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ऋषि वाल्मीकि ने रामायण की रचना और प्रचार-प्रसार क्यों व कैसे किया?-भाग 1 

नारद जी द्वारा वाल्मीकि जी को रामायण लिखने की प्रेरणा

रामायण की रचना ऋषि वाल्मीकि ने नारद और ब्रह्मा जी की प्रेरणा सी किया था। एक बार नारद जी उनसे मिलने आए। उनके मुँह से राम के गुणों और रामराज्य का वर्णन सुनकर वाल्मीकि जी बहुत प्रभावित हुए।

व्याध द्वारा क्रौंच पक्षी वध

नारद जी के जाने के बाद वाल्मीकि जी ने तमसा नदी में स्नान किया और वन की शोभा देखते हुए विचरने लगे। वहाँ तमसा नदी के तट पर उन्होंने क्रौंच पक्षी के एक जोड़े को देखा। यह जोड़ा आपस में अठखेलियाँ और कलरव करता हुआ बहुत भला लग रहा था।

तभी एक व्याध ने नर पक्षी को तीर मार दिया। वह पक्षी खून से लथपथ होकर तड़पते हुए धरती पर गिर पड़ा। नर पक्षी की यह हालत देख कर मादा क्रौंच पक्षी करुण स्वर में रोने लगी।

वाल्मीकि जी द्वारा व्याध को शाप देना

इस जोड़े की यह दशा देख कर वाल्मीकि जी को यह अधर्म प्रतीत हुआ और उन्हें क्रोध आ गया। दया और क्रोध के इस मनोभाव से उन्होंने मादा पक्षी की ओर देखते हुए निषाद से कहा:

मा निषाद प्रतिष्ठाम त्वमगमः शाश्वतीः समाः।

यत क्रौंचमिथुनादेकमवधीः काममोहितम॥“

(अर्थात, निषाद तुझे नित्य-निरंतर– कभी भी शान्ति न मिले; क्योंकि तूने इस क्रौंच जोड़े में से एक की, जो काम से मोहित हो रहा था, बिना किसी अपराध के   हत्या कर डाली।)

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वाल्मीकि जी द्वारा अपने शाप पर पश्चाताप और विचार

वाल्मीकि जी ने पक्षी के लिए शोक और क्रोध में व्याध को यह शाप तो दे दिया लेकिन शान्त होकर विचार करने पर उन्हें लगा कि व्याध को उन्हें इस तरह शाप नहीं देना चाहिए था। उनका शाप उचित नहीं था। उन्हें अपने मुँह से निकले शब्दों के काव्यात्मकता का भी ध्यान आया।

उस समय उनके एक शिष्य भारद्वाज भी वहीं थे। उन्होंने शिष्य से कहा “शोक से पीड़ित हुए मेरे मुख से जो वाक्य निकल पड़ा है, यह चार चरणों में आबद्ध है। इसके प्रत्येक चरण में बराबर-बराबर (यानि आठ-आठ) अक्षर हैं। इन्हें वीणा के लय पर गाया भी जा सकता है। अतः मेरा यह वचन श्लोकरूप (अर्थात श्लोक नामक छन्द में आबद्ध काव्यरूप या यशः स्वरूप) होना चाहिए, अन्यथा नहीं।

ब्रहमा जी का वाल्मीकि जी मिलना

अपने आश्रम लौट आने और अन्य कार्यों में लग जाने के बाद भी वाल्मीकि  जी के दिमाग से क्रौंच पक्षी वाली घटना और अपना श्लोक नहीं निकल रहा था। तभी वहाँ ब्रह्मा जी आए। वाल्मीकि जी ने उनकी यथोचित पूजा की और आसन दिया। ब्रह्मा जी के समक्ष आने पर भी उनके दिमाग में यही था। उन्होने वह श्लोक ब्रह्मा जी को सुना दिया ।

ब्रह्मा जी उनकी मनःस्थिति को समझ गए। उन्होंने कहा “तुम्हारे मुँह से निकला हुआ यह छंदोबद्ध वाक्य श्लोकरूप ही होगा। मेरी प्रेरणा से ही तुम्हारे मुँह से ऐसी वाणी निकली है। तुम श्रीराम के चरित्र का वर्णन करो। तुमने नारद जी के मुँह से जैसा सुना है, उसी के अनुसार उनके चरित्र का चित्रण करो। श्रीराम, उनसे संबंधित लोगों और राक्षसों के सभी गुप्त और प्रकट वृतांत अज्ञात होने पर भी तुम्हें ज्ञात हो जाएँगे।”

