कृष्ण ने गोपियों का वस्त्र हरण क्यों किया था?-भाग 21

वस्त्र-हरण प्रसंग

गोपियों की कृष्णभक्ति को प्रेम-क्रीड़ा का रूप भागवत के जिस प्रसंग के आधार पर दिया गया है, उनमे से पहला यही प्रसंग है अर्थात– गोपियों द्वारा उन्हें पति रूप में पाने के लिए व्रत और कृष्ण द्वारा उनके वस्त्रों को चुराना। इस प्रसंग में अनेक विचार और मत दिए गए हैं। पर उससे पहले यह प्रसंग भागवत में कैसे वर्णित किया गया है, यह देखते हैं।

कुमारी गोपकन्याओं द्वारा कृष्ण को पति रूप में पाने के लिए व्रत

शरद ऋतु के बाद हेमंत ऋतु आया। हेमंत ऋतु की प्रथम मास (अर्थात मार्गशीर्ष यानि अगहन) में ब्रज की कुमारी कन्याएँ एक महीने तक बड़ी निष्ठा और श्रद्धा से देवी कात्यायनी के लिए कठिन व्रत रखती थी। इस बार भी ब्रज की कुमारी कन्याएँ देवी कात्यायनी की पूजा और व्रत करने लगी।

एक महीने तक इस व्रत का पालन करते हुए वे भद्रकाली की पूजा करती और उनसे श्यामसुंदर कृष्ण को पति के रूप में मांगतीं थी। वे सब आपस में श्रीकृष्ण की लीला और उनके नामों का गान करते हुए यमुना जल में स्नान करने के लिए जाती थी।

श्रीकृष्ण द्वारा गोपियों का वस्त्र चुराना  

कात्यायनी देवी के व्रत के दौरान एक दिन सब कुमारियों ने प्रतिदिन की भांति यमुना के तट पर जाकर अपने-अपने वस्त्र उतार दिए और भगवान श्रीकृष्ण के गुणों का गान करती हुई बड़े आनंद से जल क्रीड़ा करने लगी।

भगवान से गोपियों की अभिलाषा छुपी न रही। उनका अभिप्राय जानकर अपने सखा ग्वालबालों के साथ उनकी साधना सफल करने के लिए यमुना तट पहुँचे। यद्यपि ग्वालबाल भी उनके साथ थे, पर उन्होंने अकेले ही गोपियों के वस्त्र उठा लिया और एक ऊँचे कदम के वृक्ष पर चढ़ गए। अन्य ग्वालबालों ने वस्त्र नहीं लिए। बाद में कृष्ण को छोड़ कर अन्य ग्वालबाल वहाँ से चले गए।  

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श्रीकृष्ण और ग्वालबाल हँसते हुए गोपियों से हंसी की बात कहने लगे। “तुम यहाँ आकर इच्छा हो तो अपने-  अपने वस्त्र ले जाओ। मैं तुम लोगों से सच-सच कहता हूं, हंसी बिल्कुल नहीं करता। तुम लोग व्रत करते-करते दुबली हो गई हो। तुम्हारी इच्छा हो तो अलग-अलग आकर या एक साथ ही आकर अपने वस्त्र ले जाओ।”

उनकी ये मसखरी भरी बातें सुनकर गोपियाँ प्रेम से सरोबार हो गईं। लेकिन वे जल से बाहर नहीं आईं। वे जल में कण्ठ तक डूबी हुई थी और ठंढ से कांप रही थीं।

उन्होने श्रीकृष्ण से उन्हें वस्त्र लौटा देने की याचना की। उन्होने अपने को उनका दासी कहते हुए कहा कि जो कृष्ण कहेंगे वे करने के लिए तैयार है। उन्होने कहा कि “तुम तो धर्म का मर्म भालिभांति जानते हो। हमें कष्ट मत दो। हमारे वस्त्र हमें दे दो, नहीं तो हम जाकर नंदबाबा से कह देंगी।”

श्रीकृष्ण द्वारा गोपियों के दोष का परिमार्जन

श्रीकृष्ण के कहने पर गोपियाँ अपने हाथों से गुप्तांगों को छुपा पर बाहर निकलीं। श्रीकृष्ण ने उनसे अब गंभीरता से कहा-

