उत्तरकांड से संबन्धित विवाद क्या है?-भाग 61

उत्तरकाण्ड क्या है?

राम के राज्याभिषेक के बाद की घटनाओं का वर्णन रामायण के अंतिम अध्याय यानि कांड में है जिसे उत्तर कांड कहते हैं। इसे राम के जीवन के उत्तार्ध भाग या राज्याभिषेक के बाद यानि उत्तरवर्ती होने के कारण उत्तरकाण्ड नाम दिया गया है।

रामायण के आरंभ में इस महाकाव्य की रचना के संबंध में जो वृतांत प्राप्त है उसके अनुसार जिस समय रामायण की रचना की गई थी उस समय तक राम का वनवास से वापसी के बाद राज्याभिषेक हो चुका था। रामराज्य की स्थापना हो चुकी थी।

अर्थात युद्ध कांड तक उन प्रसंगो का विवरण है जो घटित हो चुका था। लेकिन उत्तरकाण्ड में ऐसी घटनाओं का विवरण है जो भविष्य में होने वाली थी।

भविष्य से संबन्धित घटनाओं का उत्तरकाण्ड कैसे लिखा गया?

अब सवाल उठता है कि जो घटनाएँ अभी घटित भी नहीं हुई थी, उसे वाल्मीकि जी ने कैसे लिखा? जबकि वे शपथ खाकर कहते हैं कि जो कुछ भी इसमें लिखा गया है वह अक्षरशः सत्य है।

इसके लिए रामायण में लिखा गया है कि ब्रह्मा के वरदान के कारण वाल्मीकि को समाधि की अवस्था में राम-सीता से संबन्धित भूत और भविष्य, प्रकट और अप्रकट– सभी प्रकार के विवरणों और घटनाओं के दर्शन हो गए थे। ब्रह्मा ने यह वरदान भी दिया था कि जो कुछ भी रामायण में लिखा होगा वह सत्य हो जाएगा। उसी आधार पर उन्होने उन घटनाओं का भी सत्य विवरण है जो उनसे बहुत दूर लंका या अयोध्या में हुआ था। इसी तरह उन घटनाओं को भी उत्तरकाण्ड में लिखा जो भविष्य में होने वाले थे।

ब्रह्मा के वरदान के कारण कुछ लोग मानते हैं कि उत्तरकाण्ड मूल रामायण का ही भाग है और इसे वाल्मीकि ने ही लिखा था। 

रामायण और रामचरित मानस के उत्तरकाण्ड में क्या अंतर है?  

वाल्मिकीकृत रामायण के उत्तरकाण्ड में राम के जीवन के अधिकांश ऐसे बातों को लिखा गया है जिस कारण उनकी आलोचना होती रही है। सीता वनवास, लव-कुश का वन में जन्म, शंबूक शूद्र की हत्या, यज्ञ और महंतो के प्रति विपरीत विचार जैसे विवरण इसमें हैं। रावण और सीता के पूर्व जन्म की कहानी जैसे कई ऐसे प्रसंग हैं जो कथा के मूल प्रवाह के भाग नहीं बल्कि अवशिष्ट अंश की तरह लगते हैं।

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जबकि रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में इन सब की कोई चर्चा नहीं है। इसमें काकभुशुंडि, गरुड, राम द्वारा प्रजाजनों को अच्छे उपदेश देना आदि का प्रसंग है।

रामचरितमानस में जिन प्रसंगों के लिए लंकाकाण्ड नाम दिया गया है, उसे वाल्मीकि रामायण में युद्ध काण्ड कहा गया है। शेष काण्डों के नाम समान ही है। विषय वस्तु भी लगभग समान ही हैं।

