ऊत्कच और तृणावर्त कौन थे और कृष्ण ने उनका उद्धार कैसे किया?-भाग 8 

ऊत्कच का उद्धार

पूतना वध के बाद श्रीकृष्ण ने जिस दूसरे व्यक्ति का उद्धार किया, वह था ऊत्कच। लेकिन वह उन्हें मारने नहीं बल्कि शाप से मुक्ति पाने के लिए आया था। वह उसकी इच्छा को जानते थे। इसलिए उसकी पूर्ति की। अपने पैरों के स्पर्श से उसे मुक्त किया।

हुआ यह कि भगवान कृष्ण के जन्म के तीसरे महीने मे उनके करवट बदलने का अभिषेक-उत्सव चल रहा था। उसी दिन उनका जन्म नक्षत्र भी था। नींद आने पर यशोदाजी ने उन्हे एक छकड़े के नीचे शय्या पर सुला दिया। थोड़ी देर बाद उनकी नींद खुली तो वह दूध पीने के लिए रोने लगे।

लेकिन यशोदा जी उत्सव में आने वाले लोगों के स्वागत-सत्कार में व्यस्त होने के कारण उनका रोना नहीं सुन सकीं। भगवान ने जब सामान्य शिशु की तरह रोते-रोते पैर फेंका तो उनके नन्हें पैर लगने से विशाल छकड़ा पलट गया और उसमे रखी सभी वस्तुएँ गिर कर टूट-फुट गईं।

यह विचित्र घटना देख कर सभी हतप्रभ रह गए। वे ये नहीं समझ पा रहे थे कि छकड़ा अपने आप कैसे पलट गया। जब वहाँ खेल रहे कुछ बालकों ने बताया कि यह कृष्ण के पैर लगने से पलटा था तो किसी ने उनकी बातों का भरोसा नहीं किया। यशोदाजी ने किसी ग्रह आदि का प्रकोप समझ कर ब्रह्मणों से वेदमंत्रो द्वारा शांतिपाठ कराया और उन्हे दान दिया।

वास्तव में उस छकड़े में देहरहित ऊत्कच बैठा था। 

ऊत्कच कौन था?

ऊत्कच असुर हिरण्याक्ष का पुत्र था। वह शारीरिक रूप से बहुत बलवान था और इसका उसे अभिमान भी था। एक बार यात्रा के दौरान वह लोमस ऋषि के आश्रम से गुजरा। उसने आश्रम के वृक्षों को कुचल दिया। इससे लोमस ऋषि क्रोधित हो गए। उन्होने उसे देहरहित हो जाने का शाप दे दिया। लेकिन क्षमा माँगने पर ऋषि ने कहा था कि वैवस्वत मन्वंतर में श्रीकृष्ण के स्पर्श से उसकी मुक्ति हो जाएगी। अतः श्रीकृष्ण ने चरण का स्पर्श देकर उस असुर का उद्धार कर दिया।

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तृणावर्त वध 

पूतना वध के बाद तृणावर्त दूसरा राक्षस था जिसे कंस ने कृष्ण को मारने के लिए भेजा था। यह कथा इस प्रकार है।

एक बार यशोदाजी श्रीकृष्ण को गोद में लेकर बैठी हुई उन्हे दुलार रही थी। अचानक उनका वजन इतना बढ़ गया कि यशोदाजी उन्हें गोद में नहीं रख सकीं। आश्चर्यचकित होकर उन्होने भगवान को जमीन पर बैठा दिया। उन्होने ईश्वर का स्मरण किया और फिर घर के कामों में लग गई।

इसी बीच कंस का निजी सेवक तृणावर्त दैत्य आया। कंस के आदेशानुसार वह हवा के एक बवंडर के रूप में आया और भगवान को उड़ा कर आकाश में ले गया। इस प्रचंड बवंडर से लोग कुछ देख नहीं पा रहे थे। समस्त गोकुल इससे ढँक गया। उसकी भयंकर गर्जना से दिशाएँ कांप उठी। यशोदाजी ने जहाँ बालक को बैठा रखा था, वहाँ गई तो बालक को नहीं देख घबड़ा गई।

इधर बवंडर बना तृणावर्त भगवान को लेकर उड़ तो गया लेकिन उनका भार संभाल नहीं पाया और उसका वेग कम होकर रुक गया। भगवान ने उसका गला ज़ोर से पकड़ रखा था। उसने भगवान को अपने से अलग करना चाहा लेकिन कर नहीं पाया और अंततः मृत होकर वह गिर पड़ा।

उसका विकराल मृत शरीर आकाश से एक चट्टान पर गिरा और चकनाचूर हो गया। लोग जब वहाँ पहुँचे तो देखा भगवान उसके छाती पर लटक रहे थे।   

तृणावर्त कौन था?

तृणावर्त वास्तव में पांडु देश का सहस्त्राक्ष नामक राजा था। नर्मदा तट पर अपनी रानियों के साथ विहार करते समय उसने वहाँ से गुजरने वाले ऋषि दुर्वासा को प्रणाम नहीं किया था। इससे क्रुद्ध होकर ऋषि ने उसे राक्षस होने का शाप दे दिया। पर राजा के क्षमा माँगने पर श्रीकृष्ण के शरीर के स्पर्श के मुक्ति मिलने का आशीर्वाद दिया था।

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