कृष्ण ने ब्रह्माजी को ब्रह्मज्ञान कैसे दिया?-भाग 14

ब्रह्मा जी द्वारा कृष्ण की परीक्षा लेने का विचार

भगवान श्रीकृष्ण जब अघासुर का वध कर बछड़ों और ग्वाल बालकों के साथ बाहर आए तब तक दिन चढ़ चुका था। बछड़ों ने जल पिया और हरी-हरी घास चरने लगे। सभी ग्वालबालों को भी भूख लगी हुई थी। सभी ग्वालबाल और श्रीकृष्ण गोलाकार पंक्ति में बैठ कर भोजन करने लगे।

वे लोग आपस में हंसी मजाक भी कर रहे थे। भगवान इस समय बहुत सुंदर दिख रहे थे। उनकी बांसुरी उनके कमर में टंगी हुई थी। सिंगी और बेंत बगल में थे। उनके एक हाथ में दही-भात था।

वह अन्य बालकों के साथ हंसी मजाक करते हुए भोजन कर रहे थे। यह दृश्य बहुत ही अद्भुत था। उस समय ब्रह्मा जी वहीं आकाश में थे और यह सब देख रहे थे। उससे पहले उन्होंने देखा था कि श्रीकृष्ण ने किस तरह अघासुर का वध किया और अघासुर ज्योतिरूप होकर किस तरह उन में विलीन हो गया।

श्रीकृष्ण की बाललीलाएँ देख कर एक बार ब्रह्मा जी को कुछ भ्रम हो गया। समस्त यज्ञों के भोक्ता श्रीकृष्ण को सामान्य ग्वाल बालकों के साथ इस तरह लीला करते हुए देखकर ब्रह्मा जी ने सोचा क्यों न इनकी कुछ और लीलाएं देखी जाए। 

ब्रह्मा जी द्वारा कृष्ण की परीक्षा

इस बीच बछड़े घास चरते हुए वहाँ से कुछ दूर निकल गए। लेकिन परम आनंद के साथ भोजन करते हुए ग्वाल बालों ने इस पर ध्यान नहीं दिया। जब उन्होंने देखा कि बछड़े नहीं है, तो वे चिंतित हो गए। श्रीकृष्ण ने उनसे कहा कि वह बछड़ों को ढूंढने के लिए जा रहे हैं और इसलिए सभी मित्र भोजन करते रहे।

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मित्रों को भोजन करते हुए वहीं छोड़कर श्री कृष्ण स्वयं अकेले ही उसी तरह एक हाथ में दही-भात लिए बछड़ों को ढूंढने के लिए चले गए। लेकिन जब बछड़े उन्हें नहीं मिले तब वह लौटकर आए। यहाँ आकर उन्होंने देखा कि यहाँ पर ग्वालबाल भी नहीं थे।

समस्त सृष्टि के ज्ञाता श्रीकृष्ण को यह जानने में देर नहीं लगी कि समस्त बछड़े और ग्वालबाल कहाँ गए! वास्तव में इन सब को ब्रह्माजी ने छुपा दिया था।

भगवान ने सभी ग्वालबाल और बछड़ों के रूप में स्वयं को प्रकट कर लिया और आत्मरूपी बछड़ों और ग्वालबालों के साथ पहले की तरह ही लीला में खेलते रहे। शाम को अन्य दिनों की तरह उन सब के साथ घर को लौटे। भगवानरूपी सभी बालक और बछड़े भी अपने-अपने घरों को चले गए। यहाँ तक कि उनकी माताएँ भी यह नहीं पहचान पायी कि ये उनके बालक नहीं थे।

सबकुछ पूर्ववत चलता रहा। सभी ग्वालबालक भी कृष्ण थे, सभी बछड़े भी कृष्ण थे। इस तरह रहते हुए जब एक वर्ष होने मे 5-6 दिन ही बचे थे तो बलरामजी को संदेह हुआ। उनके पूछने पर श्रीकृष्ण ने उन्हें ब्रह्माजी के कार्यों के बारे मे बता दिया।