उत्तर कांड को बाद में जोड़ा हुआ मनाने के कारण

बहुत से लोग सम्पूर्ण उत्तरकाण्ड को या कम से कम इसके अधिकांश भाग को बाद में जोड़ा गया भाग मानते हैं। उनके अनुसार वाल्मीकि ने राम की जीवनी लिखी थी। मूल रामायण राम के राज्याभिषेक और उसके बाद उनके मित्रों की विदाई के साथ ही समाप्त हो जाता है। इसके बाद का भाग बाद में जोड़ा गया है। अपने विचार को मान्यता दिलाने के लिए या राम को बदनाम करने के लिए ऐसी बातें जानबूझ कर जोड़ दी गई। ऐसा मानने के कारण ये हैं:

1. वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण में युद्धकाण्ड राम के राज्याभिषेक और उसमें आने वाले उनके मित्रों के विदाई के साथ ही समाप्त हो जाता है। लेकिन इसके बाद उत्तरकाण्ड में सबके विदाई का फिर से विस्तार से वर्णन है। एक ही प्रसंग का दो बार वर्णन अनावश्यक लगता है, और ऐसा किसी और कांड में नहीं मिलता जैसा कि युद्ध कांड (जिसमें बीत चुके घटनाओं का वर्णन है) और उत्तरकाण्ड (जिसमें भविष्य में होने वाली घटनाओं का विवरण है) में है।

2. कई अंश संदर्भ से भिन्न प्रतीत होते हैं। उदाहरण के लिए एक बार अगस्त्य ऋषि के चले जाने की चर्चा है, पर बाद में फिर उनके द्वारा कुछ कहने की बात है। युद्ध काण्ड के अंत में राम के साथ आए वानर, रीछ, राक्षस आदि के चले जाने का विवरण संक्षेप में है, लेकिन फिर उत्तर काण्ड में विस्तार से बताया गया है।

3. रामायण की जो प्राचीन प्रतियों मिली हैं, उनमे उत्तर काण्ड के कुछ अंशों में आपस में भिन्नता है। भाषा और संदर्भ के दृष्टि से कई अंश असंगत लगते है।

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4. सनातन ग्रन्थों में किसी ग्रन्थ के सुनने या पढ़ने का महत्व (फलश्रुति) लिखने की परंपरा है। यह या तो शुरू में लिखा जाता है या अंत में, या दोनों में। रामायण के शुरू और युद्धकाण्ड के अंत में यह लिखा गया है।

5. उत्तर कांड की भाषा और शैली रामायण के अन्य कांडों से मेल नहीं खाती। बहुत से भाषाविद इसे वाल्मीकि की भाषा और शैली नहीं मानते हैं।

6. रामायण के मूल ग्रन्थ में भी कुछ भाग ऐसे हैं जो प्रक्षिप्त प्रतीत होते हैं। उदाहरण के लिए जब राम को मनाने के लिए भरत चित्रकूट में जाते हैं, तब जाबालि नास्तिक मत के आधार पर राम को लौटने के लिए समझाता है। राम नास्तिक मत (बौद्ध, जैन, आजीवक आदि नास्तिक मत है) का खंडन कर इसके प्रति कुछ रोष प्रकट करते हैं। यहाँ बौद्ध की भी चर्चा है। कालक्रम में बुद्ध राम के बाद आते हैं। इसलिए राम की सभा में इसकी चर्चा नास्तिक मतों के खंडन के लिए रामायण के उपयोग का प्रयास माना जा सकता है।

7. इसमें कई कथाएँ ऐसी हैं जो बातचीत के क्रम में अपने मत के समर्थन में सुनाया गया है। उत्तर काण्ड में कई ऐसे प्रसंग हैं जो उसके मूल भाग से मेल नहीं खाते। उदाहरण के लिए राम द्वारा एक कुत्ते के प्रति न्याय। इस प्रसंग के अनुसार मठाधीश होना पाप का कारण बताया गया है। लेकिन राम के समय मठ का कोई अस्तित्व नहीं था। मठ बौद्ध आदि नास्तिक मतों के बाद अस्तित्व में आए। उस समय आश्रम व्यवस्था थी। और राम ने समस्त रामायण में आश्रम को सम्मान दिया था। वनवास अवधि का दस वर्षों से अधिक समय उन्होने विभिन्न ऋषियों के आश्रम में बिताया था। रामायण की सभी प्रतियों में यह कथा नहीं है या भिन्न रूप से है।

