कालिय नाग कौन था और श्रीकृष्ण ने क्यों व कैसे उसका मानमर्दन किया?-  भाग 17          

कालिय नाग कौन था?  

कालिय नाग अत्यंत विषैला और विशाल नाग अर्थात सांप था जो अपने परिवार और मित्रों के साथ यमुना जी के कालीदह नामक स्थान (कुंड) में रहता था। उसके विष के प्रभाव और वेग से वहाँ का पानी अत्यंत वेगवान रहता था। उस विषैले पानी का तापमान इतना था कि उसकी छींटे आसपास के वनस्पति पर पड़ती तो वह भी मुरझा जाते थे। ऊपर उड़ने वाले पक्षी मर जाते थे। इसीलिए वहाँ के जल का उपयोग नहीं होता था।

कालिय नाग के यमुना नदी में रहने का कारण

यह कालिय नाग पहले समुद्र स्थित रमणक नामक द्वीप पर रहता था। लेकिन गरुड़ से अपनी जान को खतरा होने के बाद वह अपने बंधु-बंधवों के साथ इस यमुना नदी में बसा था।

कालिय नाग के विष के ग्वालबालों और गायों की मृत्यु

एक दिन श्रीकृष्ण अपने साथी ग्वालबालों के साथ यमुना के तट पर गाय चरा रहे थे। उस दिन बलरामजी नहीं आए थे। जेठ-आषाढ़ का महीना था। ग्वालबाल और गाएँ प्यास से मूर्छित हो रहे थे। गर्मी और प्यास से उनके कण्ठ सूख रहे थे। उन्होंने यमुना जी का जल पी लिया। प्यास से वे इतने बेहाल थे कि उन्हें यह भी याद नहीं रहा कि यह जल विषैला था।

नदी का वह विषैला जल पीते ही सभी ग्वालबाल और गायों कि मृत्यु हो गई। कृष्ण ने जब यह देखा तो उन्होंने अपनी अमृतमयी दृष्टि से सभी को पुनः जीवित कर दिया। सभी ग्वालबाल जीवित होने के बाद एक-दूसरे को आश्चर्यचकित होकर देखने लगे। उन्हें समझने में देर नहीं लगी कि वह मृत हो चुके थे श्रीकृष्ण ने उन्हें जीवित किया है।

इधर श्रीकृष्णजी ने सोचा कि इस नाग के कारण उनका या पवित्र क्रीड़ा भूमि सुरक्षित नहीं रह गया था और यमुना नदी का जल मनुष्य और पशु-पक्षियों द्वारा उपयोग के लायक नहीं था। इस समस्या को समाप्त करने के लिए वे कदंब वृक्ष की एक शाखा पर चढ़कर यमुना जी में कालिदह के स्थान पर कूद गए। 

कालिय नाग द्वारा श्रीकृष्ण को बांधना

उनके कूदने से जल में जहाँ पहले ही बहुत तेज ऊफान आ रहा था वह और बढ़ गया। वे इतनी तीव्र और इतने विषैले जल में क्रीड़ा करने लगे। यह देखकर कालिय नाग अत्यंत क्रोध से वहाँ आया। उसने देखा श्याम वर्ण का एक बालक पीत वस्त्र धारण किए हुए था। उसकी छवि अत्यंत मनोहर थी। लेकिन फिर भी उसने अत्यंत क्रोध से श्री कृष्ण को डंस लिया और उसे उन्हें अपने शरीर में लपेट कर बांध दिया।  

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यह दृश्य देखते ही नदी के किनारे खड़े समस्त ग्वालबाल मूर्छित होकर गिर पड़े। गाय और बछड़े बेचैन होकर डकारने लगे। वृंदावन में तरह-तरह के अपशकुन होने लगे। अपशकुन को देखकर समस्त बृजवासी यह सोचकर आशंकित हुए कि कहीं कृष्ण पर कोई विपत्ति तो नहीं आ गई।