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ब्रहमा जी ने यह भी कहा कि “इस काव्य में अंकित तुम्हारी कोई भी बात झूठी नहीं होगी। इसलिए तुम श्रीरामचंद्र जी की परम पवित्र एवं मनोरम कथा को श्लोकबद्ध करके लिखो।”

वाल्मीकि जी द्वारा रामायण लिखने का निश्चय

इतना कह कर ब्रह्मा जी अंतर्धान हो गए। वाल्मीकि जी ने इसी तरह के श्लोक (जो छन्दबद्ध हो और जिसे गाया जा सके) के रूप में श्रीराम के चरित को लिखने का निश्चय किया। जिस क्रम में उन्होंने नारद जी से सुना था, उन्होने उसी क्रम में लिखने का विचार किया। तत्पश्चात श्रीराम के संपूर्ण चरित्र को जानने के लिए वे कुश के आसन पर समाधिस्थ होकर बैठ गए।

ब्रह्मा जी के वरदान के अनुसार समाधि में श्रीराम के संपूर्ण चरित्र को उन्होंने प्रत्यक्ष रूप से देखा। उन्होंने उन घटनाओं को भी प्रत्यक्ष देखा जो पहले घटित हो चुकी थीं। ब्रहमा जी के वरदान से उन्होंने भविष्य में होने वाली घटनाओं को भी देखा। (ब्रह्माजी का वरदान था कि जो वो लिख देंगे वो सच होगा। रामायण में कोई झूठी बात नहीं होगी।)

इस समय तक श्रीराम वन से वापस आ चुके थे। रामराज्य स्थापित हो चुका था। समाधि में वाल्मीकि जी ने जो देखा उस के आधार पर उन्होंने रामायण की रचना की।

वाल्मीकि कृत रामायण

रामायण में चौबीस हजार श्लोक, पाँच सौ सर्ग, सात काण्ड थे। इन सात काण्डों में उत्तर काण्ड भी था, जो भविष्य में होने वाली घटनाओं से संबंधित था। अर्थात उस समय तक घटित नहीं हुआ था। संपूर्ण काव्य गेय (अर्थात गाने योग्य) श्लोक में था। रामायण में चूँकि रावण के वध का वृतांत भी है। रावण को ऋषि पुलसत्य का पौत्र होने के कारण पौलसत्य और दस सिर होने के कारण दशानन भी कहते हैं। इसलिए रामायण का दूसरा नाम पौलस्यवध अथवा दशाननवध भी था।

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कुश-लव को रामायण गान का प्रशिक्षण

रामायण की रचना के बाद वाल्मीकि जी किसी ऐसे व्यक्ति की खोज में थे, जो इस विशाल काव्य को याद कर सके और जनसाधारण को गा कर सुना सके। ऐसा व्यक्ति उन्हे मिला स्वयं उनके आश्रम में मुनिवेष में रहने वाले श्रीराम के दो पुत्र कुश और लव के रूप में। दोनों भाइयों की स्मरण शक्ति बहुत तीव्र थी। इस छोटी उम्र में ही वे सभी वेदों में पारंगत हो गए थे। दोनों भाइयों का स्वर भी बहुत मधुर था। उन्हें संगीत शास्त्र का भी ज्ञान था।

अतः वाल्मीकि जी ने अपने लिखे रामायण महाकाव्य का अध्ययन सबसे पहले कुश और लव को कराया। दोनों भाई संगीत और वाद्य (वीणा) के साथ कुशलतापूर्वक इस महाकाव्य का गायन करने लगे।

ऋषि-मुनियों के समागम में जब कुश और लव दोनों भाई रामायण गाते थे, तो समस्त श्रोतागण भाव-विभोर हो जाते थे। उनके गायन की लोकप्रियता बढ़ने लगी।

श्री राम द्वारा कुश-लव के रामायण-गान की प्रशंसा

एक दिन जब दोनों भाई अयोध्या की सड़कों पर रामायण गाते हुए घूम रहे थे तो श्रीराम जी ने उन्हें देखा। श्रीराम उन्हे अपने घर ले आए और यथोचित सम्मान दिया। (बिना यह जाने कि ये दोनों बच्चे उनके ही पुत्र हैं)। उन्होने राजसभा में दोनों भाइयों के गायन की प्रशंसा कर उन्हें गाने के लिए कहा। 

श्रीराम की राजसभा में कुश और लव के रामायण गान से समस्त श्रोतागण आनंदित हो गए। स्वयं श्रीराम उनकी प्रतिभा से बहुत खुश हुए। उन्होने अपने भाइयों से कहा “ये दोनों कुमार मुनि होकर भी राजोचित लक्षणो से सम्पन्न हैं। संगीत में कुशल होने के साथ ही महान तपस्वी हैं।”

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