“अरी गोपियों; तुमने जो व्रत लिया है उसे अच्छी तरह से निभाया है- इसमे संदेह नहीं। परंतु इस अवस्था में वस्त्रहीन होकर तुमने जल में स्नान किया है, इससे जल के अधिष्ठाता देव वरुण और यमुनाजी का अपराध हुआ है। अतः इस दोष की शांति के लिए तुम अपने हाथ जोड़ कर सिर से लगाओ और उन्हें झुककर प्रणाम करो। फिर अपने-अपने वस्त्र ले जाओ।”

श्रीकृष्ण की ये बातें सुनकर गोपियों ने माना कि वस्त्रहीन होकर स्नान करने से उनके व्रत में त्रुटि आ गई है। अतः अपने व्रतों के निर्विघ्न पूर्ति के लिए उन्होने समस्त कर्मों के साक्षी श्रीकृष्ण को प्रणाम किया क्योंकि उन्हे प्रणाम करने से ही समस्त त्रुटियों और अपराधों का मार्जन हो जाता है। इससे प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण ने उन्हे वस्त्र दे दिया।

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ब्रजकुमारी गोपियों ने कृष्ण के इस व्यवहार का बुरा नहीं माना बल्कि प्रसन्न हुई। क्योंकि एक तो कृष्ण ने उनके व्रत की त्रुटि दूर कर दिया। दूसरे वही तो उनके इष्ट थे, जिन्हें पाने के लिए वे व्रत कर रहीं थी।

गोपियों की मनोकामना पूर्ति का वरदान

दूसरी तरफ श्रीकृष्ण भी उनके मन की भावनाओं को जानते थे। उन्होने उन गोपियों से कहा “तुम्हारी साधना सिद्ध हो गई है। तुम आने वाले शरद ऋतु की रात्री में मेरे विहार करोगी। सतियों! इसी उद्देश्य से तुमलोगों ने यह व्रत और कात्यायनी देवी की पूजा की थी।”

उनकी आज्ञा पाकर वे सभी गोप कुमारियाँ श्रीकृष्ण को छोड़ कर जाने की इच्छा न होने पर भी अपने घरों को लौट गईं। अपने इसी वचन को पूरा करने के लिए कृष्ण ने उनके साथ शरद ऋतु की पूर्णिमा की रात्री को रास किया था।

वस्त्र-हरण विषयक विवाद

इस प्रसंग के विषय में अनेक शंकाएँ और विचार व्यक्त किए गए हैं लेकिन यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि:  

1. इस समय श्रीकृष्ण की आयु मात्रा छः-सात वर्ष की थी। 

2. गोपियाँ उन्हें ही पति रूप में प्राप्त करने के लिए व्रत की हुई थी और उन्होंने अपनेआप को श्रीकृष्ण के प्रति समर्पित कर दिया था।

3. श्रीकृष्ण का प्रेम और भक्ति ही उनके जीवन का आधार था। यह समर्पण आध्यात्मिक था, और इसमे भौतिक कामनाएँ नहीं थी। अन्यथा सभी गोपियाँ एक साथ ही कृष्ण को पाने के लिए व्रत कर रही थीं। लेकिन किसी ने न तो अपनी भावना एक-दूसरे से छुपाया न ही एक-दूसरे के प्रति उनमें ईर्ष्या की भावना थी।

4. श्रीकृष्ण ने लीला में भी कभी किसी सामाजिक और धार्मिक मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया था।

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5. उन्होंने वस्त्रहीन होकर स्नान करने से उनके व्रत में आए दोष का मार्जन इस तरह स्नान को धर्मविरुद्ध होने की शिक्षा गोपियों को देने के लिए ही ऐसा किया था। जल विहार करते समय निर्वस्त्र खड़े रहने के कारण ही नलकूबर और मणिग्रीव को नारद जी ने वृक्ष बनाने का शाप दिया था। वही दोनों भाई यमलार्जुन के वृक्ष बने थे जिसका उद्धार कृष्ण ने किया था। उसी अपराध की तरफ कृष्ण ने गोपियों का ध्यान एक साधारण हंसी-मज़ाक के द्वारा दिलाया। 

6. कृष्ण उस स्थान पर अपने ग्वालबाल सखाओं के साथ आए थे लेकिन बाद में उनके सभी सखा वहाँ से चले गए। उन्होने वस्त्र अकेले ही लिया था। यानि उन्होने गोपियों को उनकी गलती बताई थी पर उन्हें अन्य व्यक्ति के समक्ष अपमानित नहीं किया था।

7. गोपियों ने कृष्ण के व्यवहार को गलत नहीं माना बल्कि अपनी गलती मानते हुए उनके द्वारा त्रुटि बताने के लिए प्रसन्नता व्यक्त किया।

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