वे सभी यमुना तट की ओर भागे। गाय के साथ श्री कृष्ण चिन्हों का अनुकरण करते हुए वे जल्दी ही वहाँ पहुँच गए। श्रीकृष्ण के चरणों के विशेष चिन्हों से उनकी पहचान करना कोई मुश्किल काम नहीं था।

ब्रजवासियों को शोक

जब समस्त बृजवासी वहाँ पहुंचे तो वहाँ का दृश्य देखकर लगभग मूर्छित हो गए क्योंकि कृष्ण ही उनके लिए जीवन थे। कृष्ण प्रेम ही उनके जीवन का आधार था। माँ यशोदा स्वयं कालिदह में कूदने लगी लेकिन अन्य गोपियों ने उन्हें रोक लिया। नंद बाबा भी कालीदह में जाना चाहते थे लेकिन सर्वज्ञाता भगवान बलराम जी ने उन्हें रोक लिया क्योंकि बलराम जी को कृष्ण की शक्ति का ज्ञान था।

भगवान मनुष्य की तरह सर्प के पाश में बंधे हुए और असहाय से दिख रहे थे। उन्होने जब अपने बंधु-बांधव और समस्त ब्रजवासियों का यह हाल देखा तो उन्होंने अपने को मुक्त कर उन्हें सुख देने का निश्चय किया। उन्होंने अपने शरीर को इतना मोटा कर लिया कि नाग उसे अपने पाश में अधिक देर नहीं रख सका और उसकी पकड़ ढीली पड़ गई।

श्रीकृष्ण द्वारा कालिय नाग का दमन

कालिय नाग के बंधन से अलग होते ही कृष्ण उसके फण पर चले गए। कालिय नाग का 101 फण यानि सिर था। भगवान उस पर चढ़ कर कलात्मक नृत्य करने लगे। उसका जो भी फण उठता था, श्रीकृष्ण उस पर कूदकर नृत्य करने लगते थे।

अप्सराएं, गंधर्व आदि ने जब देखा कि समस्त कलाओं के आदि स्रष्टा भगवान नृत्य कर रहें है तो उन्होंने मधुर स्वर में वाद्य बजाना एवं गाना शुरू कर दिया और भगवान पर फूलों की वर्षा करने लगें। 

भगवान के अंदर समस्त सृष्टि का निवास है। इसलिए उनके बोझ से कालिय नाग का अंग-अंग टूटने लगा। वह इस भार को बर्दाश्त करने में सक्षम नहीं हो रहा था। उसकी चेतना कम होने लगी और वह मूर्छित-सा होने लगा।

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नाग पत्नी द्वारा विनती

अपने पति की यह दशा देखकर उसकी पत्नियां अपने बच्चों को आगे कर हाथ जोड़कर श्रीकृष्ण के सामने आईं और उन्होंने श्रीकृष्ण को शरणागत रक्षक जान कर तरह-तरह से उनकी स्तुति कर अपने पति के प्राण को छोड़ देने का निवेदन किया। इससे प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण नाग के फण से नीचे आ गए।

धीरे-धीरे नाग की चेतना लौटी और उसने भी हाथ जोड़कर भगवान की स्तुति की और उनसे क्षमा माँगा। सभी ने अनेक तरह से भगवान श्रीकृष्ण की पूजा की।

कालिय नाग को वापस रामणक द्वीप भेजना  

भगवान ने नाग से कहा कि वह अपने बंधु-बंधवों सहित समुद्र स्थित रमणक द्वीप, जहाँ वह पहले रहता था, में जा कर रहे। भगवान के चरण चिह्न उसके मस्तक पर अंकित हो जाने के कारण अब उसे गरुड़ से कोई ख़तरा नहीं होगा। वह श्रीकृष्ण की आज्ञा का पालन करते हुए अपने समस्त बंधुओं और परिवार के साथ यमुना नदी को छोड़कर समुद्र स्थित उस द्वीप पर चला गया। 