ब्रह्मा जी को मोह

इधर ब्रह्माजी जब वापस धरती पर आए तब तक धरती के समय के हिसाब से एक वर्ष हो चुका था। लेकिन ब्रह्माजी के वर्ष के हिसाब से एक त्रुटि अर्थात वह समय जितने में एक तीक्ष्ण सुई कमल के पंखुरी में छेद करता है, बिता था। यहाँ आकर उन्होने देखा कि सब कुछ वैसा ही था जैसा कि उन्होंने पहले देखा था। सभी ग्वालबाल और बछड़े श्रीकृष्ण के साथ थे।

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ब्रह्मा जी ने दोनों जगह बिल्कुल एक जैसी ग्वालबाल और बछड़ों को देखा। दोनों में इतनी समानता थी कि वह स्वयं भी नहीं निर्णय कर पाए कि कौन पहले से बने थे और कौन बाद में बनाए गए थे।

ब्रह्मा जी को भगवान के मायापति रूप का दर्शन

उन्होंने जिन ग्वाल बालों को और बछड़ों को अपनी माया से निद्रा अवस्था में रखा हुआ था वे अभी तक सचेत नहीं हुए थे। वे इसी दुविधा में थे कि उनके देखते-देखते उसी क्षण सभी ग्वालबाल और बछड़े उन्हें श्रीकृष्ण के रूप में दिखाई पड़ने लगे। सब-के-सब श्यामवर्ण, पितांबरधारी, शंख, चक्र, गदा और पद्म से युक्त चतुर्भुज थे। सबके सिर पर मुकुट और अन्य आभूषण और वनमाला शोभायमान हो रही थी।

ब्रह्मा जी ने यह भी देखा कि उन्हीं के जैसे दूसरे ब्रह्मा से लेकर सभी तरह के सभी चराचर जीव मूर्तिमान होकर नाचते-गाते अनेक प्रकार की पूजा सामग्री से भगवान के उन सब रूपों की अलग-अलग उपासना कर रहे थे। यह अत्यंत विस्मयकारी दृश्य देखकर ब्रह्माजी की समस्त इंद्रियां क्षुब्ध और स्तब्ध रह गई।

भगवान द्वारा मोह का निवारण

भगवान का यह स्वरूप तर्क और बुद्धि से परे था। यहाँ तक कि वे भगवान के उस महिमामयी रूपों को देखने में भी असमर्थ हो गए। उनकी आंखे बंद हो गई। भगवान श्री कृष्ण ने ब्रह्मा के इस मोह और असमर्थता को देख कर अपनी माया को हटा लिया।

ब्रह्मा जी को ब्रह्मज्ञान

इससे ब्रह्मा जी को ब्रह्मज्ञान हुआ। सचेत होने के बाद जब उन्होंने अपनी आंखें खोली तो पुनः पहले की तरह ही सुहावना वृन्दावन दिखा। श्रीकृष्ण अभी भी हाथ में दहि-भात का कौर लिए हुए अकेले अपने सखा ग्वालबालों और बछडों को ढूंढ़ रहे थे।

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श्रीकृष्ण की ऐसी बाललीलाएँ देखकर ब्रह्माजी भगवान के श्री चरणों में गिर पड़े। अत्यंत विनम्र और गदगद वाणी से भगवान की स्तुति कर उन्हें प्रणाम किया। ग्वालबालों और बछडों को वहाँ पहुँचा कर ब्रह्माजी अपने लोक को चले गए। 

योगनिद्रा से जागने के बाद ग्वालबाल

भगवान को देखते ही ग्वालबालों ने कहा कि उन्होंने उनके बिना एक कौर भी नहीं खाया था। अर्थात उन्हें पता ही नहीं चला कि इस घटना को बीते एक वर्ष हो चुके थे। भगवान ने हंसते हुए उनके साथ भोजन किया। शाम को सभी जब ब्रज में लौटे तो बालकों ने बताया कि “आज कृष्ण ने वन में एक बड़े भारी अजगर को मार डाला है और उससे हमलोगों की रक्षा की है।”

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