ऋषि वाल्मीकि के रूप में हुआ। इस जन्म में ये सर्वथा निष्पाप रहे।       

उपरोक्त दोनों विचार मनगढ़ंत हैं, वे उच्च कुल में उत्पन्न थे और आरंभ से ही सदज्ञान और तपस्या में लगे थे।

तीसरी विचारधारा उन लोगों की है जो मानते हैं कि वाल्मीकि शुरू से ही, जन्म और कर्म दोनों दृष्टियों से उज्ज्वल कीर्ति वाले महर्षि थे। वे कभी भी डाकू नहीं रहे थे। मनुस्मृति के अनुसार वे प्रचेता, वशिष्ठ, नारद, पुलस्त्य आदि के भाई थे। कुछ ग्रंथ महर्षि भृगु को भी इनका भाई मानते है। इनके पिता वरुण और दादा महर्षि कश्यप थे। स्वयं वाल्मीकि जी राम के यज्ञशाला में सीता की पवित्रता सत्यापित करते हुए अपने वंश के विषय में इस तरह बताते हैं (उत्तरकाण्ड 96वाँ सर्ग, श्लोक 19-21):    

प्रचेतसोअहं दशमः पुत्रो राघवनन्दन। न स्माराम्यनृतम वाक्यमिमौ तु तव पुत्रकौ॥ (19)

(रघुकुलनन्दन! मैं प्रचेता (वरुण) का दसवाँ पुत्र हूँ। मेरे मुँह से कभी झूठ बात निकली हो, इसकी याद मुझे नहीं है। मैं सत्य कहता हूँ ये दोनों आपके ही पुत्र हैं॥)

बहुवर्षसहस्त्राणि तपश्चर्या मया कृता। नोपोश्नीयाम फलं तस्य दुष्टेयम यदि मैथिली॥ (20) (मैंने कई हजार वर्षों तक भारी तपस्या की है। यदि मैथिलेश कुमारी सीता में कोई दोष हो तो मुझे उस तपस्या का फल न मिले॥)

मनसा कर्मणा वाचा भूतपूर्व न किल्बिषम। तस्याहम फलमश्नामि अपापा मैथिली यदि॥ (21) (मैंने मन, वाणी, और क्रिया द्वारा भी पहले कभी कोई पाप नहीं किया है। यदि मिथिलेशकुमारी सीता निष्पाप हो, तभी मुझे अपने उस पापशून्य पुण्यकर्म का फल प्राप्त हो॥ )    

इतना ही नहीं रामायण के अन्य संदर्भ से भी वाल्मीकि द्वारा कभी भी पाप कर्म नहीं किए जाने का उल्लेख मिलता है। डाकू होने की बात तो बहुत दूर है।

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वास्तव में वाल्मीकि मुनि के विषय में उन्हें निम्न कुल का मानने या पापकर्म का जो भी चर्चा है, वह सर्वप्रथम पुराणों में ही है। इससे पहले के प्रत्येक संदर्भ में उन्हें सर्वथा निष्पाप परम तपस्वी और ज्ञानी ऋषि के रूप में ही उल्लेख किया गया है।

पुराण कालक्रम के अनुसार वैदिक साहित्य और सूत्र साहित्य के बहुत बाद, अधिकांशतः गुप्तकाल में लिखे गए थे। इस समय तक बौध साहित्य पूरी तरह स्थापित हो चुका था जिसमे अंगुलीमाल डाकू का भगवान बुद्ध के प्रभाव में संत बन जाने की कथा भी थी। वाल्मीकि जी निम्न कुल का और डाकू या व्याध बताने वाले अन्य साहित्य भी बहुत बाद, मध्य काल में, लिखे गए हैं।

संभवतः राम नाम की महिमा को अधिक प्रभावी दिखाने के लिए या बौद्ध कहानियों के प्रभाव से वाल्मीकि जी के विषय में  भी ऐसे कहानी बना ली गई। पुराणों में उनके पूर्व जन्म के व्याध की कथा से इसको बल मिला।   

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