8. इसी तरह शंबूक की कथा है। शंबूक को राम ने केवल इसलिए मार डाला कि वह शूद्र होकर तपस्या कर रहा था। प्रसंग के अनुसार सतयुग में ब्राह्मण, त्रेता में ब्राह्मण और क्षत्रिय, द्वापर में इन दोनों के साथ वैश्य तथा कलयुग में शूद्र सहित सभी वर्ण तपस्या के अधिकारी है। शंबूक त्रेता में शूद्र होकर तपस्या कर रहा था इसलिए मृत्युदंड का पात्र था। लेकिन मूल ग्रन्थ में श्रवण कुमार के पिता को वैश्य और माता को शूद्र कहा गया है। वे दोनों मुनि की तरह तपस्या करते थे। राजकुमार दशरथ सहित अन्य लोग भी उन्हे मुनि की तरह सम्माननीय मानते थे। शबरी निम्न वर्ण का होकर भी एक आदरणीय तपस्विनी थी। स्वयं राम ने उनकी प्रशंसा की थी। अन्य अनेक ऐसे मुनि थे, जो ब्राह्मण या क्षत्रिय नहीं थे। दशरथ के प्रधानमंत्री और प्रधान रथचालक सुमंत्र सूत जाति के थे जो कि शूद्र माना जाता था। राम उन्हें अपने पिता की तरह ही सम्मानीय मानते थे। इसलिए शंबूक वध मूल कथा के संदर्भ से भिन्न है और इसे बाद में जोड़ा गया माना जाता है।

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9. उत्तरकाण्ड में राजसूय यज्ञ की बुराई को बताया गया है। जबकि अन्यत्र इस यज्ञ की चर्चा बिना किसी द्वेष भाव से है।

10. प्राचीन ग्रन्थों में बाद में अन्य लेखकों द्वारा जोड़ देने (प्रक्षिप्त अंश) की समस्या अन्य ग्रन्थों में भी है। उस समय जब कोई ग्रन्थ लिखा जाता था, तो ऋषि-मुनियों से समागम में उसे सुनाया जाता था। उसे सुनने वाले अपनी स्मृति से इसे अन्य लोगों को सुनाते थे। उस ग्रन्थ की प्रतिलिपि ताड़ या अन्य पत्र पर हाथ से लिखा जाता था। ये प्रतिलिपि कुछ ऋषियों या विद्यानुरागी राजाओं के यहाँ रखे जाते थे। समय-समय पर इन ग्रन्थों की व्याख्या के लिए भाष्य और टिकाएँ भी लिखी जाती थी।

11. ऐसी स्थिति में बीच के प्रतिलिपिकारों या भाष्यकारों द्वारा मूल ग्रन्थ में कुछ अंश जोड़ देना बहुत कठिन नहीं था। समागमों में जो लोग कथा सुनते थे और बाद में उसे अन्य लोगों को सुनाते थे, या उसके आधार पर लिखते थे, उनमें भी मूल ग्रन्थ की अपेक्षा परिवर्तन होना स्वाभाविक था।

12.  जब कोई ग्रन्थ प्रामाणिक माना जाने लगता है और जनता उसका विशेष आदर करती है, तब अपने मत उस ग्रन्थ द्वारा समर्थित बताने के लिए कभी जानबूझकर और कभी अनजाने में ऐसा परिवर्तन किया जाता था।

भाषा, लेखन शैली, संदर्भ, विचार, समय आदि के आधार पर असंगत होने के कारण अब यह माना जाता है कि यद्यपि रामायण के बालकाण्ड से युद्धकाण्ड तक में ही प्रक्षिप्त यानि बाद में जोड़े गए अंश हैं, लेकिन इनका अंश कम हैं। पर उत्तर काण्ड का अगर पूरा नहीं तो कम-से-कम अधिकांश भाग प्रक्षिप्त हैं।

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