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अन्नपूर्णी विवाद: क्या भगवान राम मांस खाते थे?

‘क्या भगवान राम मांस खाते थे?’ तमिल भाषा की एक फिल्म ‘अन्नपूर्णी: द गॉडेश ऑफ फूड’ ने इस विवाद को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है। इस फिल्म में एक ब्राह्मण पुजारी की बेटी देश की सबसे बड़ी शेफ बनना चाहती है। लेकिन इसके लिए उसे शाकाहारी के साथ-साथ मांसाहारी डिशेस भी बनाने होंगे और खाने होंगे। उसे इसके लिए प्रोत्साहित करते हुए उसका एक दोस्त वाल्मीकि रामायण के एक श्लोक के हवाले से यह बताता है कि राम भी मांस खाते थे। इतना ही नहीं, फिल्म में बिरयानी बनाने से पहले एक ब्राह्मण लड़की द्वारा नमाज पढ़ना जैसे कई विवादास्पद चीजें हैं। विरोध के कारण इसे नेट्फ़्लिक्स से अब हटा लिया गया है। इसके विरुद्ध एफ़आईआर भी हो गई है। लेकिन यहाँ हम बात फिल्म की नहीं बल्कि राम के मांस खाने और इससे संबन्धित वाल्मीकि रामायण के श्लोक की करेंगे।

केवल ये फ़िल्मकार ही नहीं बल्कि कई लोग सोचते हैं ऐसा कि राम मांस खाते थे। कुछ लोग यह भी तर्क देते हैं कि वे क्षत्रिय राजा थे। क्षत्रियों के लिए मांस भक्षण निषिद्ध नहीं था। केवल जितने दिन वे वन में रहे उतने दिन नहीं खाया क्योंकि ‘तापस वेश विशेष उदासी, चौदह बरस राम वनवासी’ का वचन था। अर्थात इतने दिनों तक उन्हें तपस्वी की तरह रहना था। दूसरी तरफ कुछ लोग ऐसे विषय पर बात करने को भी पाप मानते हैं क्योंकि वैष्णवों के लिए मांस तो क्या प्याज-लहसुन खाना भी वर्जित है। ऐसे में राम स्वयं भगवान विष्णु का अवतार होते हुए भी मांस कैसे खा सकते थे?

अब सबसे पहले बात वाल्मीकि रामायण के उस श्लोक की जिसे इस फिल्म में cite किया गया है। गीता प्रेस से प्रकाशित रामायण के प्रथम खंड में अयोध्याकाण्ड के सर्ग 52 का आखिरी यानि कि श्लोक संख्या 102:

तौ तत्र हत्वा चतुरो महामृगान

वराहमृश्यम पृषतम महरूरुम।

आदाय मेध्यम त्वरितम वुभुक्षितौ

वासाय काले ययतुर्वनस्पतिम

इसका अनुवाद लिखा है “वहाँ दोनों भाइयों ने मृगया विनोद के पश्चात वराह, ऋश्य, पृष्त और महरूरु, इन चार महामृगों पर वाणों का प्रहार किया। तत्पश्चात जब उन्हें भूख लगी, तब पवित्र कंद-मूल आदि लेकर सायंकाल के समय ठहरने के लिए वे (सीता जी के साथ) एक वृक्ष के नीचे चले गए।”

यानि उन्होने वाण मृगों पर चलाया, पर खाया कंद मूल, न कि उन मृगों का मांस। लेकिन अन्नपूर्णी फिल्म में इस श्लोक का केवल पहला और तीसरा लाइन बोल कर यह अर्थ निकाल लिया गया कि राम ने भूख लगने पर उन्हीं मृगों का मांस खाया।