यमुना को आशीर्वाद

इसके बाद यमुना नदी का जल, न केवल स्वच्छ, बल्कि प्राणियों के लिए अमृत-तुल्य हो गया। भगवान ने आशीर्वाद दिया कि जो कोई भी कृष्ण के इस लीला का सुबह-शाम स्मरण करेगा उसे सांपों का कोई भय नहीं होगा।

साथ ही श्री कृष्ण ने यमुना नदी में क्रीड़ा किया है इसलिए इसमें स्नान और इसके जल से पूजा और पितरों को इसका तर्पण करने से प्राणियों के पाप नष्ट हो जाएंगे।

कालिय नाग के शाप की कथा

श्रीकृष्ण की यह नाग लीला सुनकर राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रश्न किया कि नाग तो जलचर जीव नहीं है, फिर वह इतने युगों तक जल में क्यों और कैसे रहा? ऐसा क्या कारण था जिससे उस कालिय नाग को अपना रमणक द्वीप छोड़ना पड़ा? 

शुकजी ने परीक्षित के इन प्रश्नों का जवाब देते हुए यह कथा बताया।

गरुड़जी की माता विनीता और सांपों की माता कद्रु में परस्पर कट्टर शत्रुता थी। इस कारण गरुड़ जी को जो भी सांप मिलता तो उसे मार कर खा जाते थे। इससे भयभीत सांपों ने ब्रह्माजी की शरण ली।

ब्रह्माजी ने यह व्यवस्था बना दिया कि प्रत्येक अमावस्या को सांप अपने में से एक सांप को स्वेच्छा से गरुड़ जी को भेटस्वरूप देंगे। गरुड़ जी अपने मन से किसी भी सांप को नहीं मारेंगे। इस व्यवस्था से सभी सांपों को कभी भी मारे जाने के भय से मुक्ति मिल गई।

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कालिय नाग को अपने बल और विष का अत्यंत अभिमान था। उनसे गरुड़ को उनका भाग देने से मना कर दिया और उनके भेंट के लिए दिये जाने वाले सांपों को वह स्वयं मार डालता था। इस पर क्रोधित होकर गरुड़ जी ने उसे मार डालने के उद्देश्य से उस पर हमला किया।

कालिय नाग ने गरुड़ जी, जो कि भगवान के मुख्य पार्षदों में से है, की शक्ति को कम करके आँका था। कालिय के दंश से और अधिक क्रोधित होकर गरुड़ जी उसकी ओर झपटे। अपने बचने का कोई उपाय नहीं देख कर घायल कालिय नाग यमुनाजी के इस अत्यंत गहरे और दुर्गम कुंड में आ गया।

तपस्वी सौभरिक के मना करने पर भी गरुड़ जी ने उस कुंड के एक मछली को खा लिया था। इस कारण सौभरिक ने उसे शाप दिया था कि अगर वह फिर कभी इस कुंड में घुस कर मछलियों को खाएँगे तो तत्क्षण उनकी मृत्यु हो जाएगी।

इस शाप के कारण गरुड़ जी वहाँ नहीं आ सकते थे। इस शाप को कालिय नाग के अतिरिक्त और कोई साँप नहीं जानता था। श्रीकृष्ण ने कालिय नाग के सिर पर अपना चरण चिह्न बना कर उसे गरुड़ जी से अभय कर फिर अपने निवास स्थान पर भेज दिया और यमुना जल को सभी प्राणीयों के लिए फिर से उपलब्ध करा दिया।   

जब श्रीकृष्ण नाग को अपने स्थान भेजने के बाद दिव्य वस्त्रों, आभूषणों, मालाओं और बहुमूल्य मणियों से सुसज्जित होकर उस कुंड से बाहर निकले तो समस्त ब्रजवासियों की खुशियों की कोई सीमा नहीं रही। उन्होने अत्यंत आनंदित होकर उन्हें अपने हृदय से लगा लिया। श्रीकृष्ण मृत्यु के मुख से बच कर लौट आए थे, अतः ब्राह्मणों की सलाह के अनुसार नन्द जी ने बहुत से गाय और सोना ब्राह्मणों को दान दिया।

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