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वाल्मीकि रामायण के सुंदरकांड के अध्याय 36 श्लोक 41 भी राम के खानपान से संबन्धित है। इसके अनुसार राम न तो मांस खाते थे और न ही मधु पीते थे। राम ने स्वर्णिम मृग को भी मांस के लिए नहीं मारा था। रावण की योजना के अनुसार मारीच सुनहरे रंगों वाले (सोने का नहीं) एक सुंदर मृग बन गया। वह राम के आश्रम के आसपास घूमने लगा जहाँ सीता उसे देख सके। उन्होंने सच में ऐसा मृग पहले कभी नहीं देखा था। जब सीता ने उसे देखा तो उन्होंने अपने पति और देवर को शस्त्र लेकर आने के लिए पुकारने लगी। लेकिन उस मृग को देखते ही लक्ष्मण को उसके मारीच होने का संदेह हुआ। कारण यह था कि यह मृग असामान्य था। मारीच द्वारा सुंदर पशुओं का रूप बना कर शिकार के लिए आए राजाओं को छल से मारने के कारनामे उन्होंने सुन रखे थे। 

लेकिन सीता ने खुश होकर पति से निवेदन किया “इस सुंदर मृग को पकड़ कर ले आइए। यह हमलोगों के मनबहलाव के लिए रहेगा।” वे इसे अपने साथ अयोध्या भी ले जाना चाहती थीं। इसी उद्देश्य से कहा यह जीवित नहीं पकड़ा जा सके तो मार कर इसका चर्म भी ला दें क्योंकि वह भी एक अनोखा मृगचर्म होता। स्पष्टतः मृग को मांस भक्षण के लिए नहीं मारना चाहती थी। राम ने पहले उसे जीवित ही पकड़ना चाहा लेकिन जब उसके छल से उन्हें यह विश्वास हो गया कि वह कोई राक्षस था, तभी उसे बाण मारा।  राम क्षत्रीय थे और क्षत्रीय के लिए शिकार करना मान्य था। मृग चर्म वनवासी तपस्वी भी पहनने और आसन रूप में प्रयोग करते थे।

तो यह तो तय है कि राम को मांसभक्षी बताने वाले जो प्रमाण दे रहे हैं, वे असली में किसी शास्त्र से नहीं लिए गए हैं। 

पर सवाल यह है कि ऐसे प्रश्न ही क्यों उठाए जाते हैं? क्या जानबूझ कर वैष्णवों के विश्वास पर आघात कर लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए? या हिंदुओं को उनकी आस्था से हटाने के लिए?

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भगवान राम धरती पर किसी नए धर्म का प्रवर्तन करने नहीं बल्कि जीवन जीने का आदर्श सिखाने आए थे। राम ने मानव जीवन के जो आदर्श स्थापित किए हैं, वे सभी समय, सभी क्षेत्र और सभी लोगों के लिए हैं। अगर इस दृष्टि से देखें तो वे आज भी प्रासांगिक हैं और हमेशा रहेंगे। इस से कोई अंतर नहीं पड़ता कि वे अवतारी व्यक्ति थे, ऐतिहासिक व्यक्ति थे या साहित्यिक फ़िक्शन।

इस दृष्टि से वे मांस खाते थे या नहीं यह आप्रासंगिक है। लेकिन भिन्न सामाजिक व्यवस्था से आने वाले लोगों के प्रति उनका व्यवहार आज भी प्रासंगिक है। उनका परम मित्र और गुरुकुल का सहपाठी निषाद राज था। वह पशु-पक्षियों का शिकार कर जीवनयापन करने वाले वनवासी समुदाय से आता था। राम ने उसे परम मित्र माना और भाई के समान गले से लगाया। उन्होने उनसे यह नहीं कहा कि भाई बाकी सब तो ठीक है, तुम मांस खाना छोड़ दो, तभी हमारी दोस्ती हो पाएगी। मातंग ऋषि के आश्रम में आने से पहले शबरी शबर भील जनजाति की परंपरा के अनुसार मांस खाती थी। लेकिन राम ने इसके लिए उनसे भी प्रायश्चित करने के लिए नहीं कहा। जटायु तो मृतक जीवों का मांस भक्षण करने वाले गिद्ध ही थे। लेकिन राम ने उन्हे पिता तुल्य माना। विभीषण, यद्यपि ब्राह्मण थे, पर वे उस राक्षस समुदाय से थे जो आदमी का मांस भी खाते थे। रावण सीता को एक साल का समय देते हुए कहता है अगर एक साल के अंदर वह रावण की बात नहीं मानती तो साल बीतने के अगले दिन उसके रसोइये कलेवा में सीता का मांस पका देंगे। दूसरी तरफ फल खाने वाले वानरों से भी उनकी मित्रता थी। 

स्पष्टतः राम ने मित्रता में खानपान का कोई महत्त्व नहीं माना। ये सभी राम के परम भक्त थे। तुलसी के राम कहते हैं “मानहु एक प्रेम कर नाता।” तुलसी स्वयं कहते हैं “रामही केवल प्रेम पियारा, जान लेहु जो जाननिहारा।” तो क्या इसका अर्थ यह लगाया जाय कि जो कोई राम का मित्र या भक्त हो वह कुछ भी कर ले तो राम उसे क्षमा कर देंगे?

नहीं। राम का कोई सच्चा भक्त जानबूझ कर तो कोई ऐसी गलती करेगा ही नहीं, अगर कर ले तो उसे कर्मफल के सिद्धान्त के अनुसार दंड मिलेगा। स्वयं उनके पिता राजा दशरथ ने युवावस्था में भूल से श्रवण कुमार की हत्या कर दी थी। पुत्र शोक में उनके माता-पिता ने भी प्राण त्याग दिया था। इस पाप के परिणाम से भगवान के पिता होते हुए भी राजा दशरथ नहीं बच सके थे।

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राम ने अपने मित्र सुग्रीव के भाई बाली का वध पेड़ के पीछे से छुप कर किया। बाली उनसे पूछता है “मैं वैरी सुग्रीव पियारा, कारण कवन नाथ मोही मारा।” इतना ही नहीं वह यह भी कहता है “धर्म हेतु अवतरउ गोसाईं, मारेऊ मोही व्याध की नाईं।” अर्थात आपने धर्म की रक्षा करने के लिए अवतार लिया है, फिर व्याध की तरह छुप कर धर्म विरुद्ध तरीके से मुझे क्यों मारा? जबाव में राम यह नहीं कहते कि तुम मेरे मित्र के शत्रु हो इसलिए मारा, बल्कि उसे उसके कर्मों की याद दिलाते हैं “अनुज वधू, भगिनी, सुत नारी, सुनू सठ कन्या सम ए चारी। इनहि कुदृष्टि विलोकही जोई, ताही वधे कछु पाप न होई।” अर्थात राम ने उसे उसके अपने छोटे भाई की पत्नी पर कुदृष्टि रखने के कारण मारा था।

बाली वध के बाद वे सुग्रीव से कहते हैं “जाओ अपने कुल की रीति के अनुसार भाई का अंतिम क्रिया सम्पन्न करो।” रावण वध के बाद ऐसा ही वह विभीषण से कहते हैं।

स्पष्टतः राम व्यक्ति के कार्यों और विचारों को महत्त्व देते हैं, उनके पहनावे या खानपान को नहीं। वह संस्कृतियों की विविधता को मान देते हैं। यद्यपि खानपान का महत्त्व है लेकिन वह अलग संदर्भ में है। प्राणी मात्र के प्रति दया को मनुष्य का गुण और निर्दोष प्राणी की हत्या को उचित नहीं माना गया है। किन्तु किसी समुदाय में अगर किसी विशेष आवश्यकतावश यह प्रचलित हो तो केवल इस आधार पर उस समुदाय को त्याज्य नहीं माना गया है।

इसलिए राम स्वयं मांस खाते थे या नहीं यह महत्त्वपूर्ण नहीं है बल्कि विभिन्न खानपान की आदतों वाले समुदायों को कैसे समान भाव से गले लगाया, यह मत्वपूर्ण है। विविधता को कैसे सहज भाव से अपनाया यह महत्त्वपूर्ण है।           

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